राष्ट्रपति चुनाव: औपचारिक चुनाव की अनौपचारिक विजेता हैं द्रौपदी मुर्मू
आज राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान हो रहा है और मतदान के बाद 21 जुलाई को विजयी उम्मीदवार के नाम की घोषणा होगी। हालांकि जैसे राजनीतिक समीकरण बन गये हैं उसे देखते हुए द्रौपदी मुर्मू के नाम की औपचारिक घोषणा होना ही शेष है। 24 जुलाई को वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का कार्यकाल खत्म हो रहा है, उसके बाद देश के आदिवासी समाज की एक महिला द्रौपदी मुर्मू राष्ट्रपति के रूप में उस राष्ट्रपति भवन की शोभा बढाएंगी जो आकार में वेटिकन सिटी भी से तीन गुना बड़ा है।

भारत के लोगों के द्वारा अपने लिए जन प्रतिनिधि चुनने के हंगामेदार और भड़कीले चुनावों के विपरीत भारत के राष्ट्रपति का चुनाव लोकतंत्र की अनोखी कवायद है। राष्ट्रपति का चुनाव पेचीदा राजनीतिक गुणा गणित से तय होता है। हालांकि अब राष्ट्रपति का चुनाव किसी बड़ी राजनीतिक प्रक्रिया के समान होता जा रहा है। फिर भी, देश का राष्ट्रपति सार्वभौम मताधिकार प्रणाली से नहीं, बल्कि एक निश्चित निर्वाचक मंडल के जरिए चुना जाता है।
वोटों का मूल्य 1971 की जनगणना की आबादी के आंकड़ों के आधार पर निकाला जाता है। इसके मुताबिक संसद के 776 निर्वाचित संसद सदस्य जिसमें लोकसभा के 543 और राज्यसभा के 233 सदस्य शामिल हैं और राज्य विधानसभाओं के 4120 विधायकों के साथ यानी कुल 4896 निर्वाचक, राष्ट्रपति के लिए वोट डालते हैं। उनके वोटों का कुल मूल्य 10,98,882 होता है। इनमें सांसदों के हरेक वोट का मूल्य 708 है, वही विधायकों के वोट का मूल्य राज्य की आबादी के हिसाब से होता है।
वोटों के कुल मूल्य के आधे से एक वोट ज्यादा हासिल करके यानी 5,49,442 के जादुई आंकड़े पर पहुंचकर, कोई भी पार्टी अपने उम्मीदवार को राष्ट्रपति भवन पहुंचा सकती है। भाजपा के नेतृत्व में एनडीए के पास इस समय इससे कही ज्यादा मत आना तय है। इसलिए भाजपा ने एक आदिवासी महिला का दांव खेलते हुए द्रौपदी मुर्मू को अपना उम्मीदवार बनाया। द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी से विपक्ष के खेमें में सेंध लगना तय था।
एनडीए की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू को भाजपा और उसके सहयोगी जेडीयू, एलजेपी, रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया (आठवले), एनपीपी, एनपीएफ, एनडीपीपी, एसकेएम, एजीपी, पीएमके, एआईएनआर कांग्रेस, जननायक जनता पार्टी, अपना दल एस, एआईएडीएमके, निषाद पार्टी, यूपीपीएल का समर्थन है। इसके अलावा एनडीए से बाहर के दल जैसे बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस, टीडीपी, जनता दल (एस), शिरोमणि अकाली दल, जेएमएम, बसपा, यूडीपी और शिवसेना ने भी द्रौपदी मुर्मू को अपना समर्थन दिया है।
इतने व्यापक समर्थन के बाद द्रौपदी मुर्मू के पास 6.50 लाख मूल्य से ज्यादा वोट प्राप्त हो रहे हैं। एनडीए के पास छोटी बड़ी मिलाकर 27 पार्टियों का समर्थन है। वही विपक्ष के उम्मीदवार यशंवत सिन्हा के पास अब तक कांग्रेस, एनसीपी, टीएमसी, सपा, सीपीआई, आरएलडी, आरजेडी, आरएसपी, टीआरएस, डीएमके, नेशनल कांफ्रेस, भाकपा, केरल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसे दलों का समर्थन है। विपक्ष के पास अभी 3 लाख 89 हजार मूल्य के वोट है। इससे जाहिर है कि द्रोपदी मुर्मू ऐतिहासिक जीत की तरफ और यशंवत सिन्हा ऐतिहासिक हार की और अग्रसर है।
असल में विपक्ष राष्ट्रपति चुनाव के बहाने 2024 के आम चुनाव का आंकलन करने में जुट गया। इसमें सबसे आगे ममता बनर्जी थीं। 2024 में मोदी को चुनौती देने की तैयारी कर रही ममता बनर्जी 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार के सामने विपक्ष की मजबूत दावेदारी पेश करना चाहती थी। भाजपा के अगुवाई में एनडीए के पास स्पष्ट बहुमत नहीं था और पूरा विपक्ष यदि एकजुट हो जाता तो भाजपा को अपने उम्मीदवार को जिताने में पसीने छूट जाते। ममता को लग रहा था कि वह भाजपा और मोदी के खिलाफ राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष को एकजुट कर विपक्ष की सर्वमान्य नेता बनने की और कदम बढ़ा देगीं। लेकिन ममता की यह योजना रंग लाती इससे पहले ही मामला सिरे से बदरंग हो गया।
ममता की पहली पंसद शरद पवार, दूसरी पंसद फारूख अब्दुल्ला और फिर तीसरी पसंद गोपाल कृष्ण गांधी के मना करने के बाद औपचारिकता के लिए यशंवत सिन्हा को उम्मीदवार बनाकर खानापूर्ति की गयी। तीन तीन दिग्गजों के मना करने से पहले ही यशंवत सिन्हा को पहली पंसद का उम्मीदवार विपक्ष बनाता तो प्रक्रिया की शालीनता और विपक्ष की प्रतिष्ठा, दोनों बची रहती।।इसके बाद मोदी के घोर विरोधी दलों ने भी मोदी के उम्मीदवार के पक्ष मे समर्थन देने का एलान कर विपक्ष के उम्मीदों और मंसूबों को खत्म कर दिया।
अब जो होगा वह मात्र औपचारिकता होगी। भाजपा उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू देश के अधिकांश राजनीतिक दलों के समर्थन से राष्ट्रपति भवन की दहलीज पर पहुंचनेवाली हैं। यही ठीक भी है। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का कार्य और जिम्मेदारियां अलग अलग प्रकार की हैं। राष्ट्रपति का चयन राजनीतिक रूप से सर्वसम्मत से हो, तो इससे बेहतर दूसरी कोई बात नहीं हो सकती। संविधान निर्माताओं की मंशा भी यही थी कि संसदीय प्रणाली की राजनीतिक व्यवस्था का मुुखिया ऐसा व्यक्ति हो जो संसद से बंधा न हो और न ही सत्ता के खेल में सहभागी होता हो।
प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति पद में यह एक बड़ा फर्क है। इसी कारण महात्मा गांधी ने हिंद स्वराज में लिखा है कि "वह प्रधानमंत्री के हर फैसले को देशहित में मानने को तैयार नही हैं क्योंकि प्रधानमंत्री दल और सत्ता के लिए सभी तरह के गर्हित खेल खेलता है और तमाम दांवपेचों को अपनाता है। राष्ट्रपति एंपायर की भूमिका में होना चाहिए जो खिलाड़ियों को खेलने दे लेकिन उन पर कड़ी नजर रखे ताकि वह नियम के दायरे में खेल सकें।"
अतीत में ऐसे राष्ट्रपति हुए हैं जिन्होंने अपने आप को दलीय राजनीति से अलग रखा है। सर्वसम्मति से चुनाव होने पर इसका रास्ता और अधिक स्पष्ट हो जाता है। लेकिन राजनीतिक पूर्वाग्रहों के कारण द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी को लेकर दलों के बीच आमराय नहीं बन पायी। लेकिन हमें उम्मीद करनी चाहिए कि राष्ट्रपति पद पर आसीन होने के बाद द्रौपदी मुर्मू महात्मा गांधी की इच्छाओं के अनुरूप ही हर दल को समान रूप से अपना वैधानिक संरक्षण देंगी।
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(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)
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