Right to Propagate Religion: धर्म प्रचार का अधिकार क्या धर्म परिवर्तन कराने का अधिकार है?
कई वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट यह घोषित कर चुका है कि संविधान हर नागरिक को अपने धर्म का प्रचार-प्रसार करने का अधिकार देता है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि इसमें धर्म परिवर्तन करवाने का अधिकार भी शामिल है।
Right to Propagate Religion: धर्म प्रचार के अधिकार की आड़ में धर्म परिवर्तन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अश्विनी उपाध्याय का मुकदमा कोई नया नहीं है। इसी वर्ष दिल्ली उच्च न्यायालय ने जब धोखे या जबरन धर्म परिवर्तन को रोकने सम्बन्धी याचिका पर फैसला सुनाया था, तो कहा गया था कि धर्म परिवर्तन प्रतिबंधित नहीं है। किसी भी व्यक्ति का ये अधिकार है कि उसका जन्म जिस धर्म में हुआ हो, या फिर आगे जिस धर्म को उसने अपना लिया हो, वो उसका प्रचार-प्रसार कर सकता है।

दिल्ली उच्च न्यायालय के हिसाब से यह वो स्वतंत्रता है जो संविधान हमें देता है। इस मामले में उपाध्याय का आरोप था कि आर्थिक रूप से पिछड़े, वंचित लोगों का बड़ी संख्या में सामूहिक धर्म परिवर्तन किया जाता है। इनमें से अधिकांश लोग अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों से आते हैं। तो क्या इसे भी किसी की व्यक्तिगत इच्छा मान लिया जाए?
पहले भी सुप्रीम कोर्ट मध्य प्रदेश और ओड़िसा द्वारा धर्म परिवर्तन के खिलाफ बनाये गए कानूनों की समीक्षा कर चुका है। उन पर आये फैसले भी इस नये मुक़दमे में महत्वपूर्ण हो जाते हैं। संवैधानिक पीठ के फैसले में भी "प्रचार-प्रसार" (प्रोपोगेट) के अर्थ पर चर्चा हुई थी और तब ये बात हुई थी कि "प्रचार-प्रसार" का अर्थ जबरन धर्म परिवर्तन नहीं होता। सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने 1997 में रेव. स्टैनिसलॉस बनाम मध्य प्रदेश में ये फैसला दिया था।
इस फैसले में संविधान के अनुच्छेद 25 में वर्णित शब्दों की व्याख्या करते हुए बताया गया था कि अनुच्छेद 25 अपने धर्म के मूल तत्वों के प्रसार का अधिकार देता है, न कि दूसरे लोगों को अपने धर्म में परिवर्तित करने का। इसी संवैधानिक पीठ ने ये भी कहा था कि "दूसरों को अपने धर्म में परिवर्तित करना मूल अधिकार नहीं है"। धार्मिक स्वतंत्रता केवल एक धर्म को नहीं, बल्कि सभी धर्मों को दी गयी है।
चौदह नवम्बर (2022) को इस मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस एमआर शाह एवं जस्टिस हिमा कोहली की पीठ ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता तो है, लेकिन ये कहीं से भी जबरन धर्म परिवर्तन करवाने की स्वतंत्रता नहीं है। सभी लोगों के पास अपना धर्म चुनने का अधिकार है, लेकिन ये लालच देकर या जबरदस्ती नहीं करवाया जा सकता।
इस मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय ने 22 नवम्बर तक केंद्र सरकार को अपना पक्ष रखने के लिए कहा था। इस एफिडेविट में केंद्र सरकार को ये विवरण देना था कि जबरन धर्म परिवर्तन पर लगाम कसने के लिए वो कौन से कदम उठा रही है। इस मुद्दे पर अदालत ने टिप्पणी करते हुए जब कहा कि ऐसी घटनाएँ जनजातियों की बहुलता वाले इलाकों में हो रही हैं, तो सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी स्वीकारा कि ये जनजातीय इलाकों में "बहुलता से" हो रहा है।
सोलिसिटर जनरल ने यह भी स्वीकार किया था कि चावल, गेहूं, कपड़े इत्यादि देकर किसी की अंतरात्मा को बदला नहीं जा सकता। न ही ये सौदा ऐसा है कि इसके बदले में कोई संविधान प्रदत्त धर्म के मौलिक अधिकार को इतने मामूली लालच के बदले में छोड़ दे। ये याचिका डालने वाले, अश्विनी उपाध्याय स्वयं भी एक वकील हैं। उनकी मांग थी कि जबरन या धोखे से किये जाने वाले धर्म परिवर्तन के विरुद्ध एक अलग कानून बनना चाहिए। इसे भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के एक्ट की तरह लागू किया जाए।
इस पर जस्टिस शाह की टिप्पणी थी कि इन धाराओं के लागू होने पर भी इनमें मुकदमा कौन करेगा? जिसे ठगा गया, उसके अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने की कोई गारंटी नहीं होती। इस बात की प्रबल संभावना होती है कि इस तरीके से जिनका धर्म परिवर्तन करवाया गया, वो अधिकारों के प्रति जागरूक न हों। जिन राज्यों में ऐसा हो रहा है, वो राज्य भी कनवर्जन के मामले स्वीकारना न चाहें, यह भी संभव है।
इस मामले में जब 28 नवम्बर (2022) को सुनवाई हुई तो गृह मंत्रालय ने अपने एफिडेविट में कहा था कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार किसी को छल-कपट, लालच या धोखे से किसी को धर्म परिवर्तन करवाने का अधिकार नहीं देता। अभी का हाल देखें तो नौ राज्य - ओड़िसा, मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, झारखंड, कर्णाटक और हरियाणा में धोखे से धर्म प्ररिवर्तन को रोकने सम्बन्धी कानून हैं।
अश्विनी उपाध्याय की याचिका कहती है कि "धमकी" "उपहार" या फिर "आर्थिक लाभ" का लालच देकर जो धर्म परिवर्तन करवाए जा रहे हैं, उन पर रोक लगाने के लिए कानून बने। याचिका ये भी कहती है कि हर सप्ताह धमकी देकर, डराकर, धोखे से उपहारों या आर्थिक लाभ के बदले ही नहीं, काले जादू, अंधविश्वास और चमत्कारों की आड़ में भी धर्म परिवर्तन करवाने की ख़बरें आती रहती हैं। इसके बाद भी केंद्र और राज्य सरकारें इसे रोकने के लिए कोई कड़े कदम नहीं उठा रही।
अब इस मामले की सुनवाई अगले 5 दिसम्बर को फिर से होगी। जिस गति से भारत में कानूनी प्रक्रिया चलती है, उसमें ये उम्मीद तो नहीं की जा सकती कि बहुत जल्द इस मामले पर कोई फैसला आ जायेगा। लेकिन महत्व की बात की जाये, तो ये मुकदमा भारत के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। धर्म के हिसाब से आबादी बढ़ा कर चुनावी प्रक्रिया को अपने हिसाब से मोड़ने के लिए बांग्लादेश से आये घुसपैठियों को बसाने का आरोप तथाकथित सेक्युलर दलों पर लगता रहा है।
असम में ये एक बड़ा मुद्दा रहा है और अब तो बंगाल भी इससे अछूता नहीं। रोहिंग्या घुसपैठिये बांग्लादेश के रास्ते घुसे और वहां से कश्मीर तक पहुँच गए, ये हाल ही में दिखा है। दिल्ली और उत्तराखंड में भी आबादी और जनसांख्यकी में ऐसे बदलाव लाने की कोशिशें हुई हैं। ये भी गौर किया जा सकता है कि जैसे ही जनसँख्या में धार्मिक आधार पर परिवर्तन आता है और हिन्दुओं की जनसंख्या कम होती है, वैसे ही उन क्षेत्रों से अलगाववादी और राष्ट्र विरोधी स्वर भी उठने लगते हैं।
आगे देखने योग्य ये भी होगा कि केन्द्र सरकार क्या करती है? राष्ट्र प्रथम की विचारधारा को स्थान देती दिखती सरकार अगर फैसला आने से पहले ही इस प्रकार के विधेयक पर काम करना शुरू कर दे तो बेहतर होगा। बाकि अदालती फैसला जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ आया भी तो अपना मत कितने स्पष्ट शब्दों में रखेगा, इस पर संदेह तो रहता है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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