Jaunpur: धनंजय सिंह, भाजपा और जौनपुर की दिलचस्प जंग
Jaunpur: उत्तर प्रदेश की जौनपुर लोकसभा सीट वैसे तो कोई चर्चा का विषय नहीं थी लेकिन धनंजय सिंह को मिली सजा से अचानक यह सीट चर्चा में आ गयी। पू्र्वांचल में माफिया नेता के रूप में मशहूर धनंजय सिंह इस सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे लेकिन अब वो जेल पहुंच गये हैं।
धनंजय सिंह को जिस केस में सात साल की सजा हुई है उसमें पुलिस द्वारा फाइनल रिपोर्ट लगाई जा चुकी है। लेकिन जिस तरह से उस केस को दोबारा खोला गया और आनन फानन में जिला अदालत द्वारा त्वरित सुनवाई करते हुए सात साल की सजा दी गयी, वह अपने आप में कई सवाल पैदा करता है। आखिर प्रशासन ने एक बंद हो चुके केस को दोबारा क्यों शुरु किया? क्या इससे धनंजय सिंह को राजनीतिक फायदा होगा या भाजपा को?

परंपरागत रूप से जौनपुर भाजपा या जनसंघ के लिए सिर्फ एक लोकसभा सीट भर नहीं है। इस सीट के साथ भाजपा/जनसंघ का एक इतिहास जुड़ा हुआ है। भाजपा के वैचारिक जन्मदाता कहे जानेवाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपने जीवन में सिर्फ एक चुनाव लड़ा था और वह भी इसी जौनपुर सीट से। 1963 के उपचुनाव में जनसंघ के ही सांसद की मौत के बाद वो मैदान में उतरे थे। लेकिन कांग्रेस ने राजदेव सिंह को टिकट देकर पूरे चुनाव को ठाकुर बनाम ब्राह्मण बना दिया।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय किसी भी प्रकार के जातिवाद के खिलाफ थे और अंत तक इससे बचते रहे। वो चुनाव को वैचारिक आधार पर लड़ना चाहते थे लेकिन कांग्रेस के ठाकुर बनाम ब्राह्मण के जातिवादी दांव में वो फंस गये। वहां से इस सीट पर ठाकुर बनाम ब्राह्मण का जो बंटवारा शुरु हुआ वह आज तक बना हुआ है। हालांकि जातीय आंकड़ों के हिसाब से यहां ब्राह्मण मतदाता लगभग 16 प्रतिशत और ठाकुर 13.5 प्रतिशत है।
यह पंडित दीनदयाल उपाध्याय की हार का असर था या कुछ और लेकिन अब भाजपा भी इस सीट पर ठाकुर उम्मीदवार उतारने में विश्वास करती है। इस सीट का इतिहास देखें तो 18 बार हुए लोकसभा चुनाव में 11 बार ठाकुर उम्मीदवार ही विजेता हुआ है। जौनपुर के राजा यादवेन्द्र दत्त दूबे जरूर दो बार विजयी रहे। एक बार जनता पार्टी के टिकट पर और दूसरी बार 1989 में भाजपा के टिकट पर राम लहर में राजा यादवेन्द्र दत्त दूबे ही विजयी हुए थे। इसके अलावा चाहे वह राजकेसर सिंह हों, चिन्मयानंद हों या कृष्ण प्रताप सिंह। भाजपा के खाते में जीत तभी आयी है जब उसने ठाकुर उम्मीदवार दिया है।
संभवत: यही कारण है कि इस बार भी भाजपा ने मूलत: जौनपुर के निवासी और मुंबई के प्रवासी कृपाशंकर सिंह को टिकट दे दिया। कृपाशंकर सिंह कांग्रेस में थे और महाराष्ट्र के गृहराज्यमंत्री रह चुके हैं। कुछ सालों से अब वो बीजेपी में हैं और जौनपुर से मिला टिकट उनके भाजपा में आने का ईनाम है।
लेकिन इस बार पेच यह फंस गया कि धनंजय सिंह पहले से मैदान में उतरने का ऐलान कर चुके थे। उन्होंने बाकायदा इसके लिए प्रचार भी शुरु कर दिया था। धनंजय सिंह मूलत: जौनपुर के हैं और स्थानीय जनता पर उनकी गहरी पकड़ है। एक बार वो इस सीट से सांसद भी रह चुके हैं। ऐसे में अगर इस बार भी वो नामांकन करने में सफल हो जाते तो यह सीधे सीधे कृपाशंकर सिंह की हार की गारंटी होती। खुद धनंजय सिंह जीतते या न जीतते लेकिन ठाकुर वोट पूरी तरह से बंट जाता। बड़े स्तर पर दूसरी जातियों के लोग भी धनंजय को वोट करते इसमें भी संशय नहीं है।
ऐसे में अगर लड़ाई त्रिकोणीय होती तो धनंजय या कृपाशंकर सिंह के अलावा तीसरे उम्मीदवार के जीतने का अवसर अधिक बढ जाता। जैसा कि इस समय है। दो बार समाजवादी पार्टी से पारसनाथ यादव इस सीट से सांसद रह चुके हैं। इस समय इस सीट से बसपा के श्याम सिंह यादव हैं जो पिछली बार के विजेता कृष्ण प्रताप सिंह को हराकर सांसद बने थे। इस बार भी अगर श्याम सिंह यादव सपा या बसपा से मैदान में उतरते हैं तो भाजपा के कृपाशंकर सिंह को कड़ी चुनौती दे सकते हैं।
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि धनंजय के जेल जाने या परचा न भर पाने से भाजपा के लिए जौनपुर का रास्ता आसान हो जाएगा। खबरें ऐसी भी आ रही हैं कि धनंजय की पत्नी श्रीकला सिंह किसी पार्टी के टिकट पर या फिर निर्दलीय भी मैदान में उतर सकती है। वो ऐसा इसलिए करेंगी क्योंकि धनंजय सिंह के जेल जाने से उनके पक्ष में 'सहानुभूति' की लहर है जिसे कैश कराने के लिए वो मैदान में उतरेंगी।
चर्चाएं तो यहां तक हैं कि धनंजय सिंह किसी 'योजना' के तहत जेल गये हैं। एक पक्ष दावा कर रहा है कि भाजपा सीधे धनंजय को टिकट नहीं देकर उनकी पत्नी को निर्दलीय जीतने में मदद कर सकती है। ऐसा दावा करनेवालों का अपना तर्क है। उनका कहना है कि धनंजय सिंह को परोक्ष रूप से योगी का समर्थन प्राप्त है। लेकिन यहां यह भी महत्वपूर्ण तथ्य है कि बीजेपी अपने ही उम्मीदवार को हराकर किसी निर्दलीय को जिताने में क्यों मदद करेगी?
हालांकि कृपाशंकर सिंह की स्थिति जौनपुर में अच्छी नहीं है। ठाकुर बिरादरी में ही उनकी कोई खास पकड़ या पहुंच नहीं है। इसलिए अगर धनंजय की पत्नी मैदान में उतरती हैं तब भी कृपाशंकर सिंह की जीत संदिग्ध हो जाएगी। फिलहाल सपा और बसपा ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। वो किस पर दांव लगाते हैं यह भी देखना होगा। खबरें ऐसी भी आ रही हैं कि धनंजय सिंह को जेल इसलिए भेजा गया क्योंकि वो सपा के टिकट पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। अब उनके जेल जाने के बाद सपा उनकी पत्नी को भी टिकट दे सकती है।
बहरहाल, राजनीतिक परिदृश्य चाहे जो बने लेकिन दशकों बाद लोकसभा की जौनपुर सीट फिर से चर्चा में आ गयी है। जिस सीट से दीनदयाल उपाध्याय और राजा जौनपुर यादवेन्द्र दत्त दूबे जनसंघ/भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हों वहां कृपाशंकर सिंह को टिकट देना ही भाजपा की वैचारिक गिरावट का संकेत करता है। झारखण्ड में अगर भाजपा भ्रष्टाचार का रिकार्ड बनानेवाले मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा को टिकट दे सकती है तो फिर उनके सरपरस्त रहे कृपाशंकर सिंह को टिकट दे दिया तो क्या बुरा किया?
जब चुनाव में जीत ही एकमात्र उद्देश्य हो तो भाजपा से भी वैचारिक और व्यावहारिक शुचिता, शुद्धता की दुहाई देना ही गलत है। हां, सवाल तब खड़ा होगा जब इतने 'बलिदान' के बाद भी जीत न हासिल हो सके। तब निश्चित रूप से भाजपा के लिए माया मिली न राम वाली स्थिति हो जाएगी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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