Kanpur Dehat Case: निष्ठुर व्यवस्था का उदाहरण है कानपुर देहात कांड
कानपुर देहात में प्रशासन के सामने एक मां बेटी का जिन्दा जल जाना, पूरे प्रशासनिक सिस्टम की निष्ठुर मानसिकता पर सवाल उठाता है। क्या ऐसा संवेदनहीन और क्रूर सिस्टम कभी जनता के लिए हितकारी और जवाबदेह हो सकता है?

Kanpur Dehat Case: संविधान सभा में लोकसेवा के गठन के मसले पर हुई बहस में कुछ सदस्यों ने स्वाधीन भारत की नौकरशाही को लेकर कई आशंकाएं जताई थीं। सदस्यों को डर था कि अंग्रेजी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सामंती तौर तरीकों वाली जो नौकरशाही अंग्रेजों ने बनाई , अगर उसे वैसे ही आज़ाद भारत में अपनाया गया तो भविष्य में भी वह वैसा ही व्यवहार कर सकती है जैसा अभी कर रही है। तब उनकी आशंकाओं को सरदार पटेल ने खारिज कर दिया था। लेकिन कानपुर देहात में जो कुछ हुआ, उससे साफ है कि सदस्यों की आशंका कितनी जायज थी।
जर्मन राजनीतिक विचारक मैक्सवेबर ने नौकरशाही को स्टील फ्रेम कहा है। ऐसा मजबूत ढांचा, जिसे हिलाया नहीं जा सकता। मैक्सवेबर का यह कथन कर्तव्य और ज़िम्मेदारी के नैतिक पथ से न डिगने के संदर्भ में है। लेकिन आये दिन जिस तरह के कारनामे नौकरशाही दिखाती रहती है, उससे मैक्सवेबर की अवधारणा अपने ठीक उलट रूप में फलित होती नजर आती है।
अव्वल तो आज़ाद भारत की अपनी ठेठ सोच और मूल्य वाली नौकरशाही होनी चाहिए थी, जिसकी कल्पना संविधान सभा के कतिपय सदस्यों ने की भी थी। गांधी ने भी लोकसेवक की बात कही थी। लेकिन हालात उसके ठीक उलट हैं। इसी उल्टी सोच और अहमन्यता का उदाहरण है, कानपुर देहात जिले की दुखद घटना। जिसमें मां-बेटी ने बुलडोजर दस्ते के सामने आग लगाकर खुद को तिरोहित कर लिया।
जिस गरीब दीक्षित परिवार की दो महिलाओं ने अपना आवास बचाने के लिए जलती हुई झोपड़ी में प्रवेश किया और उस खुद भी जलकर भस्म हो गयीं, उस परिवार पर सिस्टम इस तरह कहर बनकर क्यों टूटा? क्या ग्रामसमाज की जमीन का एक छोटा टुकड़ा जिस पर उन्होंने अपना कच्चा आवास बना रखा था, वह इतना बड़ा अतिक्रमण था कि एसडीएम, पुलिस बल के साथ उसे हटाने जेसीबी लेकर जाते?
ग्राम समाज की जमीन पर आमतौर पर अगर कोई लंबे समय से रह रहा है तो उसे हटाया नहीं जाता। लेकिन यहां क्योंकि गोपाल दीक्षित का पड़ोसी विशाल दीक्षित प्रशासन को अपने साथ मिलाकर रंजिशवश कार्रवाई कर रहा था इसलिए प्रशासन को गरीब गोपाल दीक्षित का परिवार माफिया नजर आ रहा था। साफ है विशाल दीक्षित भ्रष्ट सिस्टम को धन बल या किसी और बल के सहारे अपने हित में इस्तेमाल कर रहा था और सिस्टम इस्तेमाल हो रहा था।
ऐसे ही मामले पूरे सिस्टम पर सवाल खड़ा करते हैं जहां यह किसी न किसी के द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा होता है। आमतौर पर ऐसे मामले भ्रष्टाचार से ही जुड़े होते हैं जैसे राजस्थान में एक प्रतिबंधित दवा कारोबारी को बचाने के लिए एएसपी दिव्या मित्तल ने ही एक करोड़ रूपये घूस लेकर दवा कारोबारी को बचाने का प्रयास किया। अब दवा कारोबारी ने ही एन्टी करप्शन ब्यूरो में मित्तल की पोल खोल दी तो वो खुद जेल में बंद है।
जहां तक कानपुर देहात में घटित घटनाक्रम की बात है तो इतना तय है कि यहां भी प्रशासन दो पड़ोसियों की अदावत में एक के साथ खुलकर खड़ा नजर आ रहा था। इसलिए गरीब परिवार की दो महिलाएं अपना जलता घर बचाने के लिए उसमें घुसती हैं तो उन्हें बचाने का कोई प्रयास नहीं किया जाता। उलटे वहां जो सरकारी हैंडपम्प था उसे पहले ही उखाड़ दिया गया था ताकि पानी डालकर आग भी न बुझाई जा सके।
यहां यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कानपुर देहात जिले के गांव में ग्राम समाज की जमीन से अतिक्रमण हटाने पहुंचा प्रशासनिक अमला आखिर इतना असंवेदनशील क्यों हो गया कि उसे झोपड़ी में लगी या लगाई गई आग नहीं दिखी? उस आग में जलती मां-बेटी भी नज़र नहीं आईं।
दरअसल हमने जो प्रशासनिक तंत्र विकसित किया है, जिसे हमने पाला-पोसा है, उसकी बुनियाद में वह ब्रिटिश मानसिकता ही है, जिसका मकसद गुलाम देश के नागरिकों पर शासन करना था। संविधान सभा की बहस हो, या गांधी के विचार, स्वाधीन भारत में कम से कम ऐसी नौकरशाही या प्रशासनिक तंत्र की उम्मीद नहीं की गई थी। गांधी ने प्रशासक की जगह लोकसेवक की परिकल्पना की थी। लेकिन हमने उसी ब्रिटिश व्यवस्था को तकरीबन वैसा ही अख्तियार कर लिया। इसी का नतीजा है कि प्रशासनिक सेवा या पुलिस सेवा में आने वाला हर शख्स खुद को सिर्फ और सिर्फ शासक ही समझता है, लोकसेवक नहीं।
यह विडम्बना नहीं तो और क्या है कि देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, लेकिन भारतीय नौकरशाही का अधिकांश हिस्सा अब तक गुलामी के दौर वाली अंग्रेजी मानसिकता के ही चंगुल में है। दरअसल हमने कभी नौकरशाही को बदलने के लिए या भारतीय बनाने की दिशा में कोशिश ही नहीं की। जब तक किसी राजनीतिक दल ने सत्ता का स्वाद नहीं चखा, तब तक वह तंत्र और व्यवस्था को बदलने की बात करता रहा, लेकिन जैसे ही उसने सत्ता की सीढ़ी लांघी, वैसे ही उसकी सोच बदल गई।
प्रशासनिक सिस्टम को असंवेदनशील बनाने में उसकी प्रशिक्षण प्रक्रिया का भी बड़ा हाथ है। प्रशिक्षण के पहले ही दिन से रंगरूट अफसरों के दिमाग में भरा जाने लगता है कि वे अफसर हैं, वे औरों से अलग हैं, बाकी लोग उनके हुक्म के गुलाम हैं, उन्हें शासन करना है, उन्हें किसी भी तरीके से काम कराना है। ब्रिटिश काल से चली आ रही यह सोच रंगरूट अफसरों के अंदर इस कदर बैठा दी जाती है कि वे खुद को भारत का भाग्यविधाता और जनता को अपना गुलाम समझने लगते हैं। इसी सोच का असर आये दिन पूरे देश में दिखता रहता है। कानपुर देहात का मामला भी उसी असंवेदनशीलता का विस्तार है।
इसमें अब एक और अनिवार्य बुराई नौकरशाही में आ गयी है जातिवाद वाली। जिस नौकरशाही को हर नागरिक से एक समान व्यवहार करना चाहिए वहां भी आरक्षण और जातीय संघर्ष ने ऐसा प्रभाव पैदा किया है नौकरशाही जातीय गुटों में बंट गयी है। यही कारण है कि कानपुर देहात की हृदय विदारक घटना में नौकरशाही की जातिसूचक मानसिकता भी दिखी और गाली गलौज भी की गयी।
कांग्रेसी सांसद वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता वाले दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने प्रशासनिक व्यवस्था की तमाम बुराइयों की ओर ध्यान दिया था। उन्हें दूर करने के सुझाव भी दिए थे। लेकिन सुधारों की राह में राजनीति और स्टील फ्रेम दोनों ही रोड़ा बन गए। उन्हें डर था कि अगर सुधार लागू हुए तो उनकी सामंतशाही में दरार पड़ सकती है।
ऐसे में नौकरशाही अगर खुद को भगवान मानने लगे तो हैरत नहीं होनी चाहिए। आखिर ऐसा नहीं होता तो कानपुर देहात की जिस डीएम नेहा जैन पर असंवेदनशीलता और लापरवाही का आरोप लगा है, वे ही जांच का आदेश नहीं जारी कर रही होतीं। सिर्फ लेखपाल और बुलडोजर के चालक की गिरफ्तारी नहीं होती, बल्कि एडीएम सहित दूसरे बड़े अफसर भी गिरफ्तार होते।
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यहां एक बात और महत्वपूर्ण है जिस राजनीतिक दल ने जितना अधिक नौकरशाही पर भरोसा किया नौकरशाही ने उतना अधिक उसके साथ धोखा किया है। कानपुर देहात की घटना में इसका संकेत मिलता है। योगी सरकार ने भले ही गरीब आदमी की झोपड़ी पर बुलडोजर न चलाने की बात कही हो लेकिन जब आप ये भी कहते हैं कि प्रशासनिक काम में राजनीतिक दखल नहीं होना चाहिए तब नौकरशाही ऐसे ही कारनामें कर गुजरती है जो सरकार और पार्टी के लिए भी संकट का सबब बनते हैं।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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