Nitish Kumar Yatra: सरकारी समाधान यात्रा या नीतीश कुमार का दिखावटी दौरा?

नीतीश कुमार की लंबी समाधान यात्रा पूरी हो गई है, लेकिन इस यात्रा के समाप्त हो जाने के बाद भी सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ये समाधान यात्रा थी या फिर नीतीश कुमार का दिखावटी सरकारी दौरा?

Nitish Kumar Yatra

16 फरवरी को नीतीश कुमार ने पटना में समाधान यात्रा का समापन करते हुए कहा, 'यात्रा काफी अच्छी रही। पूरे बिहार में गए, लोगों की बातों को सुना और काम की प्रगति को देखा। यात्रा के बाद लोगों की राय भी आ रही है। जन प्रतिनिधियों ने भी अपनी बात कही है। अधिकारियों को इन बिंदुओं पर काम करने का निर्देश दिया गया है।'

मुख्यमंत्री ने लोगों की बात सुनकर उनकी समस्याओं को कितना समझा? सरकारी कार्यों की जमीनी स्थिति से वे कितने संतुष्ट हुए? लोगों की राय को कितना स्थान दिया एवम् उनके निर्देशों का पदाधिकारी कितना कार्यान्वयन करते हैं? फिलहाल इन सवालों का जवाब खोजना कठिन है। लेकिन मुख्यमंत्री आम लोगों को सुन भी सके या नहीं, परियोजना की वास्तविक तस्वीर देख सके या नहीं, इस पर संदेह करने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं।

अपने दौरे के क्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जिन लोगों से बात की, जिन परियोजनाओं को देखा और जहां पहुंचे, वे सभी लोग, योजना और स्थल पूर्व निर्धारित थे। सरकारी अधिकारियों द्वारा इन्हें रातों-रात तैयार किया गया। कुछ भी अचानक नहीं था। इसका प्रमाण आज भी उन गांवों, विद्यालयों, परियोजना स्थलों में मौजूद है जहां मुख्यमंत्री का दौरा एन वक्त पर रद्द हो गया। वहां खुदते हुए तालाब आधे खुदे रह गए, मछली पालन के लिए लाई गईं मछलियां वापस भेज दी गईं, सड़कों, दीवारों आदि के रंग-रोगन का काम अधूरा छोड़ दिया गया, पुस्तकालय में लायी गयी पुस्तकें वापस हो गईं, कंप्यूटर आदि जहां से लाए गए थे वहीं लौट गए। दूसरे शब्दों में कहें तो सब कुछ सरकारी दौरे की परंपरागत शैली में हुआ, इसलिए इसे यात्रा कहना सही प्रतीत नहीं होता है। इसलिए सवाल उठता है कि चतुर राजनेता कहे जाने वाले नीतीश कुमार ने आखिर इस यात्रा पर 44 दिनों का लम्बा समय क्यों खर्च किया और इतनी मेहनत किस उद्देश्य से की? विपक्षी दलों के नेता अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार इस सवाल का जवाब देते हैं।

वरिष्ठ भाजपा नेता और केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय कहते हैं- 'नीतीश कुमार की समाधान यात्रा के दौरान किसी भी समस्या का समाधान नहीं हुआ। जब नीतीश कुमार किसी से मिले ही नहीं, तो समाधान किसका और क्या किए। आज की तारीख में वे स्वयं सबसे बड़ी समस्या हैं।' वहीं पटना के एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक एवं राजनीतिक विश्लेषक डीएम दिवाकर कहते हैं, 'ऐसा लगता है नीतीश कुमार अपनी आगे की राजनीति के लिहाज से जनता की नब्ज टटोल रहे थे।'

दरअसल, नवंबर-दिसंबर में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले महागठबंधन को उपचुनावों में अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा था। इसी दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ सहयोगी नेताओं की आवाज तेज होने लगी और राज्य में कानून व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाने वाली चिंताजनक खबरों की संख्या भी तेजी से बढ़ने लगी थी। जहरीली शराब से बड़े पैमाने पर हुई मौत के बाद नीतीश की शराबबंदी योजना पर गंभीर सवाल उठे, जिससे वे कई बार असहज होते दिखे। मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने सरकार पर राजनीतिक हमला और तेज कर दिया था।

इस बदले राजनीतिक-प्रशासनिक माहौल में मुख्यमंत्री ने 4 जनवरी से राज्य के सभी जिलों का सरकारी दौरा करने की घोषणा की, लेकिन इसका नाम रखा- समाधान यात्रा। दौरा को यात्रा प्रचारित करने के इस विरोधाभास और समय के चयन ने समाधान यात्रा को इतना दिलचस्प बना दिया कि इसकी चर्चा राज्य समेत देश भर के मीडिया में लगातार होती रही। मुख्यमंत्री के हर कार्यक्रम में मीडिया रिपोर्टर उनसे ज्यादातर राजनीतिक सवाल करते ही देखे गए, जबकि मुख्यमंत्री हमेशा समाधान यात्रा की उपलब्धि पर बात करने की इच्छा प्रदर्शित करते रहे।

बहरहाल, नीतीश कुमार की इस यात्रा के छिपे उद्देश्य को समझने के लिए यात्रा की उन बातों या इवेंट पर गौर करना होगा जो हर जिलों और बैठकों में एक पैटर्न की तरह देखी गई। यात्रा के दौरान कार्यक्रम या बैठक स्थल पर मुख्यमंत्री के आने और प्रस्थान करने के समय मीडिया के कैमरों के सामने जद-यू के कार्यकर्ताओं द्वारा एक नारा बार-बार लगाया गया। नारा था- 'देश का प्रधानमंत्री कैसा हो, नीतीश कुमार जैसा हो।'इसके अलावा मुख्यमंत्री के हर कार्यक्रम में जीविका दीदियों की भारी उपस्थिति सुनिश्चित करायी गई।

गौरतलब है कि नीतीश पिछले कई वर्षों से महिलाओं को अपना वोट बैंक बनाने के लिए प्रयासरत हैं। वे खुद कई बार कह चुके हैं कि महिलाओं की मांग पर ही उन्होंने शराबबंदी कानून लागू किया था। इन सब बातों के अलावा, नीतीश कुमार वर्क-सेंट्रिक, प्रो-पीपुल अविवादित नेता की अपनी पुरानी छव को कायम रखना चाहते हैं। महागठबंधन के फोल्डर में सरकार बनने के बाद जिस तरह राज्य में जाति आधारित सामाजिक विद्वेष की राजनीति गरमा रही है, उससे नीतीश कुमार की पुरानी छवि मलिन पड़ने लगी है। उनकी तस्वीर इस विद्वेषपूर्ण राजनीतिक फ्रेम के केंद्र में दर्ज होने की स्थिति उत्पन्न हो गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि इसी स्थिति से बचने के लिए उन्होंने पटना से दूर रहने की योजना बनाई।

वैसे भी, अगर देखा जाए तो हाल के वर्षों में इवेंट मैनेजमेंट के जरिए राजनीतिक छवि चमकाने की एक परंपरा चल पड़ी है। सत्ताधारी दल के नेता सरकारी दौरों को भी प्रोमोशनल इवेंट की तरह आयोजित करते हैं। समाधान यात्रा में भी इसका संकेत नजर आया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार 2024 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में लग चुके हैं। इसका संकेत उनके आगामी राजनीतिक कार्यक्रमों से भी मिलता है। ऐसी खबर है कि 25 फरवरी को वे महागठबंधन के नेताओं के साथ पूर्णियां में भाजपा के खिलाफ जनसभा करने जा रहे हैं। जद-यू के द्वारा आने वाले समय में देश भर में ऐसे कई कार्यक्रम, जनसभा, बैठक आदि किए जाने की तैयारी चल रही है। खबरों के मुताबिक निकट भविष्य में भाजपा के कई बड़े नेताओं का बिहार में दौरा होने वाला है। अमित शाह, जेपी नड्डा समेत कई केंद्रीय स्तर के भाजपा नेता बिहार में जनसभा करने वाले हैं।

नीतीश कुमार की समाधान यात्रा से बिहार के आम लोगों की समस्या का समाधान कितना हुआ, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। फिलहाल इतना तो कहा ही जा सकता है कि अपनी राजनीतिक चुनौतियों का सामना करने और महत्वाकांक्षाओं को पूरा के लिए उन्होंने एक कड़ा पूर्वाभ्यास जरूर पूरा कर लिया है।

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