Gehlot vs Pilot: गहलोत के रहते सचिन पायलट मुख्यमंत्री बनना भूल जाएं

Gehlot vs Pilot: वैसे तो अशोक गहलोत ने जिस दिन कांग्रेस अध्यक्ष का पद ठुकराया था, उसी दिन उन्होंने तय कर लिया था कि वह सचिन पायलट को किसी भी हालत में मुख्यमंत्री नहीं बनने देंगे। लेकिन 25 सितंबर की घटना से सोनिया गांधी बहुत खफा थी, क्योंकि उस दिन अशोक गहलोत के समर्थक विधायकों ने उनके प्रतिनिधि 80 साल के मल्लिकार्जुन खड्गे का अपमान किया था।

इसलिए आशंका बनी हुई थी कि अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री पद से हटाया ही जाएगा। 29 सितंबर को सोनिया गांधी से मुलाक़ात के समय उन्होंने अध्यक्ष पद इस लिए ही ठुकरा दिया था, क्योंकि सोनिया गांधी ने सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने की बात कही थी। अशोक गहलोत ने उन्हें साफ़ साफ़ कह दिया था कि वह अध्यक्ष पद से पीछे हटने को तैयार हैं, लेकिन उन्हें सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाया जाना मंजूर नहीं।
मुलाक़ात के बाद दस जनपथ में ही उन्होंने अध्यक्ष पद का चुनाव नहीं लड़ने का एलान कर दिया था। कुछ देर बाद सोनिया गांधी प्रियंका वाड्रा के घर गईं और उन्हें सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनवाने की रणनीति असफल हो जाने की जानकारी दे दी। सोनिया गांधी ने अगले ही दिन मल्लिकार्जुन खड्गे को अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनवा कर 25 सितंबर को हुए उनके अपमान की भरपाई कर दी।
तब से राजस्थान में अटकल लगाई जा रही थी कि गांधी परिवार और मल्लिकार्जुन खड्गे जल्द ही अशोक गहलोत को निपटाएंगे। लेकिन पिछले दो महीनों में अशोक गहलोत ने कांग्रेस में अपनी जमीन बहुत मजबूत कर ली है, वह गांधी परिवार और मल्लिकार्जुन खड्गे को समझा चुके हैं कि सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाया जाना कांग्रेस को वैसे ही महंगा पड़ेगा, जैसे पंजाब में चुनाव से पहले चरनजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाना महंगा पड़ा था। जैसे चरनजीत सिंह चन्नी को विधायकों का समर्थन नहीं था, वैसे ही सचिन पायलट को विधायकों का समर्थन नहीं है।
खुद सचिन पायलट ने अशोक गहलोत की तुलना गुलाम नबी आज़ाद से कर के उनकी मदद की। अब धुंध मिट चुकी है और कांग्रेस आलाकमान गहलोत को मुख्यमंत्री बनाए रखने पर सहमत हो चुका है। इसलिए अशोक गहलोत ने गुजरात में चुनावों के दौरान ही एक टीवी चैनल को इंटरव्यू देते समय सचिन पायलट के बारे में कह दिया कि वह गद्दार है।
गहलोत ने ठान लिया है कि चाहे उन्हें कुछ भी करना पड़े, वह सचिन पायलट को कभी भी मुख्यमंत्री नहीं बनने देंगे। जिस टीवी एंकर ने इंटरव्यू किया, उसने बताया कि अशोक गहलोत ने इंटरव्यू के दौरान अपने पूर्व उप मुख्यमंत्री को छह बार गद्दार कहा। गहलोत ने इंटरव्यू में खुल कर कहा कि कांग्रेस के इतिहास में ऐसा पहला कभी नहीं हुआ था कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने ही कांग्रेस की सरकार गिराने के लिए विरोधी दल के साथ सांठगाँठ करके गद्दारी की हो। इसलिए कांग्रेस गद्दार को कभी भी मुख्यमंत्री नहीं बनाएगी।
उन्होंने कहा- "हाईकमान सचिन पायलट को मुख्यमंत्री नहीं बना सकता, एक ऐसा शख्स, जिसके पास 10 विधायक भी नहीं हैं... ऐसा शख्स, जिसने विद्रोह किया... उन्होंने पार्टी को धोखा दिया, वह गद्दार है...।"
अशोक गहलोत ने अपनी उसी थ्योरी को दोहराया कि 2020 में हुई 'बगावत' को भारतीय जनता पार्टी ने फंड किया था और इसके पीछे केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और धर्मेन्द्र प्रधान सहित भाजपा के कई वरिष्ठ नेता शामिल थे। उस समय दो साल तक राजस्थान के उप मुख्यमंत्री रह चुके सचिन पायलट 19 विधायकों को लेकर गुडगाँव के एक पांच-सितारा रिसॉर्ट में पहुंच गए थे।
यह कांग्रेस को सीधी चुनौती थी कि या तो उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाए, या वह कांग्रेस छोड़कर चले जाएंगे, और इसी वजह से कुछ ही राज्यों में शासन कर रही पार्टी एक राज्य में टूट भी गई थी। लेकिन उस समय 100 विधायकों को अपने साथ रख कर अशोक गहलोत ने आसानी से सचिन पायलट को पटखनी दे दी थी। इसी बगावत के दौरान अशोक गहलोत ने सचिन पायलट को प्रदेश अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री दोनों पदों से बर्खास्त करवा दिया गया था।
अशोक गहलोत उस समय सचिन पायलट को कांग्रेस से ही बाहर करना चाहते थे, लेकिन प्रियंका गांधी ने बीच-बचाव कर के उन्हें बचाया था। सोनिया गांधी नहीं चाहती थी कि पायलट को कांग्रेस से निकाला जाए, इसलिए एक समझौता किया गया। जिसमें उन्हें प्रदेश अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री दोनों पदों पर वापस बहाल नहीं करने का फैसला हुआ था।
सचिन पायलट खाली हाथ कांग्रेस में लौट आए थे। उनका कद भले ही कम हो गया था, लेकिन सूबे के शीर्ष पद पर पहुंचने की उनकी ख्वाहिश बरकरार थी। राजनीतिक हलकों में यह बात बार दोहराई गई है कि प्रियंका गांधी ने वक्त आने पर उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का वादा किया था।
अशोक गहलोत को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने की गोटियाँ इसीलिए बिछाई गईं थीं, लेकिन अशोक गहलोत बड़े खिलाड़ी साबित हुई, वह गांधी परिवार की बिछाई गोटियों पर भी खेल गए।
अगर राजनीति के अनाड़ी राहुल गांधी ने एक व्यक्ति एक पद का बयान न दिया होता, और सोनिया गांधी ने अशोक गहलोत के अध्यक्ष बनने से पहले ही उनका उतराधिकारी चुनने की जल्दबाजी नहीं दिखाई गई होती, तो कांग्रेस आलाकमान अशोक गहलोत के हाथों पटखनी नहीं खाता।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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