New Districts: क्या हमें बड़े राज्यों और विशालकाय जिलों की जरूरत है?
New Districts: राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार ने एकसाथ 19 नये जिले बनाने की मंजूरी देकर प्रदेश में जिलों की कुल संख्या 50 कर दी है। भूभाग के हिसाब से राजस्थान देश का पहला और जनसंख्या के हिसाब से सातवां राज्य है। राज्य का कुल भूभाग 3 लाख 42 हजार वर्गकिलोमीटर है और राज्य की जनसंख्या 7 करोड़ के आसपास है। निश्चय ही राजस्थान के पास जनसंख्या के अनुपात में बड़ा भूभाग है। लेकिन क्योंकि राजस्थान अपनी मरुभूमि के लिए भी पहचाना जाता है इसलिए भूभाग के मुकाबले में जनसंख्या का यह अनुपात अनुचित नहीं है।
लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार या बंगाल जैसे राज्यों में जनसंख्या के मुकाबले भूभाग का अनुपात सीमित है। जैसे जनसंख्या के लिहाज से उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है लेकिन भूभाग के हिसाब से वह देश का चौथा बड़ा राज्य है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के पास भूभाग उत्तर प्रदेश के मुकाबले अधिक है और जनसंख्या के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है। कुछ यही हाल बंगाल और बिहार का भी है। अब भूभाग बड़ा हो या जनसंख्या दोनों ही परिस्थितियों में प्रशासन की छोटी इकाइयां जनता और शासन दोनों के लिए हितकारी रहती हैं।

अगर जनसंख्या भले कम है और भूभाग बड़ा है तो भी प्रशासन तक जनता की पहुंच और जनता तक प्रशासन की पहुंच कठिन होती है। इसके उलट अगर भूभाग छोटा हो और जनसंख्या अधिक हो तो भी शासन और जनता दोनों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में छोटे जिले और छोटे राज्य दोनों ही बेहतर तरीके से काम करते हैं। उनके पास विकसित होने के लिए केवल आर्थिक ही नहीं बल्कि उनका सामाजिक और सांस्कृतिक आधार मजबूत होता है।
मसलन राजस्थान में गठित रामलुभाया ने मार्च में अपनी रिपोर्ट देते हुए कहा था कि उन्हें तो 60 नये जिले बनाने के प्रस्ताव मिले थे। इसमें से सरकार ने सिर्फ 19 को ही जिला बनाया है। इसका मतलब यह है कि नये जिले बनाने की मांग यहीं रुकने वाली नहीं है। आनेवाले समय में नये नये जिले बनाने की मांग राजस्थान में जारी रहेगी। यह केवल राजस्थान की ही बात नहीं है। देश के लगभग हर राज्य में नये जिलों को बनाने की मांग होती रहती है। लेकिन कुछ प्रशासनिक खर्चों में कमी तथा कुछ राजनीतिक कारणों से इन मांगों पर राज्य सरकारों द्वारा अधिक ध्यान नहीं दिया जाता।
2001 में भारत में कुल 593 जिले थे। 2011 में बढकर 640 हो गये और अगस्त 2022 तक भारत में कुल जिलों की संख्या 766 पहुंच गयी। अगर राजस्थान की रामलुभाया कमेटी की बात को सुनें तो अकेले राजस्थान में ही अभी कम से कम 40 जिलों की मांग और हो रही है। यही हाल देश के दूसरे राज्यों का भी है। कहीं जनसंख्या के कारण तो कहीं जिलों के बड़े आकार के कारण नये नये जिलों की मांग की जा रही है। महाराष्ट्र में 22 नये जिले बनाने का प्रस्ताव कुछ साल पहले कांग्रेस ही लेकर आ चुकी है। उत्तर प्रदेश में मायावती ने नये जिले बनाये थे। उसके बाद पिछली योगी सरकार में भी प्रदेश के कुछ बड़े जिलों के बंटवारे का प्लान बना था लेकिन आज तक उसे पूरा नहीं किया गया।
जैसे केन्द्र सरकार नये राज्य बनाने को लेकर अधिक उत्साहित नहीं रहती उसी तरह राज्य सरकारें भी नये जिले बनाने के लिए अधिक उत्साहित नहीं रहतीं। इसके पीछे के कारण बहुतेरे हो सकते हैं लेकिन दोनों ही स्तर पर जो एक बात समझने की कोशिश नहीं की जाती वह यह कि भारत की सामाजिक संरचना ऐसी है कि वह भाषाई और सांस्कृतिक परंपरा के आधार पर विकसित हुआ है। जैसे उत्तर प्रदेश में मुख्य रूप से पांच भाषाएं प्रचलित हैं। अवधी, भोजपुरी, ब्रज, बुन्देली और खड़ी बोली। जो अवधी भाषा का भूभाग है उसके अंदर आप जाएंगे तो पायेंगे कि कुछ कुछ अंतराल पर उनमें अवधी के भी अलग अलग संस्करण मिलते जाएंगे।
भाषा के ये अलग संस्करण सिर्फ एक नयी बोली ही नहीं होती बल्कि एक प्रकार की सांस्कृतिक ईकाई होती है। अगर इसके आधार पर जिले की पहचान की जाए तो वर्तमान में जो बड़े बड़े जिले हैं उनमें से ज्यादातर दो या तीन हिस्से में बंट जाएंगे। इससे न केवल जनता को प्रशासनिक सुविधा प्राप्त होगी बल्कि उन्हें अपनी स्थानीय सांस्कृतिक पहचान भी मिल जाएगी। बड़े जिलों से अलग करके जहां छोटे जिले बनाये गये हैं उनके यहां आर्थिक विकास की गति बड़े जिले के बनिस्बत बेहतर है। प्रशासनिक पहुंच, सड़क, बिजली सहित अन्य आधारभूत ढांचा बेहतर हुआ है।
यही हाल राज्य का भी है। अभी जो राज्य हैं, खासकर उत्तर भारत में वो किस आधार पर बनाये गये हैं, वह बहुत स्पष्ट नहीं है। ब्रिटिश शासन के दौरान बड़े बड़े प्रोविन्स की जो अवधारणा थी आज भी लगभग उसी को हम ढो रहे हैं। लेकिन एक एक राज्य में कई कई स्थानीय बोलियों या संस्कृतियों को समाहित किया गया है। इससे जितने भी हिन्दीभाषी राज्य हैं वो एक सांस्कृतिक संकट से गुजर रहे हैं। एक ही राज्य में कई प्रकार की संस्कृतियां पल रही हैं इसलिए उस राज्य की वास्तविक पहचान नहीं बन पा रही है। यहां रहनेवाले लोग अपनी राज्य वाली पहचान की जगह अपनी परंपरागत स्थानीय पहचान को लेकर ही चल रहे हैं।
जैसे बिहार, यूपी, एमपी ये सब राज्य कृत्रिम राज्य हैं जबकि एक ही राज्य में अनेक प्रकार की सांस्कृतिक पहचान वाले लोग हैं। यही उनकी अपनी वास्तविक पहचान है। इसी तरह बिहार में मैथिल और भोजपुरी की पहचान हो या फिर यूपी में अवध या ब्रज क्षेत्र की पहचान हो या राजस्थान में मारवाड़ और मेवाड़ की पहचान। मध्य प्रदेश में मालवा और बुन्देल की पहचान हो या महाराष्ट्र में विदर्भ और कोंकण की पहचान। इन राज्यों के भीतर उनकी अपनी स्थानीय पहचान ही प्रमुख होती है और राज्य के भीतर ही नहीं बाहर भी वो अपनी उसी पहचान के साथ सहज होते हैं।
अगर इसी पहचान को नये राज्यों के गठन का आधार बनाया जाए तो इसमें नुकसान होने की बजाय उसका लाभ ही मिलेगा। एक कृत्रिम पहचान की बजाय जब किसी व्यक्ति को उसकी वास्तविक पहचान से जीवन जीना होता है तो उसके प्रति उसका लगाव और समर्पण अधिक होता है। वह अपनी इस पहचान को मजबूत करने के लिए पूरे समर्पण से कार्य करता है। अगर केन्द्र सरकार इस दिशा में सोचे तो आश्चर्यजनक रूप से न केवल राज्यों के भीतर चल रहा क्षेत्रवाद समाप्त होगा बल्कि इनकी आर्थिक उत्पादता में भी बढोत्तरी होगी।
अतीत में वृहत्तर भारत की संरचना जनपद और महाजनपद वाली ही रही है। आश्चर्यजनक रूप से शताब्दियों बाद आज भी भारत में लोग उसी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को पकड़े हुए हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये पहचान थोपी हुई नहीं है। इसे उन्हें किसी ने नहीं दिया है बल्कि यह उनकी अपनी माटी की पहचान है। लेकिन मुगल काल और ब्रिटिश शासन के दौरान जो राजस्व व्यवस्था बनायी गयी उसमें इन बातों की पूरी तरह से अनदेखी की गयी। ब्रिटिश शासकों ने जिस डिस्ट्रिक्ट, कमिश्ननरी और स्टेट की रचना की उसमें स्थानीय संस्कृति को बचाने से अधिक उसे नष्ट करने के उपाय किये गये। उनके लिए यह सुविधाजनक रहा होगा, लेकिन स्वतंत्र भारत के लिए क्या उसी पैटर्न पर लगातार चलते जाना सुविधाजनक कहा जाएगा?
केन्द्र सरकार को चाहिए कि वह छोटे राज्यों के बारे में विचार करे तो राज्यों को चाहिए कि वह छोटे जिलों के बारे में जरूर सोचें। ऐसा करते समय ब्रिटिश हुकूमत वाला तरीका अपनाने की बजाय जनपद और महाजनपद वाली व्यवस्था को परखें तो शायद हमें ज्यादा संतोषजनक परिणाम प्राप्त होगा। अगर केन्द्र और राज्य सरकारें ऐसा करती हैं तो इसका सीधा लाभ न केवर स्थानीय जनता को मिलेगा बल्कि भारत ज्यादा सशक्त और विविधता में एकता वाला मजबूत राष्ट्र बनकर उभरेगा। 2001 में बनाये गये छत्तीसगढ, झारखंड और उत्तराखंड बीस सालों में इस बात को साबित कर चुके हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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