TTP and Pakistan: क्या पाकिस्तान एक और आंतरिक युद्ध की तैयारी कर रहा है?
पेशावर में तहरीक ए तालिबान के हमले से पाकिस्तान का प्रशासन दहल गया है। इस हमले के बाद पाकिस्तानी सेना खैबर इलाके में टीटीपी के खिलाफ एक और आंतरिक युद्ध की तैयारी में जुट गयी है।

TTP and Pakistan: 30 जनवरी को पेशावर की पुलिस ऑफिसर कॉलोनी मस्जिद में हुए आत्मघाती हमले में 100 से अधिक पुलिस के लोग मारे गये थे। यह हमला इतना भीषण था कि पूरा पाकिस्तान दहल गया। इसका एक बड़ा कारण यह था कि अगर पुलिस ही आत्मघाती हमलों से सुरक्षित नहीं है तो आम जनता कैसे सुरक्षित रहेगी?
हालांकि इस हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान के आतंकी समूह तहरीक ए तालिबान ने ली थी, लेकिन बाद में वह मुकर गया। फिर भी पाकिस्तान के हुक्मरानों का मानना है कि यह हमला टीटीपी से ही जुड़े जमात उल अहरार ने किया था। इसके बाद
3 फरवरी को पाकिस्तान में नेशनल सिक्योरिटीज कमिटी की मीटिंग में यह तय किया गया कि अब टीटीपी से कोई बातचीत नहीं होगी, बल्कि पूरी क्षमता से आतंकवाद को कुचलने की कार्रवाई होगी। इस मीटिंग की अध्यक्षता स्वयं पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने की और पाक फौज के मुखिया जनरल आमिर मुनीर भी शामिल हुए।
दरअसल टीटीपी पाकिस्तान की ही देन है। 2001 में जब अमेरिका ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया था, तब उनकी सेना ने एक बड़ा ऑपरेशन तालिबान लड़ाकों के खिलाफ चलाया था। अमेरिकन आर्मी के हमले से बचने के लिए तालिबानी लड़ाके भाग कर स्वात की घाटी में आ गए जहां उनके जैसे ही कबायिलियों ने उन्हें ना सिर्फ शरण दी, बल्कि उनके साथ अमरीकी फौज के खिलाफ गोरिल्ला युद्ध में हिस्सा भी लिया।
अमेरिका को यह बात समझ में आई और उसने कीमत देकर पाकिस्तान को तालिबान के खिलाफ लड़ने के लिए खड़ा किया। पाकिस्तान को इसके लिए अमेरिका ने 32 अरब डाॅलर दिए। बाद में अमेरिका ने खुद कहा कि पाकिस्तान ने उनके साथ डबल गेम कर दिया। उन्होंने एक तरफ तालिबान के सफाये के लिए अमरीका से पैसे लिए और दूसरी तरफ उन्होंने टीटीपी जैसे संगठन को जिंदा किया। टीटीपी का गठन पाकिस्तान में ही 2007 में हुआ और उसका पहला प्रमुख बना बैतुल्लाह महसूद। तब से यह संगठन पाकिस्तान में तबाही मचाता रहा है और अभी तक इसके साथ लड़ते हुए पाकिस्तान के 85 हजार लोग मारे जा चुके हैं।
2020 में जब अमेरिका और तालिबान के बीच समझौता हुआ और यह तय हो गया कि अफगानिस्तान से सभी अमेरिकी फौजी निकल जाएंगे, तो टीटीपी को खुला मैदान मिल गया। अमेरिका के खिलाफ जंग के लिए जमा किए सभी आधुनिक हथियारों के साथ टीटीपी पाकिस्तान में सक्रिय हो गया। अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता आने को अल्लाह का करम बताने वाले इमरान खान को तब यह अहसास हो गया कि यदि टीटीपी को नहीं संभाला गया तो वह उनके लिए ही खतरा बन जाएगा। चूंकि खैबर पख्तुनख्वा में इमरान खान की पार्टी तहरीक ए इंसाफ की सरकार थी, इसलिए उनके पास खबरें आने लगी कि टीटीपी के लोग अब अपने इलाकों में सक्रिय हो गए हैं और वहां के लोगों से जबरन वसूली करने लगे हैं।
मई 2021 में इमरान खान ने तालिबान नेताओं की मध्यस्थता में टीटीपी से बातचीत की। इसी दौरान पेशावर के कोर कमांडर जनरल फैज हमीद की अध्यक्षता में उन्होंने एक प्रतिनिधिमंडल काबुल भेजा। इस प्रतिनिधिमंडल में जनरल फैज के अलावा खैबर पख्तुनख्वा के कुछ चुने हुए प्रतिनिधि और कुछ मुस्लिम उलेमा भी गए। कहते हैं कि जनरल फैज इमरान खान के बेहद करीबी थे और उन्होंने अपनी व्यक्तिगत वाहवाही के लिए ही काबुल का दौरा किया था। क्योंकि वहां से लौटने के बाद उन्होंने चहकते हुए अंदाज में कहा था कि सब कुछ ठीक हो जाएगा। इमरान खान ने भी यह ऐलान किया कि जो भी टीटीपी का आतंकवादी अपना हथियार सौंप देगा और वह पाकिस्तान के संविधान के अनुसार चलना स्वीकार कर लेगा उसे आम माफी दे दी जाएगी। लेकिन उनकी घोषणा के तुरंत बाद ही टीटीपी ने एक पत्र जारी कर यह साफ कर दिया कि उनका माफी मांगने का सवाल ही नहीं।
कहा जा रहा है कि इमरान खान से तालिबान सरकार ने यह कहा था कि अफगानिस्तान में रह रहे 40 हजार टीटीपी के सदस्यों को अपने यहां पाकिस्तान ले जाए और उनको वहां बसाए। इमरान ने इसके लिए हामी भी भर दी थी और उन्हें बसाने के लिए एक आर्थिक पैकेज भी तैयार कर लिया था। परंतु टीटीपी ने अपनी शर्त रख दी कि पहले पाकिस्तान की सरकार जेलों में बंद उनके लोगों को छोड़े तो फिर आगे बात होगी। कहते हैं कि उनकी इस शर्त को मानते हुए पाकिस्तान ने कुछ ऐसे आंतकवादियों को भी छोड़ दिया जिन्हें फांसी की सजा सुनाई जा चुकी थी। उसके बावजूद टीटीपी ने अपनी ओर से एकतरफा सीज फायर खत्म होने की घोषणा कर दी और हमले कर दिए।
टीटीपी का दावा है कि सीज फायर के बाद उसने पाकिस्तानी सेना और पुलिस पर 300 से ज्यादा हमले किए हैं और पाकिस्तान सेना के 446 जवानों को मार गिराया है।
इधर 29 नंवबर 2022 को जनरल बाजवा का रिटायरमेंट हुआ और 30 नवंबर को क्वेटा में एक आत्मघाती हमला कर दिया गया। यह हमला पोलियो का टीका लगाने जा रही एक मेडिकल टीम की सुरक्षा में लगे पुलिस जवानों पर किया गया। उसके बाद तो रोज ही कोई न कोई हमला हो रहा है। लेकिन पेशावर मस्जिद के हमले से पाकिस्तान हिल गया है।
अब पाकिस्तान को अपनी साख बचाने की पड़ी है। नेशनल सिक्योरिटी कमेटी की बैठक बुलाकर आर्मी को एक बार फिर टीटीपी के खिलाफ ऑपरेशन चलाने की कमान देने का फैसला लिया जाना है। पाकिस्तान के रणनीतिककारों का कहना है कि अब फैसला यह करना है कि टीटीपी के खिलाफ जमीनी अभियान चलाया जाए या हवाई हमले भी किए जाएं। खतरा दोनों में है।
टीटीपी के सारे बड़े ठिकाने अफगानिस्तान में हैं। किसी भी बड़े ऑपरेशन के बाद सारे आतंकवादी अफगानिस्तान में भाग कर छुप सकते हैं और यदि पाकिस्तानी सेना उनका पीछा करते हुए सरहद पार करती है तो वहां तालिबान के लड़ाके जवाब देने के लिए बैठे हैं।
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फिर भी टीटीपी से पार पाने के लिए पाकिस्तान एक और आंतरिक युद्ध की तैयारी में जुट गया है। यह युद्ध खैबर पख्तुनख्वा, स्वात और बलोचिस्तान में हो सकता है। एक तरफ पाकिस्तान की सेना और पुलिस के जवान होंगे और दूसरी तरफ पाकिस्तान का ही पैदा किया हुआ कबायिली आंतकवादी दस्ता होगा।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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