नूपुर शर्मा मामले में सुप्रीम कोर्ट का शीर्षासन
कभी-कभी कुछ संयोग ऐसे बन जाते हैं कि वे प्रमुखता से इतिहास में दर्ज करने लायक हो जाते हैं। ऐसा ही एक संयोग सुप्रीम कोर्ट और नूपुर शर्मा के बीच बना है, जो निश्चित ही लोकतांत्रिक इतिहास में उदाहरण के तौर पर हमेशा याद रखा जाएगा।

28 मई को एक न्यूज़ चैनल की चर्चा में भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा के एक बयान को लेकर देश के कट्टरपंथी तत्वों ने उनके खिलाफ मुहिम शुरु कर दी थी। उसके प्रभाव में हिंसक लोगों द्वारा उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलनी शुरु हो गयी। उनके बयान के खिलाफ देश के कट्टरपंथियों ने अलग-अलग राज्यों में एफआईआर दर्ज करवा दी। इसमें महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना प्रमुख थे। निश्चय ही यह संविधान द्वारा प्रदत्त नागरिक अधिकारों पर कट्टरपंथियों का सीधा हमला था और हिन्दू बहुल भारत में कट्टर इस्लामिक ब्लासफेमी कानून थोपने की योजना का हिस्सा था।
एक जुलाई को नूपुर शर्मा सुप्रीम कोर्ट पहुंचती है यह राहत मांगने के लिए कि उनके ऊपर देश भर में अलग-अलग स्थानों पर एक समुदाय विशेष द्वारा जो एफआईआर दर्ज करायी गयी हैं, उन्हें एक जगह दिल्ली में ट्रांसफर कर दिया जाए। हर जगह जाने पर उन्हें कट्टरपंथियों से जान का खतरा है। उच्चतम न्यायालय के ही पुराने फैसलों के अनुसार यह एक जायज मांग थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच उनकी याचिका को निरस्त कर देती है और उन्हें संबंधित राज्यों के हाईकोर्ट में जाने के लिए कहती है।
लेकिन इस मौके पर जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जमशेद पारदीवाला जो मौखिक टिप्पणियां करते हैं, उससे सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ पूरे देश में गुस्सा फूट पड़ता है। वो नूपुर शर्मा को जान की सुरक्षा देने की बजाय उन्हें "देश भर में आग लगाने वाली" बता देते हैं। सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफार्म पर कई दिन तक दोनों जजों की टिप्पणियों पर बहस चलती हैं। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को इनकी टिप्पणियों के विरोध में देश के गणमान्य नागरिकों द्वारा चिट्ठी भी लिखी जाती है।
करीब हफ्ते भर तक गुस्से और नाराजगी के उबाल के बाद मामला थोड़ा शांत होता है तो नूपुर शर्मा 18 जुलाई को एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट पहुंचती हैं। कोर्ट रजिस्ट्रार उनके आवेदन को स्वीकार करता है और 19 जुलाई को उनका केस उन्हीं दो जजों की बेंच के पास भेज देता है जिनकी टिप्पणियों पर देश भर में बवाल पैदा हुआ था। 19 जुलाई को जब यही दो जज ठीक उसी मामले की सुनवाई करते हैं तो बिल्कुल अलग फैसला सामने आता है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस पारदीवाला की बेंच नूपुर शर्मा के खिलाफ देश के अलग-अलग राज्यों में दर्ज सभी एफआईआर को दिल्ली में ट्रांसफर करने के लिए संबंधित राज्यों से जवाब मांगने का आदेश जारी करती है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट नूपुर शर्मा को मजहबी कट्टरपंथियों से मिल रही धमकियों को देखते हुए उनके "जीवन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" की सुरक्षा की गारंटी भी प्रदान करता है।
अपने आदेश में उन्हीं दो जजों की बेंच ने कहा है कि "1 जुलाई के आदेश में हमने याचिकाकर्ता को अन्य क़ानूनी उपाय खोजने के लिए कहा था। लेकिन अब याचिकाकर्ता का कहना है अन्य क़ानूनी उपायों को खोजना नामुमकिन है और उनके जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करना जरूरी है।" इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मौखिक टिप्पणियों की जगह लिखित आदेश में नूपुर शर्मा से कहा है, "लिबर्टी इज ग्रांटेड।"
सुप्रीम कोर्ट की ओर से नूपुर शर्मा को जो राहत मिली है उसमें सबसे बड़ी राहत ये है कि फिलहाल 10 अगस्त तक उनकी गिरफ्तारी या उनके खिलाफ अन्य किसी पुलिस कार्रवाई पर रोक लगा दी है। नूपुर शर्मा के खिलाफ महाराष्ट्र, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और दिल्ली में दर्ज अलग-अलग 9 एफआईआर को एक जगह (दिल्ली में) क्लब करने के लिए सभी राज्यों को आदेश जारी करके 10 अगस्त तक जवाब देने के लिए कहा है। इस बीच अगर कोई नयी एफआईआर दर्ज होती है तो उसे इसी आदेश के तहत माना जाएगा और उस पर अलग से कोई कार्रवाई नहीं की जा सकेगी। सुप्रीम कोर्ट में नूपुर शर्मा मामले में अब अगली सुनवाई 10 अगस्त को होगी।
माननीय सुप्रीम कोर्ट के जिन दो जजों जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस पारदीवाला की मौखिक टिप्पणियों से पूरे देश में आक्रोश पैदा हो गया था, अब उनके इस लिखित आदेश के बाद कोर्ट में एक बार फिर जन सामान्य का विश्वास बहाल होगा। शीर्ष अदालत ने आखिरकार एक भारतीय नागरिक के तौर पर नूपुर शर्मा की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जीवन की सुरक्षा के महत्व को स्वीकार किया, यह इस प्रकरण में सबसे न्यायप्रिय पहलू है।
निश्चय ही बीस दिनों के अंदर ही दोनों जजों की पीठ का ऐसा शीर्षासन आसान नहीं रहा होगा लेकिन लोकतंत्र, संविधान और न्याय व्यवस्था में आम आदमी के विश्वास की बहाली के लिए यह जरूरी था।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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