Ujjain Mahakal: आध्यात्मिकता और आधुनिकता का अलौकिक संगम है 'महाकाल लोक'
Ujjain Mahakal: शिव की अनुभूति पारलौकिक है तो उनका लोक भी अलौकिक होना स्वाभाविक है। "महाकाल लोक" यानि शिव का अद्भुत, अकल्पनीय और अलौकिक संसार। एक ऐसा संसार जो शिवमय है। शिव शक्ति, शिव सामर्थ्य, शिव त्याग और शिव सर्वा की गाथाएं सुनाता यह लोक देश का सबसे लम्बा मंदिर कॉरिडोर है।

महाकाल के आंगन को 856 करोड़ रुपए की लागत से दो फेज में विकसित किया जा रहा है जिसके पहले फेज का उद्घाटन मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किया गया है। जब इसका दूसरा फेज भी पूरा हो जाएगा तब 2.8 हेक्टेयर में फैला महाकाल का प्रांगण 47 हेक्टेयर का हो जाएगा। 946 मीटर लंबे कॉरिडोर पर चलते हुए भक्त महाकाल मंदिर के गर्भगृह तक पहुंचेंगे। कॉरिडोर पर चलते हुए उन्हें बाबा महाकाल के अद्भुत रूपों के दर्शन तो होंगे ही, शिव महिमा, शिव-पार्वती विवाह, शिव महापुराण की भी गाथाएं भी देखने-सुनने को मिलेगी।
महाकाल लोक में मुख्य द्वार से लेकर मंदिर के गेट तक 92 प्रतिमाएं हैं जिनमें QR कोड लगा है। इसे स्कैन करते ही प्रतिमा का पूरा इतिहास व धार्मिक गाथा आपके मोबाइल पर आ जायेगी। शिव भक्तों को यहाँ नीलकंठ महादेव, सती के शव के साथ शिव, त्रिवेणी प्लाजा पर शिव, शक्ति और श्रीकृष्ण की प्रतिमाएं, कैलाश पर शिव, गजासुर संहार, आदि योगी शिव, योगेश्वर अवतार, नटराज शिव, कैलाश पर रावण की प्रतिमाएं शिव की महिमा का गुणगान करती मिलेंगी। 384 मीटर लम्बी म्यूरल्स दीवार पर सृष्टि से लेकर शिप्रा की उत्पत्ति तक की 25 कथाओं के 52 प्रसंग उकेरे गए हैं। अर्थात महाकाल लोक के बनने के बाद महाकालेश्वर मंदिर एकमात्र ऐसा शिव मंदिर बन गया है जहां श्रद्धालु दर्शन के साथ ही शिव से जुड़ी हर कथा, हर प्रसंग को जान सकते हैं।
देश का सबसे सुव्यवस्थित मंदिर परिसर होगा महाकाल लोक
जब महाकाल लोक के दोनों चरण पूर्ण होंगे तो यह कॉरिडोर काशी कॉरिडोर से 9 गुना बड़ा होगा। इसका निर्माण भविष्य के दृष्टिगत आवश्यक भी था और समय की मांग भी। इसके उद्घाटन के बाद जल्द ही श्रद्धालुओं को सबसे बड़ी सुविधा बिना भीड़ के और कम समय में दर्शन की व्यवस्था के रूप में मिलेगी। आम श्रद्धालुओं को शिवरात्रि, नागपंचमी और सिंहस्थ जैसे पर्व-त्योहार के लिए दर्शन की ऐसी बेहतर व्यवस्था बनाई जा रही है जो देश के किसी मंदिर में नहीं है। किसी भी त्योहार पर न तो महाकाल पहुंचने वाले वाहनों को शहर से दूर रोका जाएगा और न ही कई किमी पैदल चलना होगा।
श्रद्धालुओं को पार्किंग से लेकर महाकाल दर्शन तक पहुंचने में सिर्फ 20 मिनट लगेंगे। एक घंटे में 30 हजार लोग दर्शन कर सकेंगे। भविष्य में व्यवस्था ऐसी हो जायेगी कि एक दिन में 10 लाख श्रद्धालु भी यदि महाकाल दर्शन को पहुंचे तो उन्हें दर्शन कराए जा सकें।
पिछले एक वर्ष में महाकाल के दर्शन करने पहुंचे भक्तों की संख्या 50 लाख के आसपास रही है जो महाकाल लोक के पूर्ण होने पर 1 करोड़ से अधिक होने की उम्मीद है।
2028 में आयोजित होने वाले सिंहस्थ में 7 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं के आने का अनुमान है। इस दृष्टि से भी महाकाल लोक का आकार लेना अवश्यम्भावी था। तिरुपति बालाजी देवस्थानम की तर्ज पर यहाँ बुजुर्गों के लिए इलेक्ट्रॉनिक ई-रिक्शा की सुविधा भी प्रदान की जायेगी। बच्चों के लिए मनोरंजन के तमाम साधन यहाँ उपलब्ध करवाने का विचार है। महाकाल लोक बनने से उज्जैन के आर्थिक विकास को भी गति मिलेगी और धार्मिक पर्यटन में भी तेजी आयेगी। महाकाल लोक से लोकार्पण से उज्जैन-इंदौर संभाग एक बड़े पर्यटन के केंद्र के रूप में उभरा है। उज्जैन से 140 किलोमीटर दूर ॐकारेश्वर ज्योतिर्लिंग में भी महाकाल लोक का प्रभाव पड़ेगा।
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मध्यप्रदेश सरकार उज्जैन- इंदौर- ओंकारेश्वर 'ॐ रेखा' को भी विकसित करने की ओर अग्रसर है। यानि रामायण सर्किट, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, दिल्ली-जयपुर-आगरा गोल्डन ट्राइएंगल की भांति ही मालवा के इस क्षेत्र में विकास, पर्यटन एवं आजीविका के साधन की नई राह खुलेंगी।
मंगल धरा पर मंगल के दिन आये मोदी
बाबा महाकाल का आशीर्वाद लेने आये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी छठवें प्रधानमंत्री हैं। इससे पूर्व स्व. मोरारजी देसाई, स्व. इंदिरा गाँधी, स्व. राजीव गाँधी और स्व. अटल बिहारी वाजपेयी उज्जैन आकर बाबा का आशीर्वाद ले चुके हैं। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री भी बतौर रेल मंत्री बाबा महाकाल का आशीर्वाद लेने उज्जैन आये थे।
इससे पूर्व नरेन्द्र मोदी बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री दो बार उज्जैन आ चुके हैं। 1977 में जनता पार्टी के नेता मोरारजी देसाई ने बाबा महाकाल का आशीर्वाद लेकर चुनाव प्रचार का शंखनाद किया था। 1979 में चुनाव से पूर्व इंदिरा गाँधी ने महाकाल दर्शन किये थे। हालांकि जब वे मंदिर पहुंची तब भस्मआरती चल रही थी अतः उन्हें बाहर से ही बाबा के दर्शन करने पड़े। ऐसा भी कहा जाता है कि उनके लिए महाकाल के समक्ष गुप्त पूजा भी की गई थी। 1989 में राजीव गाँधी ने महाकाल के समाने 30 मिनट तक पूजा-अर्चना की थी। 1998 में अटलजी अंतिम बार महाकाल के दर्शनों हेतु उज्जैन आये थे। वैसे अटलजी दर्जन भर बार उज्जैन आये और हर बार बाबा महाकाल का आशीर्वाद लिया।
महाकाल लोक के उद्घाटन के पश्चात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कार्तिक मेला ग्राउंड में विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि आजादी के अमृत काल में भारत ने गुलामी की मानसिकता से मुक्ति और अपनी विरासत पर गर्व जैसे पंच प्रण का आह्वान किया है।
इस उद्देश्य से अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण पूरी गति से हो रहा है। काशी में विश्वनाथ धाम भारत की सांस्कृतिक आध्यात्मिक राजधानी का केंद्र बन रहा है। चार धाम प्रोजेक्ट के जरिए हमारे चारों धाम बारहों मास उपलब्ध सड़क से जुड़ रहे हैं।
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि "पहली बार करतारपुर साहिब कॉरिडोर खुला है। हेमकुंड साहिब रोपवे से जुड़ने जा रहा है। स्वदेश दर्शन और प्रसाद योजना से हमारी आध्यात्मिक चेतना के ऐसे कितने ही केंद्रों का गौरव पुनः स्थापित हो रहा है। इसी कड़ी में महाकाल लोक भी अतीत के गौरव के साथ भविष्य के स्वागत के लिए तैयार हो चुका है।" अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने उज्जैन के वैभवशाली अतीत का वर्णन करते हुए कहा कि यह प्राचीन नगरी श्रीकृष्ण की शिक्षास्थली रही है तथा यहीं से विक्रम संवत का प्रारंभ हुआ है।
विश्वनाथ धाम और महाकाल लोक; मोदी का समर्पण
काशी विश्वनाथ और महाकाल, दोनों को विश्व और भूलोक का स्वामी माना गया है। देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से मोदी का ज्योतिर्लिंग परिसर विस्तार के लिए इन दोनों को चुनना, उनकी शिवभक्ति को दर्शाता है। काशी विश्वनाथ उत्तरमुखी हैं जो देवों की दिशा है अर्थात विश्व में देवों की सुरक्षा का जिम्मा काशी विश्वनाथ संभालते हैं। जबकि महाकाल दक्षिण मुखी हैं और दक्षिण दिशा को दैत्यों व असुरों की दिशा कहा जाता है। महाकाल दैत्यों व असुरों पर नजर रखने वाले भूलोक के स्वामी हैं। एक दैत्यों से बचाने वाले तो दूसरे देवों को संभालने वाले और इन दोनों के प्रति प्रधानमंत्री की भक्ति अद्वितीय है।
क्या विक्रम संवत बनेगा राष्ट्रीय संवत?
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का उज्जैन आकर महाकाल लोक को लोकार्पित करने और विक्रम संवत पर बात करने से इस चर्चा को पुनः बल मिला है कि क्या भविष्य में विक्रम संवत, राष्ट्रीय संवत बन सकता है? दरअसल, विक्रम संवत को राष्ट्रीय कलेंडर का आधार बनाने को लेकर देशभर के ज्योतिर्विद, पंचागकर्ता तथा खगोलविद केंद्र सरकार के समक्ष अपना प्रस्ताव रख चुके हैं। देश के अधिकाँश भागों में विक्रम संवत की मान्यता है। उज्जैन में ही राष्ट्रीय कलेंडर को लेकर हुई राष्ट्रीय संगोष्ठी में इस आशय का प्रस्ताव पास किया गया था।
प्रधानमंत्री ने जिस प्रकार उज्जैन में विक्रम संवत की महिमा का गान किया है उससे इस दिशा में सकारात्मक पहल के संकेत मिलते हैं।
धरती के अधिपति हैं महाकाल
आकाशे तारकेलिंगम्, पाताले हाटकेश्वरम्
मृत्युलोके च महाकालम्, त्रयलिंगम् नमोस्तुते।।
अर्थात आकाश में तारक लिंग, पाताल में हाटकेश्वर लिंग और पृथ्वी पर महाकालेश्वर से बढ़कर अन्य कोई ज्योतिर्लिंग नहीं है। इसलिए महाकालेश्वर को पृथ्वी का अधिपति भी माना जाता है अर्थात वे ही संपूर्ण पृथ्वी के एकमात्र राजा हैं। महाकाल उज्जैन के राजा हैं इस कारण संवैधानिक पद पर आसीन कोई भी मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री रात्रि में उज्जैन विश्राम नहीं करता।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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