शीला दीक्षित: एक दूरदर्शी राजनेत्री जिन्होंने 21वीं सदी की दिल्ली को सजाया संवारा
दिल्ली की 15 सालों तक मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित अपने तमाम व्यस्त कार्यक्रमों के उपरांत भी शाम को लोदी गार्डन में टहलना नहीं भूलती थीं। शाम के समय वो बिना किसी सुरक्षा के वहां के जॉगिंग ट्रैक पर टहलते हुए दिख जाती थीं। उनके साथ अक्सर एक-दो अफसर जरूर रहते थे। शीला दीक्षित इतना तेज चलती थीं कि उनके अफसर लगभग उनके साथ दौड़ते नजर आते थे। शीला दीक्षित का राजनीतिक सफर देखें तो उनके जीवन में भी यह तेजी दिखाई देती है।

Recommended Video
शीला कपूर का जन्म कपूरथला के एक खत्री परिवार में 31 मार्च 1938 को हुआ था। उनका जन्म भले पंजाब में हुआ था और विवाह उत्तर प्रदेश में लेकिन उनका लगभग समूचा जीवन दिल्ली में बीता। उनकी शुरुआती शिक्षा जीजस एण्ड मेरी स्कूल तथा उच्च शिक्षा दिल्ली के मिरांडा हाउस कालेज हुई थी। पढाई के बाद दिल्ली के ही चांदनी चौक के एक स्कूल में 100 रूपये मासिक वेतन पर शिक्षिका बन गयी।
पढाई के ही दौर में उनकी मुलाकात विनोद दीक्षित से हुई जो कि उस समय के कांग्रेस के बड़े नेता उमाशंकर दीक्षित के बेटे थे। दोनों में प्रेम हो गया और विनोद दीक्षित ने शीला कपूर के सामने शादी का प्रस्ताव रखा। शीला और विनोद की शादी में सबसे बड़ी अड़चन जाति की थी। शीला खत्री परिवार से थीं जबकि विनोद ब्राह्मण थे। लेकिन दो साल बाद परिवार की सहमति से 1962 में दोनों की शादी हो गयी।
उनकी शादी हुई तब तक विनोद दीक्षित आईएएस अफसर बन चुके थे और शीला एक निजी स्कूल में पढा रही थीं। शादी के कुछ साल बाद शीला दीक्षित ने अपने श्वसुर उमाशंकर दीक्षित के राजनीतिक काम काज में हाथ बंटाना शुरु कर दिया। उमाशंकर दीक्षित 1971 से 1974 तक इंदिरा गांधी सरकार में गृहमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री रहे।
उनका राजनीति के प्रति रूझान ही उन्हें चुनाव के मैदान तक ले गया। 1982 में पति विनोद दीक्षित की अकाल मृत्यु के बाद जैसे उमाशंकर दीक्षित की राजनीतिक विरासत शीला दीक्षित के पास ही आ गयी। उमाशंकर दीक्षित के गृहनगर कन्नौज से वो दो बार सांसद चुनी गयीं। पहली बार 1984 में और दूसरी बार 1989 में।
इसके बाद उन्होंने कन्नौज की बजाय दिल्ली को अपनी राजनीतिक भूमि के रूप में चुन लिया। 1998 के आम चुनाव में उन्होंने पूर्वी दिल्ली से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा लेकिन वो भाजपा के लाल बिहारी तिवारी से चुनाव हार गयीं। लाल बिहारी तिवारी से हुई यह हार शीला दीक्षित के राजनीतिक कैरियर में नई उड़ान लेकर आयी।
दिल्ली में यह वह समय था जब राजनीति बहुत अस्थिर थी। भाजपा बार-बार अपने मुख्यमंत्री बदल रही थी। इसी साल 1998 में दिल्ली में कांग्रेस की सरकार बनी और सुषमा स्वराज की काट के तौर पर कांग्रेस ने एक महिला को मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लिया। यहां से शीला दीक्षित का दिल्ली के मुख्यमंत्री के तौर पर जो सफर शुरु हुआ वह 15 वर्षों तक चला। शीला दीक्षित दिल्ली की पहचान बन गयी थीं। इन पंद्रह सालों में केन्द्र में चाहे भाजपा की सरकार रही हो या कांग्रेस की। दिल्ली की मुख्यमंत्री के रूप में शीला दीक्षित निर्विवाद नेता बनी रहीं।
शीला दीक्षित के कामकाज को आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि एक दिल्ली थी जो शीला दीक्षित से पहले थी। एक दिल्ली शीला दीक्षित ने बनायी। इसे सजाया संवारा। दिल्ली के कस्बाई चरित्र से बाहर निकाल कर इसे एक आधुनिक शहर बनाने के लिए उन्होंने इन पंद्रह सालों में बहुत काम किया। 2010 में आयोजित किये गये कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों के समय शीला दीक्षित ही दिल्ली की मुख्यमंत्री थी। इस मौके पर दिल्ली को सजाने संवारने और इसे एक बेहतर शहर बनाने के लिए करीब एक लाख करोड़ रूपये खर्च किये गये। कॉमनवेल्थ गेम्स ने दिल्ली के बुनियादी ढांचे के विकास में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसका सारा काम शीला दीक्षित की देख-रेख में ही हुआ था।
लेकिन राजनीति का दुर्भाग्य देखिए कि कॉमनवेल्थ गेम्स में बड़ा भ्रष्टाचार हुआ। इसमें केन्द्रीय खेल मंत्री सुरेश कलमाड़ी बुरी तरह फंसे और जेल चले गये। राजनीतिक गलियारों में उस समय कहा जाता था कि भ्रष्टाचार के आरोपों की आंच से शीला दीक्षित को बचाने के लिए उन्हीं के ही इशारे पर अरविन्द केजरीवाल ने जंतर मंतर से भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन शुरु किया था। इस आरोप को इस बात से भी बल मिलता है कि शुरुआती दिनों में केजरीवाल का आंदोलन सिर्फ सुरेश कलमाड़ी की गिरफ्तारी तक ही सीमित था।
लेकिन उन्हीं दिनों भाजपा ने भी काले धन और भ्रष्टाचार को अपना मुद्दा बना लिया। तब मजबूरी में केजरीवाल को शीला दीक्षित के खिलाफ भी आंदोलन करना पड़ा। उन्होंने वादा किया था कि सरकार बनने के बाद वो लोकपाल से शीला दीक्षित की भी जांच करवायेंगे, लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। उन्हीं की सरकार में मंत्री रहे कपिल मिश्रा ने जब जांच का दबाव बढाया तो केजरीवाल ने कपिल मिश्रा को ही पार्टी और सरकार से बाहर निकाल दिया।
केजरीवाल ने भले बाद में शीला दीक्षित के खिलाफ जांच न करवाई हो लेकिन उनके आंदोलन का शीला दीक्षित के राजनीतिक भविष्य पर पर गहरा असर हुआ। 2013 में दिल्ली में कांग्रेस की करारी हार हुई और शीला दीक्षित स्वयं चुनाव हार गयी। इसके बाद मार्च 2014 में यूपीए सरकार द्वारा उन्हें केरल का राज्यपाल नियुक्त किया गया लेकिन मोदी सरकार बनने के बाद उन्होंने सितंबर 2014 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद के कुछ साल राजनीतिक हाशिये पर ही बीते और 20 जुलाई 2019 में 81 साल की उम्र में हार्ट अटैक से उनकी मृत्यु हो गयी।
यह भी पढ़ें: नूपुर शर्मा मामले में सुप्रीम कोर्ट का शीर्षासन
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
-
वर्ल्ड कप बॉयकॉट के ड्रामे के बीच पाकिस्तान की नई चाल, चुपचाप बुक की श्रीलंका जाने की टिकट -
Rajasthan News Today: राजस्थान में इंसानियत हुई शर्मसार, महिला की लातों से पिटाई लेकिन लोग बने रहे दर्शक -
Bahubali Files: UP का वो खूंखार बाहुबली, सत्ता को बनाया गुलाम-पुलिस की उधेड़ी चमड़ी! खेली MLA के खून से होली -
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने देहरादून में सैनिक धाम निर्माण रोकने की याचिका खारिज कर दी। -
Ajit Pawar Last Post : प्लेन क्रैश से कुछ मिनट पहले क्या लिखा था अजित पवार ने? आखिरी पोस्ट बना चर्चा का विषय -
Ajit Pawar Demise: 70,000 करोड़ का वो राज जो साथ ले गए अजित दादा! क्या था सिंचाई घोटाले जिससे जुड़ा उनका नाम -
Ajit Pawar plane crash: कौन थीं Pinki Mali? जिनकी प्लेन क्रैश के दौरान अजित पवार के साथ हुई मौत -
Uttarakhand News मिशन 2027 को लेकर कांग्रेस की प्लानिंग तैयार, हाईकमान से मीटिंग के बाद जानिए क्या बनी रणनीति -
Aaj Ka Meen Rashifal: किसी नए रिश्ते की शुरुआत होगी, पढ़ें आज का मीन राशिफल -
Vishnu Tiwari: जेल की दीवारें खा गई जवानी, मजदूरी करने को मजबूर विष्णु ने क्यों उठाए New UGC Act पर सवाल? -
Ajit Pawar Plane Crash: कौन हैं ये Maharaj-ज्योतिषी, पहले ही की थी क्रैश की भविष्यवाणी? आगे भी मौतें? -
UGC Old Rule: सुप्रीम कोर्ट ने UGC का 2012 वाला नियम किया लागू, यूजीसी नए-पुराने रूल्स का हर अंतर समझिए












Click it and Unblock the Notifications