इंडिया गेट से: चीफ जस्टिस ने सत्ता पक्ष को चेताया, लेकिन विपक्ष से निराश
संसद का मानसून सत्र शुरू हो गया है। पहले ही दिन विपक्ष ने अग्निवीर योजना पर बहस के लिए ताबड़तोड़ नोटिस दे कर नकारात्मक भूमिका का श्रीगणेश कर दिया। साफ़ है कि संसद सत्र में काम तो हंगामें में ही होगा। विपक्ष ने अपनी पिछली गलतियों से कुछ नहीं सीखा है कि वह इतना कमजोर क्यों होता जा रहा है। इसी मुद्दे पर पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एन.वी. रमन्ना ने राजस्थान विधानसभा में भाषण दिया था, जिस की बहुत चर्चा हो रही है।

असल में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने विशेष रणनीति के तहत उन्हें आमंत्रित किया था। उन्हें उम्मीद थी कि जस्टिस रमन्ना कांग्रेस के मोदी विरोध के एजेंडे को आगे बढ़ाएंगे। उनकी ऐसी सोच के पीछे 30 जून 2021 का जस्टिस रमन्ना का वह भाषण था, जो उन्होंने जस्टिस पी.डी. देसाई स्मृति ट्रस्ट की व्याख्यान माला में दिया था। क़ानून का शासन विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा था कि लोकतंत्र में लोगों को कुछ सालों के बाद सरकार बदलने का जो अधिकार मिला हुआ है, उसे तानाशाही के खिलाफ सुरक्षा की गारंटी नहीं मान लेना चाहिए।
जस्टिस रमन्ना का यह वाक्य कांग्रेस की भाषा से मेल खाता है। कांग्रेस पिछले आठ साल से नरेंद्र मोदी पर आरोप लगा रही है कि वह तानाशाह की तरह काम कर रहे हैं और लोकतांत्रिक ढाँचे को तहस नहस कर रहे हैं। उन की इस टिप्पणी के बाद वह कांग्रेस के चहेते जज बन गए हैं। इसी भाषण में उन्होंने मीडिया और सोशल मीडिया की भी आलोचना की थी। यह भी कांग्रेस को सूट करता है क्योंकि पिछले सात-आठ साल से मीडिया सरकार की आलोचना करने की बजाए विपक्ष पर हमला कर रहा है।
अभी हाल ही में कांग्रेस की ब्रीफिंग में आए राहुल गांधी ने संबोधित करने से पहले उनसे पूछा कि क्या वे निर्भीक हो कर लिख पा रहे हैं। इस पृष्टभूमि में आप समझ गए होंगे कि राजस्थान विधानसभा में जब आज़ादी के 75 साल का जश्न मनाया गया तो निर्वाचित राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को आमंत्रित करने की बजाए चीफ जस्टिस को क्यों आमंत्रित किया गया था।
जस्टिस रमन्ना के राजस्थान विधानसभा में दिए गए भाषण को मोदी विरोधी मीडिया अपने नए हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। चीफ जस्टिस ने अपने भाषण में कहा कि एक मजबूत, जीवंत और सक्रिय विपक्ष शासन को बेहतर बनाने में मदद करता है, लेकिन दुर्भाग्य से देश में विपक्ष के लिए भूमिका कम होती जा रही है। जब उन्होंने कहा है कि देश में विपक्ष की भूमिका कम होती जा रही है, तो विपक्ष को और खासकर कांग्रेस को उनके इस वाक्य पर ध्यान देना चाहिए कि विपक्ष की भूमिका कम क्यों होती जा रही है। चुनावों में जनता उन्हें विपक्ष का दर्जा हासिल करने लायक भी क्यों नहीं छोड़ रही। पिछले दो लोकसभा चुनावों में जनता ने उन्हें इतनी सीटें भी नहीं दी कि उन का नेता विपक्ष का नेता का दर्जा हासिल कर सकता।
विपक्ष की भूमिका जनता ने कम की है, सरकार ने कम नहीं की। इसलिए जस्टिस रमन्ना के इस वाक्य पर विपक्ष को इतना उछलने की जरूरत नहीं है। बल्कि कांग्रेस को सोचना चाहिए कि जनता इतनी त्रस्त क्यों हो गई कि उसे विपक्ष की भूमिका में देखना भी पसंद नहीं कर रही। क्या कांग्रेस को उन कारणों की तह में नहीं जाना चाहिए, और देश से अपनी गलतियों पर माफी मांग कर उन नीतियों में सुधार का वादा नहीं करना चाहिए ताकि देश उसे विपक्ष की सशक्त भूमिका देने को तैयार हो। विपक्ष के पास अभी भी मौक़ा है कि वह अगले लोकसभा चुनाव से पहले संसद में अपनी सकारात्मक भूमिका निभा कर अपनी छवि को ठीक करे। यह शुरुआत इसी मानसून सत्र से हो सकती है।
चीफ जस्टिस ने इसी भाषण में कांग्रेस को यह भी याद दिलाया है कि पहले विपक्ष के नेता शानदार भूमिका निभाते थे। तब सरकार और विपक्ष के बीच आपसी सम्मान हुआ करता था। क्या इन दो वाक्यों पर मीडिया के उस वर्ग को क्या गौर नहीं करना चाहिए, जो चीफ जस्टिस के जयपुर में दिए गए भाषण को प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ इस्तेमाल कर रहे हैं। इस वाक्य में चीफ जस्टिस ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी की आलोचना करते हुए अटल बिहारी वाजपेयी , लाल कृष्ण आडवानी , सुषमा स्वराज और अरुण जेटली की तारीफ़ की है कि वे ऊंचे स्तर के विपक्ष के नेता थे।
जहां तक विपक्ष और सरकार के बीच सम्मान की बात है, तो अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल की याद आती है। जब तक भाजपा विपक्ष में थी, तब तक संसद सत्र की समाप्ति के अवसर पर प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेताओं का भाषण हुआ करता था। यह परंपरा सदन में तब टूटी जब सोनिया गांधी ने विपक्ष के नेता के नाते उस अवसर का प्रधानमंत्री वाजपेयी पर राजनीतिक हमला करने के लिए इस्तेमाल किया।
यहाँ एक बात और उल्लेखनीय है, जब संसद पर आतंकी हमला हुआ था, उस समय प्रधानमंत्री वाजपेयी सदन में थे, लेकिन सोनिया गांधी सदन में नहीं थी, तब वाजपेयी ने सदन से ही सोनिया गांधी को फोन कर के पूछा था कि वह कहाँ हैं, सकुशल तो हैं।
चीफ जस्टिस ने अपने इसी भाषण में आगे कहा कि विपक्ष की भूमिका कम होने के कारण हम बिना विस्तृत चर्चा संसद से क़ानून बनते देख रहे हैं। चीफ जस्टिस का यह बयान तथ्यों से परे है। उन्हें संसद का रिकार्ड देखना चाहिए। हर बिल पर बहस के लिए समय निर्धारित किया जाता है, अब विपक्ष उस का समुचित लाभ उठा कर बिल पर बहस करने की बजाए इधर उधर की बातों से सरकार की आलोचना में लगा रहे, तो इस में सरकार नहीं विपक्ष ही जिम्मेदार है।
चीफ जस्टिस ने अपने भाषण में कहा कि लोकतंत्र सत्ता पक्ष और विपक्ष में सहकारी प्रणाली है, लेकिन सार्थक बहस की बजाए राजनीति तीखी हो गई है। वह किस की ओर इशारा कर रहे थे? संसद और संसद से बाहर विपक्ष, खासकर कांग्रेस की बेहद नकारात्मक भूमिका पर या सरकार की ओर? चीफ जस्टिस ने कांग्रेस को ही सन्देश दिया है कि राजनीतिक विरोध को शत्रुता में नहीं बदलना चाहिए, जैसा कि हम लंबे समय से देख रहे हैं।
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(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)
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