Akhilesh vs Shivpal Yadav: बगावती तेवर दिखाने के बाद अखिलेश के आगे क्यों झुक गए शिवपाल?
सपा नेताओं का मानना है कि वर्षों तक अखिलेश के खिलाफ व्यूह रचना करने वाले शिवपाल ने अपने बेटे के सियासी भविष्य के लिये अखिलेश के सामने समर्पण कर दिया है।

Akhilesh vs Shivpal Yadav: मैनपुरी उपचुनाव के नतीजे आये एक महीने बीत चुके हैं, लेकिन शिवपाल सिंह यादव की समाजवादी पार्टी में भूमिका क्या होगी अब तक तय नहीं है। सियासी गलियारे में एक बार फिर चर्चा होने लगी है कि क्या शिवपाल एक बार फिर सपा में हाशिये पर डाल दिये जायेंगे?
यह सवाल इसलिये उठ रहा है कि शिवपाल ने अपनी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी का विलय भी समाजवादी पार्टी में कर दिया है, और अब सपा के विधायक होकर अखिलेश यादव के सियासी रहमोकरम पर रह गये हैं लेकिन पार्टी में उन्हें जो कद और पद मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला है।
मैनपुरी उपचुनाव के बाद शिवपाल ने सपा में जिस सम्मान की उम्मीद की थी, वैसा होता नहीं दिख रहा है। पार्टी में उन्हें अब तक कोई सम्मानजनक पद नहीं मिला है, जिससे उनके समर्थक भी असमंजस में हैं और नई जमीन तलाश रहे हैं। मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद चाचा शिवपाल एवं भतीजे अखिलेश में मतभेद कम होता नजर आया था, जो मैनपुरी उपचुनाव आते-आते नजदीकियों में बदल गया। उपचुनाव में शिवपाल को साथ लाने के लिये डिम्पल समेत अखिलेश उनके घर जाकर मिले तथा आशीर्वाद लिया।
वर्ष 2016 के बाद मैनपुरी उपचुनाव ही वह पहला मौका था, जब अखिलेश और शिवपाल ने सियासी मंच साझा करते हुए एक दूसरे की खूबियों के कसीदे पढ़े थे। माना जा रहा था कि उपचुनाव जीत के बाद अखिलेश अपने चाचा को सपा में कोई सम्मानजनक पद देकर उनका स्वागत करेंगे। लेकिन अपनी पार्टी का विलय करने के बावजूद शिवपाल यादव को सपा में पद और जिम्मेदारी का इंतजार है। चाचा-भतीजा के टशन के दौर में शिवपाल के साथ जाने वाले कार्यकर्ता अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि उन्हें अपने नेता का ही राजनीतिक भविष्य अधर में लटका दिख रहा है।
दूसरी ओर अखिलेश और शिवपाल की नजदीकी बढ़ने के बाद सपा के उन नेताओं में हलचल मची हुई है, जो शिवपाल के खिलाफ बयानबाजी करते रहे हैं। ऐसे नेताओं को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी है। उनकी धुकधुकी भी बढ़ गई है। इन्हें चाचा-भतीजा मिलन रास नहीं आ रहा है। खुद के लिए खतरा देखते हुए यह लोग शिवपाल को सपा में ताकतवर होते नहीं देखना चाहते हैं। माना जा रहा है कि यही कारण है कि शिवपाल अब तक अधर में लटके हुए हैं।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2016 के बाद से भी अखिलेश और शिवपाल के रिश्ते नरम-गरम रहे हैं। सात साल पहले सपा सरकार के दौर में आपसी कलह बढ़ने पर अखिलेश ने शिवपाल समेत उनके नजदीकी मंत्रियों अंबिका चौधरी, नारद राय, शादाब फातिमा, राज किशोर सिंह, ओमप्रकाश सिंह और गायत्री प्रजापति को अपने मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। सरकार के बाद अखिलेश ने पार्टी पर भी अध्यक्ष बनकर कब्जा जमा लिया था। तब शिवपाल ने मुलायम सिंह को साथ लेकर सपा के बंटवारे का खाका भी खींच लिया था, लेकिन नेताजी के ऐन मौके पर पलटी मार जाने से उनकी सारी उम्मीदें ध्वस्त हो गईं।
मुलायम सिंह यादव ने विधानसभा चुनाव से पहले दोनों के बीच किसी तरह सुलह-समझौता कराकर 2017 का विधानसभा चुनाव एक साथ लड़ाया। शिवपाल सपा के टिकट पर जसवंतनगर से लड़कर विधायक बने, लेकिन उनके समर्थकों का पत्ता अखिलेश ने काट दिया। तनातनी के बीच यह समझौता ज्यादा लंबा नहीं चला। 2018 में शिवपाल ने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली। 2019 का लोकसभा चुनाव भी वह अपनी ही पार्टी से लड़े। उन्हें आशातीत सफलता नहीं मिली, पर सपा को नुकसान पहुंचाने में सफल रहे।
वर्ष 2022 में विधानसभा चुनाव से पहले ओम प्रकाश राजभर की पहल पर योगी सरकार को हटाने की रणनीति के तहत एक बार फिर चाचा-भतीजा साथ आये। शिवपाल की पार्टी से सपा ने गठबंधन किया, लेकिन अखिलेश ने शिवपाल को केवल जसवंतनगर की एक ही सीट दी। शिवपाल अपने पुत्र आदित्य यादव के लिये भी एक सीट चाहते थे, लेकिन अखिलेश ने परिवारवाद के डर से ऐसा करने से इनकार कर दिया। शिवपाल को भी मजबूरन सपा के सिंबल पर ही चुनाव मैदान में उतरना पड़ा।
विधानसभा चुनाव जीत के बाद जब सपा विधायकों की बैठक में शिवपाल को नहीं बुलाया गया तो वह फिर अखिलेश से नाराज हो गये। शिवपाल ने कहा था कि सपा से कई बार धोखा खा चुके हैं अब वह इस पार्टी के साथ नहीं जायेंगे, लेकिन मुलायम सिंह यादव की मौत और मैनपुरी उपचुनाव में शिवपाल एक बार फिर सपा और अखिलेश के नजदीक आ गये। कयास लगाया गया कि शिवपाल ने यह समझौता इसलिए किया क्योंकि उन्हें अपने पुत्र आदित्य यादव के राजनीतिक भविष्य की चिंता है।
पांच साल पहले तक सपा के खिलाफ व्यूह रचना करने वाले शिवपाल ने पुत्र के सियासी कैरियर के लिये अपने सारे हथियार अखिलेश के सामने डाल दिये हैं। मैनपुरी उपचुनाव के नतीजे आने के बाद ही शिवपाल को सपा में बड़ा ओहदा दिये जाने की बात हो रही थी, लेकिन अब एक महीने बाद भी वह पैदल हैं।
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ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या भतीजे ने एक बार फिर अपने चाचा को चरखा दांव मार दिया है? क्योंकि शिवपाल के कद और पार्टी में पकड़ का अंदेशा अखिलेश को भी है। वो समझते हैं कि समाजवादी पार्टी में शिवपाल की क्या हैसियत रही है। तो क्या अखिलेश कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते? इधर, शिवपाल के सामने हालात ऐसे बन गये हैं जिसके एक तरफ कुंआ है तो दूसरी तरफ खाईं। ऐसे में सवाल उठता है कि सपा में शिवपाल का राजनीतिक भविष्य क्या है?
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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