Rupee as Global Currency: क्या डॉलर का विकल्प बन सकता है रूपया?
भारतीय रुपये को वैश्विक मुद्रा बनाने की संभावनाओं पर भारत सरकार काम कर रही है और कई देशों के साथ रुपये में कारोबार शुरू भी कर चुकी है। वाणिज्य मंत्री ने इसे बढ़ावा देने के लिए बैंकों को कमर कसने के लिए कहा है।

Rupee as Global Currency: क्या भारतीय रुपया एक वैश्विक मुद्रा बनने जा रहा है? क्या रुपया डॉलर का विकल्प हो सकता है? ये कुछ सवाल इसलिए कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में अमेरिकी डॉलर में कारोबार की बजाय बहुत सारे देश अब किसी और मुद्रा के विकल्प की तलाश में लगे हैं। चूंकि भारत का विदेशी व्यापार उन देशों से ज्यादा है, जिन पर या तो अमेरिका ने आर्थिक पाबंदियां लगा रखी है या जो अमेरिका के साथ किसी न किसी मुद्दे पर टकराव रखते हैं। इसलिए हमारे लिए रुपये को एक ग्लोबल पहचान दिलाना सरल हो सकता है।
हालांकि इस समय कोई भी मुद्रा वैश्विक मुद्रा के रूप में स्थापित नहीं है, फिर भी अमेरिकी डॉलर को यह मान लिया गया है कि यही विश्व व्यापार में सर्वमान्य मुद्रा है। किसी भी देश की आर्थिक मजबूती का आधार ही इस समय उसके डॉलर रिजर्व को माना जाता है। एक समय था कि जब सोना के भंडारण के बराबर किसी देश की मुद्रा की कीमत आंकी जाती थी। यानी कोई देश कितनी मुद्रा का प्रचलन कर सकता था, यह उसके सोना भंडारण और उसकी कीमत के आधार पर तय होता था। पर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका आर्थिक रूप से इतना संपन्न और एक स्थिर अर्थव्यवस्था बन गया कि अब अमेरिकी डॉलर के रिजर्व को देश की संपत्ति का आधार माना जाता है। आज विश्व का 60 प्रतिशत से अधिक विदेशी मुद्रा भंडार अमेरिकी डॉलर में है। डॉलर के बाद यूरोपियन मुद्रा यूरो है, जो कुल विदेशी मुद्रा भंडारण में 20 फीसदी हिस्सा रखता है। विश्व स्तर पर भारतीय रुपये की लोकप्रियता चौथे नंबर पर है। पर विश्व की दस मजबूत मुद्रा में हम अभी नहीं आते।
यदि व्यापारिक चलन में किसी मुद्रा की हैसियत सबसे अधिक है तो वह निःसंदेह अमेरिकी डॉलर की है। 85 प्रतिशत वैश्विक लेन देन में डॉलर ही प्रयोग में लाया जाता है। यानी आयात-निर्यात के लिए मान्य वैश्विक मुद्रा डॉलर है। येन और यूरो में भी वैश्विक व्यापार हो रहा है पर डॉलर के मुकाबले बहुत कम। चीन ने बहुत कोशिश की कि युआन को वह वैश्विक मुद्रा के रूप में पहचान दिलाए पर उसके रास्ते में कई बाधाएं हैं, जिसमें अमेरिका और यूरोप के साथ उसके व्यापारिक टकराव भी हैं। कुछ समय पहले युआन को वैश्विक मुद्रा बनाने के लिए चीन ने आक्रामक नीति अपनाई थी, लेकिन 2020 के बाद से चीन की अर्थव्यवस्था में गिरावट और अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना ने डॉलर से प्रतिद्वंद्वता के बजाए युआन को डॉलर के मुकाबले स्थिर रखने में ही सारा ध्यान लगा दिया है। पिछले दो साल में युआन का डॉलर के मुकाबले लगभग 8 फीसदी अवमूल्यन हो चुका है। इस समय लगभग दो फीसदी वैश्विक व्यापार में ही युआन के जरिए लेन देन हो रहा है।
लेकिन यहां बात रुपये की है। भारतीय रूपया कभी भी वैश्विक मुद्रा के रूप में चलन में नहीं आया, हां विगत कुछ वर्षों से कुछ द्विपक्षीय और कुछ बहु पक्षीय व्यापारिक लेन देन में रुपये का महत्व तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2007 में जहां रुपये में वैश्विक व्यापार का प्रतिशत केवल 0.7 था, अब वह बढ़कर 1.6 प्रतिशत हो गया है। लेकिन अब इसमें कुछ तेजी आने की संभावना है। भारत के साथ रुपये में व्यापार करने के लिए 18 देशों के साथ रिजर्व बैंक ने समझौता कर लिया है। इनमें बोत्सवाना, फिजी, जर्मनी, गुयाना, इजरायल, केन्या, मलेशिया, मॉरिशस, म्यांमार, न्यूजीलैंड, ओमान, रूस, सेसेल्स, सिंगापुर, श्रीलंका, तंजानिया, यूगांडा और ब्रिटेन शामिल हैं।
इसका सीधा सा अर्थ है कि इन देशों से आयात का भुगतान हम रुपये में कर सकते हैं और निर्यात के बदले रुपये में भुगतान प्राप्त कर सकते हैं। इन सभी देशों में रिजर्व बैंक स्पेशल वोस्त्रो अकाउंट खोलने की मंजूरी देगा। यह एक अतिरिक्त व्यवस्था है जिसके तहत विदेशों के बैंक भारतीय रुपये वाले खाते रखेंगे और मुद्रा के परिवर्तन की सुविधा प्रदान करेंगे।
रुपये को वैश्विक व्यापार की मुद्रा बनाने के पीछे भारत सरकार की एक लंबी सोच व योजना है। पहला लक्ष्य है कि डॉलर के भंडारण पर आने वाले व्यय को कम करना। विदेशी मुद्रा के रुप में डॉलर हमारे यहां दो खातों में आते हैं। एक निवेश के खाते में और दूसरे ऋण खाते में। ऋण खाते में आई विदेशी मुद्रा का ब्याज भार हर साल सरकार को चुकाना पड़ता है और इसके लिए फिर से विदेशी कर्ज भी लेना पड़ता है। रुपये में विदेशी कारोबार का आकार यदि बढ़ता है तो भारत को विदेशी मुद्रा भंडार को बनाए रखने के लिए अतिरिक्त खर्च नहीं करना पड़ेगा।
डॉलर जमा करने का दबाव कम होगा तो रुपये की स्थिरता बनाए रखने का खर्च भी कम होगा। वर्ष 2022 में रुपये को डॉलर के मुकाबले गिरने से बचाए रखने के लिए रिजर्व बैंक ने 82.8 बिलियन डॉलर अतिरिक्त खर्च किए थे। रुपये में विदेशी कारोबार बढ़ा तो भारत का भुगतान संतुलन घाटा भी कम होगा। भुगतान संतुलन का मतलब है आयात और निर्यात के कुल मूल्य में अंतर। इस समय भारत का व्यापार संतुलन घाटा जीडीपी का 2.6 प्रतिशत है। रुपये में विदेशी कारोबार का एक सीधा फायदा मुद्रा परिवर्तन में आने वाले खर्च में कमी होगा। अभी हमारे आयातक बाहर से सामान मंगाने के लिए रुपये को पहले डॉलर में परिवर्तित कराते हैं, फिर भुगतान करते हैं।
रुपये में वैश्विक व्यापार करने के कुछ फायदे तो कुछ जोखिम भी हैं। सबसे बड़ी चुनौती रुपये को पूर्ण परिवर्तनीय बनाने की है। अभी सिर्फ करेंट अकाउंट पर ही रुपये को परिवर्तनीय बनाने की मंजूरी है। चूंकि विश्व में भारत की मुद्रा बहुत मजबूत नहीं मानी जाती, इसलिए आशंका रहेगी कि रुपये को पूर्ण परिवर्तनीय बनाने पर इसकी दर में अनावश्यक गिरावट आ सकती है। बाजार के मैन्यूप्लेटर भारतीय मुद्रा को कभी भी दबाव में ला सकते हैं। दूसरी सबसे बड़ी चुनौती यह होगी वैश्विक व्यापार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की। इस समय भारत का वैश्विक व्यापार में हिस्सा 2 फीसदी से भी कम है और इस स्तर पर हम वैश्विक व्यापार को अपने हिसाब से नहीं चला सकते। इसलिए रुपये को वैश्विक मुद्रा के तौर पर इस्तेमाल करने की गुंजाइश फिलहाल बहुत नहीं है। हां द्विपक्षीय व्यापारों में हम रुपये का उपयोग लेन देन के लिए कर रहे हैं और इसके बढ़ते जाने की संभावना है।
नरेंद्र मोदी की सरकार ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत वर्ष 2047 तक भारत का विश्व व्यापार में हिस्सा 10 फीसदी करने का लक्ष्य रखा है। यदि यह संभव हुआ तो यह भी संभव होगा कि दुनिया हमसे हमारी मुद्रा में व्यापार करने को तैयार हो और रुपये को रिजर्व मनी के रूप में भी रखना शुरू कर दे। लेकिन तब तक निर्यात बढ़ाने पर ही जोर देना होगा, ताकि आयात हेतु डॉलर की जरूरत कम हो सके।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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