Ram Janmbhumi Mandir: कैसे होगी अपूर्ण मंदिर में संपूर्ण प्राण प्रतिष्ठा?

Ram Janmbhumi Mandir: मंगलवार 16 जनवरी को प्रथम यजमान अनिल मिश्र और उनकी पत्नी के प्रायश्चित स्नान के साथ अयोध्या में भव्य रामलला के मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रमों की शुरुआत हो गयी।

उसी दिन प्रथम यजमान ने अरुण योगीराज के द्वारा निर्मित रामलला की मूर्ति ग्रहण की और विधि विधान से पूजा पाठ के साथ मूर्ति के नयनों पर पट्टिका बांध दी गयी।

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अब यह पट्टिका वह खोलेगा जो रामलला को उनके आसन पर विराजमान करेगा। मूर्ति के प्राण प्रतिष्ठा की यह पहली विधि है। इसके बाद अन्य तरह के कार्य हैं जिसमें मूर्ति का नगर भ्रमण के स्थान पर परिसर में ही भ्रमण कर लिया गया है। अब मूर्ति का विभिन्न प्रकार की जड़ी बूटियों, नदियों के जल आदि से स्नान, षोडषोपचार पूजन इत्यादि होंगे, जो 22 जनवरी तक अनवरत चलते रहेंगे। इसके साथ ही समानांतर रूप से विशाल यज्ञ हवन का आयोजन किया गया है। 22 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा रामलला को उनके आसन पर विराजमान किया जाएगा। इस तरह 22 जनवरी को सप्ताह भर चलनेवाले प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रमों का समापन हो जाएगा।

लेकिन इस बीच कुछ लोग यह सवाल भी उठा रहे हैं कि अर्धनिर्मित मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा आखिर किस प्रकार से की जा सकती है। सवाल उठाने वाले वही लोग हैं जो कल तक राम के अस्तित्व को ही नकार रहे थे। अब जब उन्हें लग रहा है कि ऐसा करना संभव नहीं रहा तो तरह तरह के तर्क वितर्क करके रामजन्मभूमि की तरह राम मंदिर निर्माण को भी विवादित रखना चाहते हैं। लेकिन क्या सचमुच शास्त्रीय विधि से ऐसा किया जाना गलत है?

इस सवाल का उत्तर जानने के लिए उन्हीं गणेश्वर शास्त्री द्राविड़ से पास पहुंचना होगा जो इस प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के मुख्य पुरोहित हैं। वे जाने माने ज्योतिषी और वाराणसी स्थित श्रीवल्लभराम शालिग्राम शांगवेद विद्यालय के प्रमुख आचार्य हैं। महाराष्ट्र के बबनराव मस्के ने उन्हें पत्र लिखकर प्रश्न पूछा था कि "क्या शिखर का कार्य पूर्ण न होने की स्थिति में श्रीराम मंदिर में रामजी की प्राण प्रतिष्ठा शास्त्र सम्मत है?"

इस प्रश्न का उत्तर देते हुए शास्त्री जी ने शास्त्रों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया है कि "देव मंदिर की प्रतिष्ठा दो प्रकार से होती है। पहला संपूर्ण मंदिर बन जाने पर और दूसरा मंदिर में कुछ काम शेष रहने पर भी। जहांं संपूर्ण मंदिर बन जाने पर देव की प्रतिष्ठा होती है वहां गर्भगृह में देव प्रतिष्ठा होने पर कलश की स्थापना सन्यासी द्वारा की जाती है। वैसी स्थिति में कलश स्थापना गृहस्थ के द्वारा नहीं की जा सकती। लेकिन जहां मंदिर का निर्माण अपूर्ण है वहां किसी अलग शुभ दिन में कलश स्थापना विधि विधान से किया जा सकता है।" अर्थात अब राम मंदिर का शिखर बन जाने के बाद अलग से कलश स्थापना होगी।

इसके लिए गणेश्वरशास्त्री ने 'कर्मकांड प्रदीप' से उद्धरण देते हुए बताया है कि शास्त्रों में अलग से कलश स्थापना की विधि बताई गयी है। गणेश्वरशास्त्री ने ईश्वर संहिता और नारद पुराण से भी यह बात सिद्ध की है कि मंदिर में अलग से कलश स्थापना विधि विधान से की जा सकती है। ईश्वर संहिता अध्याय 3 और नारदपुराण के अध्याय 56 में इस संबंध में वचन कहे गये हैं। नारद पुराण के अनुसार मंदिर में कपाट तब तक नहीं लगता जब तक मंदिर की छत न बन जाए। इस दृष्टि से अयोध्या के राम मंदिर के प्रथम तल का निर्माण पूर्ण हो चुका है और मंदिर के प्रथम तल में स्वर्ण कपाट भी लगाये जा चुके हैं।

गर्भगृह को भी चारों ओर से ढंककर दीवारें खड़ी हैं, अर्थात उस स्थान पर देवता की स्थापना की जा सकती है। इसके साथ ही मंदिर में देवता की प्राण प्रतिष्ठा के पहले वास्तुशांतिपूजा और ब्राह्मणभोज का उल्लेख भी गणेश्वर शास्त्री ने अपने वक्तव्य में किया है। इस अनुसार भी सभी कार्य संपूर्ण करके ही 22 जनवरी को अयोध्या के रामलला मंदिर में उनको विराजमान किया जाएगा।

जहां तक 22 जनवरी अर्थात पौषशुक्ल द्वादशी की तिथि का सवाल है तो इसका उत्तर भी गणेश्वर शास्त्री ने दिया है। उन्होंने अपने वक्तव्य में लिखा है कि "माघ फागुन (फरवरी मार्च) में कहीं बाणशुद्धियोग नहीं मिलता तो कहीं तिथियों और पक्ष की शुद्धि नहीं मिलती। फिर 14 मार्च से खरमास शुरु हो रहा है इसलिए इस मास में भी कोई पवित्र कार्य नहीं किया जाता। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा जो चैत्र नवरात्र का पहला दिन होता है उसको लेकर भी शास्त्री जी ने शंका व्यक्त की है।

इस तरह अलग अलग संभावित तिथियों का विस्तार से वर्णन करते हुए गणेश्वरशास्त्री ने कहा है कि अगर 22 जनवरी को श्रीरामजन्मभूमि में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा नहीं होती तो 16 जून 2026 तक इससे पवित्र कोई तिथि नहीं है जिसमें रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की जा सके। इसलिए समस्त विचार विमर्श और काल गणना के बाद 22 जनवरी की तिथि निश्चित की गयी जिस पर अब तक देश के किसी ज्योतिषी ने अपना विरोध प्रकट नहीं किया है। गणेश्वरशास्त्री ने यहां तक दावा किया है कि पूर्व में अगर मंदिर टूटा है तो इसके पीछे कहीं न कहीं गलत तिथि में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा भी एक कारण हो सकती है। अत: इन सभी तथ्यों का ध्यान रखकर ही पौषशुक्ल द्वादसी अर्थात 22 जनवरी 2024 की तिथि प्राण प्रतिष्ठा के लिए निश्चित की गयी है।

यह तो हुआ मुख्य पुरोहित और ज्योतिष शास्त्र के विद्वान गणेश्वर शास्त्री का विवरण। लेकिन देश में ऐसे राजनेता और उनके समर्थकों की कमी नहीं है जो इतने के बावजूद यह साबित करने में लगे हुए है कि 22 जनवरी की तिथि अगले आम चुनाव को ध्यान में रखकर तय की गयी है ताकि बीजेपी को इसका फायदा मिल सके।

हालांकि राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के बाद भी निर्माण कार्य जारी रहेगा जिसे दिसंबर 2024 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। अगर संपूर्ण मंदिर निर्माण के बाद की कोई तिथि निश्चित करनी होती तो भी उचित मुहूर्त के लिए लगभग डेढ वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ती। निश्चित रूप से रामजन्मभूमि पर राम मंदिर निर्माण के लिए सदियों से अधीर हिन्दू समाज के लिए निर्माण हो जाने के बाद भी डेढ वर्ष की यह दूरी बहुत भारी लगती। संभवत: इसीलिए ट्रस्ट द्वारा मंदिर निर्माण का प्रथम चरण पूरा करने के साथ ही रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का निर्णय लिया।

हमें यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए कि शुरुआत में मंदिर निर्माण की योजना दो ही तल की थी। सुप्रीम कोर्ट से निर्णय आने के बाद इसे तीन तल का कर दिया गया। इसके कारण लगभग एक वर्ष का कार्य बढ़ गया। अगर ऐसा नहीं होता तो संभव है कि राम मंदिर में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा और कलशस्थापना एक साथ ही कर दिया जाता। मंदिर का कार्यक्षेत्र और समयसीमा बढ़ी तथा 22 जनवरी के बाद 16 जून 2026 तक किसी शुभ तिथि के अभाव में ही अपूर्ण मंदिर में संपूर्ण प्राण प्रतिष्ठा का निर्णय लिया गया होगा। राजनीतिक रूप से भले ही इसे मुद्दा बनाया जाए लेकिन शास्त्रीय और ज्योतिषीय विधान से यह अनुचित नहीं है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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