Centre vs Regional Parties: संविधान से ऊपर क्षेत्रीय दलों की दादागीरी?
देश के तीन राज्यों के तीन क्षेत्रीय दल TMC, डीएमके और जेएमएम अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ के लिए देश के संघीय ढांचे को चुनौती पेश कर रहे हैं। इन दलों ने मानों तय कर लिया है कि उनकी राजनीति देश के संविधान से भी ऊपर है।

Centre vs Regional Parties: देश के तीन राज्य ऐसे हैं जहां की क्षेत्रीय दलों की सरकारों ने केंद्र के विरोध को ही अपनी राजनीति बना लिया है। ये तीन राज्य हैं तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और झारखंड। तीनों ही राज्यों में ना बीजेपी की सरकार है और ना कांग्रेस की। सो, राज्य का मुख्यमंत्री ही उनकी पार्टी का हाईकमान भी है। फिर भी इन दलों के मुख्यमंत्री जिस तरह से अपने निहित राजनीतिक स्वार्थों के लिए संवैधानिक पदों को चुनौती पेश कर रहे हैं वह भारत के संघीय ढांचे के लिए चुनौती लगने लगा है।
दरअसल, तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने एक बहस छेड़ी कि तमिलनाडु की जगह 'तमिझगम' सही शब्द है। तमिलनाडु का मतलब तमिलों का राष्ट्र होता है, जबकि तमिझगम का अर्थ तमिलों का निवास होता है। यही इस क्षेत्र का प्राचीन नाम है। उन्होंने अपने पोंगल आयोजन के आमंत्रण पर यही नाम लिखा तो विवाद हो गया। इसके बाद विधानसभा से लेकर बाहर तक राज्यपाल के विरोध का सिलसिला शुरु हो गया। हालात ऐसे हो गये कि राज्यपाल आरएन रवि विधानसभा में अपना भाषण अधूरा छोड़कर बाहर चले गये।
राज्यपाल एक संवैधानिक पद होता है, और आंकड़े अगर उठाएंगे तो पाएंगे कि आजादी के बाद ये पहली केन्द्र सरकार है, जिसमें 356 का प्रयोग सबसे कम बार हुआ है। लेकिन विवादों में कोई कमी नहीं बस केंद्र की 'सॉफ्ट एप्रोच' के चलते राज्यपालों का डर खत्म हो गया है। वरना इतनी हिम्मत इससे पहले किसी की कहां हुई थी कि राज्यपाल के खिलाफ सत्तारूढ पार्टी का कोई नेता खुलेआम 'गेट आउट' अभियान चलाए, मुख्यमंत्री का बेटा कहे कि, 'मेरे पिता ने राज्यपाल को भागने पर मजबूर कर दिया' और उसके बाद भी राज्य सरकार सही सलामत रहे।
उदयनिधि स्टालिन अपने पिता एमके स्टालिन की सरकार में ताजा-ताजा मंत्री बने हैं। ऐसे में राज्यपाल के वॉकआउट के बाद उनका ये बयान देना कि 'हमारे नेता ने राज्यपाल को भागने पर मजबूर कर दिया', साफ तौर पर राज्यपाल पद की गरिमा के खिलाफ है। लेकिन राज्य सरकार सीधे सीधे राज्यपाल के खिलाफ आधिकारिक मोर्चा नहीं ले सकती तो चेन्नई में डीएमके के एक नेता ने पूरे शहर में पोस्टर लगवा दिए हैं, जिन पर लिखा है 'Get Out Ravi'। इसी हैशटैग #GetOutRavi नाम से एक ट्विटर कैम्पेन भी शुरू कर दिया है।
तमिलनाडु में डीएमके की तरह पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी भी पीछे नहीं है। जो हाईकोर्ट जज टीएमसी या ममता बनर्जी व उनके परिवार के खिलाफ फैसला देता है, उसके खिलाफ हाईकोर्ट के टीएमसी समर्थित वकील बेशर्मी की हद तक मोर्चा खोल देते हैं। पहले जस्टिस अभिजीत गांगुली को निशाने पर लिया था। अब निशाने पर हैं जस्टिस राजशेखर मंथा। जज के चैम्बर के बाहर बैनर, पोस्टर लगाए, जिन पर लिखा था 'शेम ऑन यू'। उनका बहिष्कार किया, चैम्बर के बाहर धरना दिया, नारे लगाए, कोर्ट के गेट के बाहर जाम कर दिया, नतीजतन कोर्ट की कार्यवाही ठप्प हो गई।
कहीं और सुना है आपने ऐसा अभियान किसी जज के खिलाफ? उनका कुसूर ये है कि जज ने ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी की साली मेनका के खिलाफ फैसला दिया था। अगर कोई राजनैतिक दल वकीलों का ऐसा ही इस्तेमाल जजों के खिलाफ करता रहा तो जज बिना भय के कैसे फैसले दे पाएंगे? कौन वकील है जो ऐसे हाई प्रोफाइल अभियुक्तों के खिलाफ अदालत में खड़ा हो पाएगा? ये सीधे सीधे न्यायपालिका के मामलों में हस्तक्षेप है। फिर भी ममता बनर्जी और उनके भतीजे खामोश हैं। क्या बिना उनकी शह के किसी पार्टी वर्कर की इतनी हिम्मत है कि वह जजों के खिलाफ इस तरह का मोर्चा खोल दे?
तीसरा मामला झारखंड का है, जहां जैनों के पवित्र तीर्थ सम्मेद शिखर जी को लेकर कई दिनों से जैन समुदाय पूरे देश में विरोध प्रदर्शन कर रहा था। आखिरकार केन्द्र सरकार ने अपने एक पुराने आदेश पर रोक लगाकर उनकी नाराजगी दूर करने की कोशिश की। जैन समुदाय सम्मेद शिखर के पारसनाथ क्षेत्र को पर्यटन क्षेत्र घोषित करने के खिलाफ था।
झारखण्ड सरकार शुरूआत से ही इस मामले में रहस्यमयी चुप्पी साधे हुई थी। इस मामले में केन्द्र के रुख के बाद भी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन गोलमोल बात करते रहे। लेकिन केन्द्र के एक्शन के फौरन बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) का एक विधायक जिस तरह से खुलकर सामने आया है उससे जेएमएम के इरादों को लेकर अब शंका हो चली है।
जेएमएम के इस विधायक लोबिन हेब्रम ने सनसनीखेज बयान दिया है। हेब्रम ने कहा है कि 'सम्मेद शिखर के आस पास पहाड़ी पर जैन मुनियों के नंगा घूमने से हमारे आदिवासी समाज की बहन बेटियां शर्म से सर झुकाकर चलने को मजबूर हैं'। कुछ और आदिवासी संगठन इस जगह को अपना पवित्र स्थल 'मारंगबुरू' बता रहे हैं। उन सबको जेएमएम का ये विधायक लोबिन हेब्रम हवा दे रहा है।
10 जनवरी को लोबिन ने ऐलान के तहत आदिवासियों की भीड़ को महाजुटान में इकट्ठा भी किया। प्रशासन को 25 जनवरी तक का समय भी दिया है। वो पारसनाथ मारंगबुरू स्थल घोषित करवाना चाहते हैं और उसका कहना है कि केन्द्र ही नहीं राज्य सरकार के खिलाफ भी इसके लिए आंदोलन छेड़ा जाएगा। उसकी कोशिश है कि आदिवासी मुद्दों पर कांग्रेस और भाजपा के स्थानीय स्तर के लोगों को भी जोड़ा जाए और कुछ स्तर पर उसे कामयाबी मिली भी है।
आधिकारिक रूप से जेएमएम उसी तरह खामोश है, जैसे जजों के मामले में पश्चिम बंगाल में टीएमसी। लेकिन उनकी चुप्पी बताती है कि ये विधायक भी उन्हीं के इशारों पर काम कर रहा है। सारा खेल आदिवासी वोटों का है। ये जेएमएम विधायक और कुछ आदिवासी संगठनों के मुखिया आदिवासियों को भड़का रहे हैं, जबकि जैन समुदाय उस इलाके में आदिवासियों की शिक्षा आदि के लिए काफी प्रकल्प चला रहा है। इस तरह के आंदोलन से जैनों के प्रति आदिवासियों में वैमनस्य ही उभरेगा।
ऐसे में वोटों की राजनीति के चलते क्षेत्रीय राजनैतिक दलों ने इस तरह की दवाब वाली राजनीति का हथियार चलाना शुरू कर दिया है, जिसमें कानूनी रूप से वो तो सुरक्षित रहेंगे। संवैधानिक पदों पर बैठे राज्यपाल, हाईकोर्ट के जज के खिलाफ काम करने के बावजूद उन पर कोई एक्शन नहीं हो सकेगा।
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ये एक तरह से भय की राजनीति भी है। अगर उनके राज्य में, उनकी सत्ता में उनकी मर्जी के खिलाफ कुछ भी हो रहा है, जिसमें वो आधिकारिक रूप से कुछ करने में सक्षम नहीं हैं, तो वो इस अनाधिकारिक तरीके का इस्तेमाल करते हैं। यानी हाईकोर्ट के वकीलों, आदिवासी संगठनों जैसे किसी दवाब समूह का इस्तेमाल करो, अपने विरोधियों को डराओ, चाहे वो हाईकोर्ट का जज हो, राज्यपाल या फिर किसी समुदाय के साधु संत। इस काम के लिए वो अपनी पार्टी के कुछ बड़बोले नेताओं को भी बयानबाजी के लिए छुट्टा छोड़ देते हैं। ऐसे में मीडिया या ज्यूडीशियरी की महती जिम्मेदारी बनती है कि वो इन नापाक चालों का तोड़ निकालें वरना भारतीय लोकतंत्र के संघीय चरित्र को इससे खतरा उत्पन्न हो जाएगा।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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