Inflation and RBI: अकेले रिजर्व बैंक नहीं रोक सकती महंगाई
महंगाई रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल ही में ‘रेपो रेट’ इस उम्मीद के साथ बढ़ाई है कि इससे महंगाई पर नियंत्रण होगा। लेकिन अकेले रिजर्व बैंक के उपायों से मंहगाई रुकने वाली नहीं है।

Inflation and RBI: महंगाई की चर्चा फिलहाल दुनिया भर में है। कोरोना महामारी और यूक्रेन-रूस युद्ध को इस महंगाई के लिए ज़िम्मेवार बताकर सरकारें भी अपना पल्ला झाड़ रही हैं। वैसे भारत सरकार तो महंगाई पर कम ही बोलती है, जो भी बोलना है सरकार के विरोधी पक्ष बोलते है।
वैसे इस देश में महंगाई नई नहीं है। स्वतंत्रता के बाद कोई अगर लगातार इस देश की जनता के साथ बढ़ता रहा है तो वह महंगाई ही है। यह जरूर है कि पहले देश के पास जनता को खिलाने के लिए अनाज भी नहीं था। अब कम से कम सरकार जरूरतमंदों को कम कीमत पर अनाज तो बांट रही है।
पैसे वाले तो कम कीमत वाली चीज लेना पसंद ही नहीं करते इसलिए उनको महंगाई से कुछ सरोकार नहीं होता। सरकारी बाबुओं ने भी महंगाई भत्ता के जरिये इसका हल ढूंढ निकाला है। राजनेताओं को तो बस किसी भी तरीके से एक बार एमएलए या एमपी बनना है और जिंदगी भर बढ़ते महंगाई सूचकांक के साथ पेंशन लेनी है। बाकी बची हुई जनता को जरूर महंगाई सताती है।
होती क्या है यह महंगाई?
आदमी को जब अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए दूसरों की वस्तुओं और सेवाओं की चाह उत्पन्न हुई तब चीजों का आदान प्रदान शुरू हुआ और इस आदान-प्रदान में आ रही कमियाँ दूर करने के लिए पैसा माध्यम बना। वस्तुओं-सेवाओं का व्यापार बढ़ा, बाजार लगने लगे और उद्योग वगैरह भी बढ़े। फिर भी जरूरतें और चीजों की उपलब्धता में दरार आती रही जिससे लेन-देन में कीमतों का असर दिखने लगा। जब जरूरत के मुक़ाबले वस्तुएं कम रहीं तो कीमतें बढ़ने लगीं और इस बढ़ती कीमतों की स्थिति को महंगाई कहना शुरू हुआ। वैसे महंगाई की बात सामान्य रूप में होती है और उसको गिनने का कोई सही तरीका है ऐसा भी नहीं। महंगाई को 'सामान्य' या 'औसत' के रूप में ही देखा सुना जाता है। सभी वस्तु की कीमतें एक जैसी ना ही बढ़ती है ना ही कम होती है।
नियंत्रण में ही रही है भारत में महंगाई
भारत में हमेशा महंगाई रही है लेकिन कई देशों के मुक़ाबले में कम ही रही। भारत में स्वतंत्रता के बाद 1974 में महंगाई की दर 28% से भी ज्यादा पाई गई थी जिससे चलते आंदोलन भी चला और जनता को आपात काल का भी सामना करना पड़ा था। उसके पहले भी चीन से हुए युद्ध के बाद महंगाई बढ़ी जो 1964 में 13-14% तक पहुँच गई थी। 1965 के पाकिस्तान से हुए युद्ध और 1965-66 के सूखे के बाद भी महंगाई बढ़ी थी। बाकी सभी सालों में महंगाई दर 10 प्रतिशत या उससे कम ही रही।
आपातकाल के दौरान (1976) तो कीमतें बढ़ी नहीं बल्कि कम हुई थीं। दुनिया के संदर्भ में देखा जाए तो ज्यादातर समय भारत में औसत महंगाई दर ज्यादा रही। वैसे देखा जाए तो 1960 से लेकर 2021 तक महंगाई की औसत दर 7.5 % के आस पास रही। अगर हिसाब किया जाए तो 1960 में जो 100 रुपये की कीमत थी वह अब 7805 रुपए की हो गई है। महंगाई नियंत्रण में रहने का कारण जैसे कृषि उत्पादन का बढ़ना है वैसे ही देश में रही राजकीय और आर्थिक स्थिरता भी है। भारतीय रिजर्व बैंक की भूमिका भी इस विषय में कम नहीं आँकी जा सकती।
महंगाई रोकने के लिए सरकार क्या करती है?
सरकार पर महंगाई रोकने की जिम्मेवारी होती है। पहले, कुछ आवश्यक वस्तु-सेवाओं की कीमतें तय करके और उसकी राशनिंग करके रास्ता निकाला जाता है। भारतीयों के लिए 25-30 साल पहले राशन व्यवस्था एक आम बात थी। सब चीजों के लिए इंतजार करना पड़ता था और नंबर लगाना पड़ता था चाहे स्कूटर हो या फिर टेलीफ़ोन। इस व्यवस्था में चीनी, गेंहू, चावल और मिट्टी तेल (घासलेट) मुख्य थे। इसके लिए उत्पादन का एक हिस्सा तय कीमत पर सरकार को देना पड़ता था जिसे 'लेवी' कहते थे।
दूसरे, सरकार चीजों की जमाखोरी पर रोक लगाती है जिससे बाजार में वस्तुएं उपलब्ध रहें। उसके लिए कानून का भी सहारा लिया जाता है। तीसरे, सरकार के खर्चे सरकारी आय के अनुपात में कम होने से वित्तीय नुकसान कम होता है। भारत सरकार के बजट हमेशा से बजटीय घाटे वाले रहे हैं और अपने रोज के खर्चे भी सरकार को कर्जे लेकर करने पड़ते हैं, जो महंगाई का एक कारण बनते हैं। चौथे, सरकार वस्तुओं की कमी उत्पादन बढ़ाकर या आयात अनुमति देकर कर सकती है जिससे बढ़ती कीमतों को रोका जा सके।
रिजर्व बैंक क्या करती है?
भारतीय रिजर्व बैंक भारतीय आर्थिक क्षेत्र की वित्तीय स्थिति को संभालती है जिसमें सारी वित्तीय संस्थाएँ और उनकी कार्यप्रणाली आती है। भारतीय वित्तीय चलन जिसको रुपया कहते है उसको भी नियंत्रित करने का काम रिजर्व बैंक करती है। यह माना जाता है कि आर्थिक व्यवस्था में बहुत ज्यादा वित्तीय साधनों की उपलब्धता महंगाई को बढ़ाती है क्योंकि बाजार में वस्तु-सेवाओं का व्यापार या व्यवहार पैसों के जरिये ही होता है और ज्यादा पैसे होने या वस्तु-सेवाओं की कमतरता रहने पर कीमतों पर असर पड़ता है।
रिजर्व बैंक भी यही कोशिश करती है कि जितना जरूरी हो उतना ही पैसा बाजार में रहे। इसलिए जब कीमतें बढ़ने लगती है तो रिजर्व बैंक वित्तीय प्रवाह को कम करने की कोशिश करता है। इस प्रवाह को कम ज्यादा करने के लिए रिजर्व बैंक कई साधनों का उपयोग करती है जिसमें, रेपो रेट, रिर्वस रेपो रेट, बैंक रेट मुख्य कहे जा सकते हैं। और भी ऐसे ही साधन है जिसे रिजर्व बैंक उपयोग में लाती है जिससे बैंकों तथा वित्तीय संस्थाओं के पास नगद की आवक को नियंत्रित कर सके। ऐसा करने से कीमतों पर अपेक्षित और अनुकूल प्रभाव पड़ता है।
रिजर्व बैंक अकेले महंगाई कम नहीं कर सकती
निश्चित तौर पर यह कहा जा सकता है कि रिजर्व बैंक अकेले महंगाई कम करने के लिए बहुत कुछ नहीं कर सकती क्योंकि महंगाई बाजार में उपलब्ध वस्तुओं व सेवाओं की स्थिति और उनकी जरूरत एवं कीमत देने की क्षमता पर निर्भर करता है। किसी भी वस्तु का उत्पादन बढ़ाना इतना आसान नहीं होता। भारत अभी भी कृषि प्रधान देश है और कृषि उत्पादन प्रकृति पर निर्भर है। कृषि उत्पादन में हुए बदलाव का परिणाम कीमतों पर पड़ना स्वाभाविक है और उसे सिर्फ वित्तीय प्रवाह से रोका नहीं जा सकता।
सरकार की सक्रियता और बाजार में हो रही अपेक्षित वस्तुओं की कमी पर समय रहते कदम उठाना उतना ही जरूरी है। सरकार को अपने खर्चे पर भी नियंत्रण रखना और वित्तीय घाटे को भी कम करना होगा। इसके साथ ही जमाखोरी पर सख्ती से लगाम लगाकर ही मंहगाई को रोकने में मदद मिल सकती है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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