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वैश्विक मंदी के आसन्न संकट में भारतीय अर्थव्यवस्था की चुनौतियां

पूरी दुनिया में मंदी के बादल मंडरा रहे हैं। दुनिया भर के अर्थशास्त्री आशंकित और सशंकित हैं। दुनिया का सप्लाई चेन लगातार तीन साल से कोरोना और रूस यूक्रेन युद्ध जैसे अनियंत्रित कारणों से प्रभावित है। कोरोना ने खपत को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया था और रूस यूक्रेन युद्ध आपूर्ति को प्रभावित कर रहा है। पहले लोगों ने खरीदना कम कर दिया और अब दुनिया में आपूर्ति मुश्किल हो रही है। इससे अर्थशास्त्रियों को मंदी की आहट सुनाई दे रही है। इस मंदी की आहट को समझने के लिये सबसे पहले हमें समझना पड़ेगा कि मंदी कहते किसे हैं?

Risks for Indian Economy in emerging global crisis

जब लोग अर्थव्यवस्था में अपने खर्च को संकुचित कर लेते हैं तो उत्पाद के उत्पादन से लेकर सेवा की आपूर्ति तक में गिरावट आ जाती है, और यही जीडीपी के आंकड़ों में परिलक्षित होने लगता है। यदि लगातार कई महीनों तक जीडीपी नीचे जाती है तो लोग कहते हैं की मंदी आ गई। दरअसल जीडीपी का गिरना केवल एक परिणाम का थर्मामीटर है असल वजह है बाजार में खरीददारी कम हो गई जिसके कारण उत्पादन और सेवा की आपूर्ति दोनों कम हो गई। कुछ ने हालात के कारण हाथ सिकोड़ लिया तो कुछ ने बचत की आदतों में वृद्धि कर ली। आर्थिक मोर्चे पर संघर्ष बढ़ने से लोगों ने घर, गाड़ी समेत पूंजीगत खर्चों को नियंत्रित करना शुरू कर दिया। स्टॉक मार्केट भी कभी ऊपर कभी नीचे हो रहे हैं। हालाँकि स्टॉक मार्केट की बड़ी वजह घरेलू के साथ साथ ग्लोबल स्तर पर कमजोर संकेतक हैं और ब्याजदरों में हर जगह बदलाव के कारण विदेशी निवेशकों की बिकवाली है।

सरकार और रिज़र्व बैंक भी इसकी गंभीरता को समझ रहें हैं। अंतरराष्ट्रीय मंदी के साथ आई महंगाई की आहट उन्हें भी है। हालांकि रिजर्व बैंक ब्याज दर के माध्यम से इसे नियंत्रित करने का प्रयास कर रही है वही पर्याप्त नहीं है क्यूंकि इसके साइड इफ़ेक्ट में होम लोन, ग्राहक लोन और व्हीकल लोन की किश्त बढ़ रही है जिससे आम आदमी दूसरी तरफ से मार खा जा रहा है। लोग घर, सामान और गाड़ी खरीदना कम कर रहें हैं। इसके कारण इन उद्योगों के अलावा इनसे जुड़े अनेक काम धंधों पर भी क्रमिक प्रभाव पड़ रहा है।

इसके पहले भी वैश्विक मंदी आती थी लेकिन उसके प्रभाव हमारे ऊपर कम पड़ते थे। कारण भारत की व्यवस्था सनातनी अर्थव्यवस्था थी और दुनिया के व्यापार व्यवस्था से कभी इतना ज्यादा जुड़ी नहीं थी कि उसका प्रभाव यहां भी आ जाये। यहां पहले से नगदी की एक समानान्तर अर्थव्यवस्था थी।

माइक्रो इकॉनमी के एक जाल से पूरा देश बंधा था जिसमें सब कमाते खाते थे। सबका पेट भरता था। कोई फैक्ट्री वाला कभी अपने बीच के चैनल को किनारे करके सीधे ग्राहक को माल बेचने की नहीं सोचता था। इससे फैक्ट्री से निकला तैयार माल सबका पोषण और आय का बंटवारा करते हुये अंतिम हाथों में पहुंचता था। ग्राहक को स्वार्थी बनाने की मुहिम नहीं थी और वह जनभागीदारी व्यवस्था से जुड़ा हुआ था।

बचत की एक पारंपरिक व्यवस्था थी जिसे यह उपभोक्तावादी डिजिटल इकॉनमी धीरे धीरे कम करती जा रही है। जितना ज्यादा हम डिजिटल होते जा रहें हैं उतना ही हम ग्लोबल इकॉनमी के अंग होते जायेंगे। ऐसे में ग्लोबल इकॉनमी में आई किसी रुकावट से प्रभावित हुए बिना हम रह नहीं पायेंगे। इस कारण जब भी वैश्विक मंदी आयेगी तो जो भी इकॉनमी वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ी होगी, इससे अछूती रह नहीं सकती। जबकि ऐसी परिस्थिति में समानान्तर इकॉनमी बच जाती है।

समानांतर अर्थव्यवस्था का लगातार कम होना भी मंदी के प्रभाव को भारत में बढ़ा रहा है। देश अभी अपने आपको नोटबंदी के बाद समायोजित कर रहा था तभी उसे खुद को जीएसटी के हिसाब से भी समायोजित करना पड़ा। जब किसी भी सिस्टम को लगातार अपने आपको दो बार समायोजित करना पड़े तो रिकवरी में समय लगता ही है और अगर इसी वक़्त किसी वायरस का अटैक हो जाये, मुख्य आपूर्तिकर्ता और ग्राहक में ही युद्ध छिड़ जाए तो सबका समय ख़राब हो जाता है।

वही हुआ और भारत पर चौतरफा मार पड़ी। हालांकि भारत अभी भी लड़ रहा है, खड़ा हो जा रहा है क्योंकि हम अभी भी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था हैं। पारंपरिक अर्थव्यवस्था अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है। हम पूरी दुनिया से कटने के बाद भी कई दशकों तक अपने पोषण का सामर्थ्य रखते हैं। यही कारण है कि 140 करोड़ खरीददारों की एक बड़ी संख्या के कारण दुनिया हमारी तरफ ही देखती है।

नोटबंदी और जीएसटी ने भी अच्छे उद्देश्य से किये गए प्रयास के बाद भी अच्छा परिणाम नहीं दिया है। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए ये दो ऐसे उपाय थे जिनका सकारात्मक असर होना चाहिए था लेकिन तभी हमारी किस्मत हमारे खिलाफ हो गई। लगातार दो ट्रीटमेंट के कारण हम सुस्त थे, हमारा इम्यून सिस्टम सुस्त था, इसी में कोरोना और यूक्रेन युद्ध ने समय और ख़राब कर दिया। यहां यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि नोटबंदी और जीएसटी अच्छे कदम थे, ये बात अलग है कि इसके फायदे हम नहीं ले पा रहे हैं।

मंदी का जो एक और कारण है वह ग्राहक व्यवहार में परिवर्तन तथा ई कॉमर्स कम्पनियों की गांव कस्बों तक पहुँच। त्यौहारों या सामान्य दिनों में भी गांव कस्बों के दुकानदारों की बिक्री कम होती जा रही है। कस्बों और कस्बों से जुड़े गाँवों के लोग अब ऑनलाइन खरीददारी करने लगे हैं। कॅश ऑन डिलीवरी विकल्प होने के कारण उनको पैसा तभी देना पड़ रहा है जब माल मिल रहा है। ऐसे में कस्बाई और ग्रामीण ग्राहक स्मार्ट मोबाइल के इस दौर में परंपरागत बाजार से दूर होता जा रहा है जिससे स्थानीय बाजार का टर्नओवर कम हो रहा है।

अगर सरकार की ओएनडीसी योजना यूपीआई की तर्ज पर सब दुकानदारों तक जल्द से जल्द नहीं पहुंचाई गयी तो सैकड़ों साल से भारतीय परंपरागत अर्थव्यवस्था में, जिसमें सामूहिक रूप से सब सुरक्षित रहते थे, ई कॉमर्स कंपनियां बड़ा छेद कर देंगी।

ओएनडीसी के माध्यम से सरकार बड़ी ई कॉमर्स कम्पनियों के लिए यह अनिवार्य कर दे कि वह किसी भी क्षेत्र में डिलीवरी शुरू करने से पहले वहां के स्थानीय दुकानदारों को अपना प्लेटफार्म दे और पंजीयन कराये और थर्ड पार्टी ऑनलाइन ऑफर से उन्हें सज्जित करे। उसके प्लेटफार्म पर कोई आर्डर आने पर सबसे पहले उस क्षेत्र के निश्चित परिधि में पड़ने वाले दुकानदारों से ही उस आर्डर की पूर्ति करे, बनिस्बत कि दूरस्थ क्षेत्र के व्यापारी से।

यदि उनके यहाँ विकल्प उपलब्ध नहीं हो तभी वह दूसरे दूरस्थ व्यापारियों से माल की पूर्ति का विकल्प दे। इसकी पूरी डिजिटल लॉग मौजूद हो ताकि अगर वह गलती करें तो पकड़ में आये। ओएनडीसी में बड़ी ई कॉमर्स कंपनियों को वही सिस्टम अपनाना चाहिए जो ज़ोमैटो या स्विगी अपनाती हैं जिसमें वह एक निश्चित सीमा के तहत पड़ने वाले रेस्टोरेंट से ही आर्डर की पूर्ति करती हैं।

अगर जल्दी से ओएनडीसी की तकनीक का बेहतर इस्तेमाल, नियमन, और इसकी खूबियों से स्थानीय दुकानदारों को जोड़ते हुए स्थानीय बाजार के सरंक्षण का काम नहीं किया जायेगा तो अगला साल और भारी पड़ जायेगा।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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