Telangana: क्या तेलंगाना भी जा रहा है मोदी की झोली में?

Telangana: 2014 का लोकसभा चुनाव जीतने के बाद भाजपा का रंग रूप बदल गया है| लोकसभा चुनावों में तो वह कई राज्यों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ करने वाली पार्टी बन गई है| राष्ट्रीय पार्टी के रूप में उसका राष्ट्रव्यापी विस्तार हुआ है| लेकिन क्षेत्रीय दलों के मुकाबले वह उत्तर प्रदेश के अलावा किसी भी राज्य में कामयाब नहीं हुई| 2014 के बाद उड़ीसा, बंगाल, आंध्र, तमिलनाडु, तेलंगाना, झारखंड में दो-दो बार चुनाव हो चुके| लेकिन किसी भी राज्य में भाजपा की दाल नहीं गली| कर्नाटक में कांग्रेस लौट आई और केरल में हिन्दू अभी भी सीपीएम के साथ बने हुए हैं| इस बार तेलंगाना में चांस बन रहा था, तो भाजपा ने पिछड़ी जाति के बंडी संजय को अध्यक्ष पद से हटा कर खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली|

तेलंगाना में लोग कह रहे हैं कि मोदी ने के. चन्द्रशेखर राव से सौदा कर लिया| वह लोकसभा चुनावों के बाद रिस्क लेने को तैयार नहीं थे| भाजपा के कड़ी टक्कर देने बाद भी मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव की पार्टी बीआरएस हावी थी| चुनाव में भाजपा दूसरी ताकत के रूप में उभर आती, तो भाजपा की राष्ट्रीय स्तर की भविष्य की राजनीति खराब होती|

telangana election 2023 bjp win factor narendra modi will get to power in state

लोकसभा चुनावों के बाद केसीआर को राज्य में तीसरे नंबर पर पहुंची कांग्रेस के साथ जाने में कोई प्राब्लम नहीं होती| इसलिए मोदी ने कांग्रेस के दूसरे नंबर पर आने का रास्ता खोला| ताकि लोकसभा चुनावों के बाद केसीआर की बीआरएस या तो एनडीए का हिस्सा बने या आड़े वक्त पर समर्थन दे| जैसे 2014 से बीजेडी और वाईआरएस कांग्रेस दे रही हैं| मोदी की इस रणनीति के कारण तेलंगाना की राजनीति का रंग रूप ही बदल गया है| जो लोग यह सोच कर भाजपा में आए थे कि भाजपा बीआरएस का विकल्प बनेगी, वे भाजपा छोड़ कर कांग्रेस में जा रहे हैं|

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ताज़ा उदाहरण विजया शान्ति का है| वह मशहूर फिल्म अभिनेत्री के साथ साथ 2009 से 14 तक बीआरएस (तब टीआरएस) की लोकसभा सदस्य भी रही हैं| उससे पहले 1998 से 2005 तक वह भाजपा में थी, तेलंगाना राष्ट्र समिति और कांग्रेस से होते हुए 2020 में वह भाजपा में लौटी थी| स्वाभाविक है कि एक बार सांसद रह चुकी विजय शान्ति की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं और भाजपा से अपेक्षाएं थीं| भाजपा तेलंगाना में जब खुद ही रेस से बाहर हो गई, तो विजया शान्ति ने भी अपना अलग रास्ता चुन लिया| कांग्रेस ज्वाइन करने के लिए उन्होंने भाजपा छोड़ दी| कांग्रेस ने उन्हें न्योता दिया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया| वैसे उन्होंने खुद भी अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है| क्योंकि कांग्रेस भले ही बीआरएस को कड़ी टक्कर दे रही है, लेकिन बीआरएस का सत्ता में लौटना तय माना जा रहा है| संभवत राज्य में कांग्रेस की बढती ताकत के कारण विजया शान्ति का इरादा कांग्रेस की टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ने का हो|

विजया शान्ति के अलावा हाल ही में पूर्व सांसद विवेक वेंकटस्वामी और पूर्व विधायक के. राजगोपाल रेड्डी ने भी हाल ही में भाजपा छोड़ी है| ये दोनों भी दुबारा कांग्रेस में चले गए हैं| छह महीने पहले तक भाजपा केसीआर को टक्कर देती दिखाई दे रही थी| अब कांग्रेस टक्कर में है, और भाजपा तीसरे नंबर पर चली गई है| कांग्रेस दूसरे नंबर की पार्टी बन कर भी बहुत कुछ हासिल कर लेगी| लोकसभा चुनावों में उसकी संभावनाएं बढ़ जाएँगी|

पिछले लोकसभा चुनावों में तेलंगाना से बीआरएस 9, गठबंधन में उसका सहयोगी ओवैसी-1, भाजपा 4 और कांग्रेस तीन सीटें जीती थी| अब केसीआर की राजनीति साफ़ है| जो लोग यह मानते हैं कि मोदी ने के. चन्द्रशेखर राव से सौदा कर लिया, वे यह भी दावा करते हैं कि 2024 के चुनावों में भाजपा और बीआरएस का चुनावी गठबंधन न भी हुआ, तो भी चुनावों के बाद वह मोदी सरकार से दूरी बनाकर नहीं रखेंगे|

हालांकि यह एक टेढा सवाल है कि असदुद्दीन ओवेसी की आल इंडिया मजलिस ए मुसलमीन के साथ गठबंधन के बाद वह मोदी सरकार को समर्थन कैसे देगी| लेकिन तेलंगाना की राजनीति के जानकारों का तर्क है कि अपनी राजनीतिक हैसियत बनाए रखने के लिए जैसे अपनी राज्य ईकाईयों के विरोध के बावजूद जैसे एच.डी. देवेगौडा ने भाजपा का दामन थामा है, वैसे ही केसीआर भी करेंगे| यहाँ यह भी याद रखना चाहिए कि कर्नाटक विधानसभा चुनावों में के. चन्द्रशेखर राव ने देवेगौडा की जेडीएस के साथ चुनावी गठबंधन किया था| विधानसभा चुनावों में केसीआर भाजपा की वैसी आलोचना नहीं कर रहे, जैसी कांग्रेस की कर रहे हैं| वह आज़ादी के बाद साठ साल तक तेलंगाना की दुर्दशा के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार बता रहे हैं, जिसने तेलंगाना को जबरदस्ती आंध्र प्रदेश में मिला दिया था|

के. चन्द्रशेखर राव विधानसभा चुनावों के साथ साथ लोकसभा चुनावों के लिए भी वोट मांग रहे हैं| वह खुलेआम कह रहे हैं कि तेलंगाना की जनता उन्हें जितनी ज्यादा ताकत देगी, उनकी बारगेनिंग ताकत भी उतनी ही बढ़ेगी| वह बता रहे हैं कि पिछली बार उनकी बारगेनिंग पावर नहीं थी, तो मोदी सरकार ने तेलंगाना के विकास में उनका वैसा सहयोग नहीं किया, जैसा दूसरे राज्यों में किया|

केसीआर अपने भाषणों में बता रहे हैं कि मोदी सरकार ने 2014 से लेकर अब तक देश को 157 मेडिकल कालेज मंजूर किए, लेकिन तेलंगाना को एक भी मेडिकल कालेज नहीं दिया| इसी तरह क़ानून के मुताबिक़ देश के हर जिले में एक नवोदय विद्यालय होना चाहिए, लेकिन तेलंगाना को एक भी नवोदय विद्यालय नहीं दिया| वह साफ़ कह रहे हैं कि लोकसभा चुनावों में भाजपा और कांग्रेस दोनों की ताकत घटेगी, और ऐसे में वह राज्य के हित में ज्यादा बारगेनिंग की स्थिति में होंगे| तो सवाल यह है कि क्या केसीआर चुनावों से पहले ही मोदी से डील कर चुके हैं?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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