Rajasthan BJP: निशाना 2024 पर, रणनीति 1984 की
भाजपा 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले 2018 में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान हारने वाला अनुभव दोहराना नहीं चाहती, क्योंकि 2024 और 2019 में काफी अंतर है। इस बार भाजपा के सामने 26 दलों का इंडी एलायंस है, जिसकी भाजपा की तरह ही दस राज्यों में सरकारें हैं।
इसलिए भाजपा हर राज्य में अपने दिग्गजों को चुनाव मैदान में उतार कर हर हालत में इन तीनों राज्यों में चुनाव जीतने की रणनीति पर काम कर रही है। ताकि 2024 से पहले ही भाजपा का पलड़ा भारी होने का संदेश चला जाए।

जहां 2018 तक मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा 15-15 साल से राज कर रही थी, वहीं 1993 के बाद से राजस्थान में एक बार भाजपा, एक बार कांग्रेस की परंपरा रही है। उस हिसाब से इस बार भाजपा की बारी है। 2018 के आंकड़ों पर अगर नजर डालें तो कांग्रेस को 39.4 प्रतिशत वोट मिले थे, और भाजपा को 38.8 प्रतिशत यानी अंतर सिर्फ आधा प्रतिशत का था। कांग्रेस को पूरे राज्य में सिर्फ डेढ़ लाख वोट ज्यादा मिले थे, लेकिन सीटों में अंतर 26 का था। कांग्रेस को 99 और भाजपा को 73 सीटें मिली थीं। मुकाबला इस बार भी कड़ा है। गुटबाजी भी दोनों तरफ बनी हुई है, इसलिए कांग्रेस और भाजपा दोनों ने किसी को भी मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के बजाए सामूहिक नेतृत्व के आधार पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है।
भाजपा आलाकमान ने राजस्थान की चुनावी बागडोर अपने हाथ में लेकर स्थानीय नेताओं को अपने अपने इलाकों में चुनाव मैदान में उतार कर अपनी अपनी लोकप्रियता दिखाने को कह दिया है। सभी दिग्गजों को चुनाव मैदान में उतारा जा रहा है। बहुत लंबे समय के बाद मोदी, अमित शाह और नड्डा की तिकड़ी ने पार्टी को गुटबाजी और कुछ नेताओं के चंगुल से बाहर निकालने का सफल प्रयास किया है। भाजपा नेतृत्व की तिकड़ी पिछले पांच साल से पार्टी संगठन को मजबूत करने को प्राथमिकता दे रही थी। जिसकी झलक पहली सूची में दिखाई दी है।

भाजपा ने राजस्थान की अपनी पहली ही सूची में मध्यप्रदेश की तरह ही सात सांसदों को चुनाव मैदान में उतार कर और छत्तीसगढ़ की पहली सूची में तीन सांसदों को चुनाव मैदान में उतार कर संदेश दे दिया है कि लोकसभा चुनावों से पहले होने वाले विधानसभा चुनाव उसके लिए कितने अहम हैं। भाजपा तीनों ही राज्यों में वह रणनीति अपना रही है, जो कांग्रेस ने 1984 के लोकसभा चुनावों में अपना कर भाजपा के वाजपेयी, आडवानी जैसे नेताओं को भी चुनाव में धराशाही कर दिया था। तीनों ही राज्यों में कांग्रेस के बड़े बड़े नेताओं को उनके इलाकों में घेरने की रणनीति पर काम हो रहा है, जिसकी झलक अब तक जारी मध्यप्रदेश और राजस्थान की सूचियों से मिलती है।
कांग्रेस ने अभी अपनी पहली सूची जारी नहीं की है, लेकिन भाजपा ने आचार संहिता लागू होने के कुछ देर बाद ही पितृपक्ष की परवाह किए बिना राजस्थान में 41 उम्मीदवारों और छत्तीसगढ़ के 64 नामों की पहली, और मध्यप्रदेश के 57 नामों की चौथी लिस्ट जारी कर दी। राजस्थान में घोषित 41 प्रत्याशियों में से 29 नए प्रत्याशी उतारकर पार्टी ने स्पष्ट कर दिया है कि संगठन ही मुख्य है। पहली सूची में संघ से सलाह मशवरे की झलक भी मिलती है।
भाजपा ने संघ से जुड़ाव रखने वाले 8 उम्मीदवारों को अपनी पहली सूची में जगह दी है। इनमें सांसद देवजी पटेल, किरोड़ी लाल मीणा, सुशील कटारा, शत्रुघ्न गौतम जैसे नेता हैं। वहीं दीया कुमारी, राज्यवर्धन सिंह राठौड़, अर्जुनलाल गर्ग और ताराचंद सारस्वत जैसे नेताओं के टिकट भी संघ की सलाह से टिकट दिए गए हैं। भाजपा आलाकमान ने प्रदेश के नेताओं की सिफारिशों के बजाय सर्वे और संघ से सलाह मशविरे के आधार पर टिकटों का फैसला किया है। सर्वे में पिछड़ रही सीटों पर दिग्गजों को लड़ाने की रणनीति बनाई गई है।
मध्यप्रदेश की तरह राजस्थान में भी सात सांसदों को चुनाव मैदान में उतारा गया है। पहली सूची में ही छह लोकसभा और एक राज्यसभा सांसद का नाम है, अगली सूची में कुछ और सांसद भी चुनाव मैदान में उतारे जाएंगे। जिनमें लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला, केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत और अर्जुन राम मेघवाल भी होंगे। पहली सूची के दो सांसद दीया कुमारी और बाबा बालकनाथ को तो आलाकमान की मुख्यमंत्री पद की चॉइस भी माना जा रहा है।
दीया कुमारी को जयपुर की विद्याधर नगर सीट पर नरपतसिंह राजवी का टिकट काट कर उम्मीदवार बनाया गया है। नरपतसिंह राजवी पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व उपराष्ट्रपति दिवंगत भैरोसिंह शेखावत के दामाद हैं। उनके परिवार के किसी अन्य सदस्य संभवत: नरपत सिंह राजवी के बेटे को किसी अन्य सीट से टिकट दिया जाएगा। वसुंधरा राजे की काट में दीया कुमारी की तरह बाबा बालकनाथ को भी मुख्यमंत्री पद के लिए मोदी की चॉइस बताया जा रहा है। भगवाधारी बाबा बालकनाथ को तिजारा से विधानसभा चुनाव में उतार कर भाजपा ने उत्तर प्रदेश की तरह हिंदुत्व का मेसेज भी दिया है।
जिन सात सांसदों को टिकट दिया गया है, उनमें से बाबा बालक नाथ, राज्यवर्धन सिंह राठौर (झोटवाडा) और देवजी पटेल (सांचौर) ने पहले कभी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा। भागीरथ चौधरी (2003 और 2013 में अजमेर की किशनगढ़ सीट से विधायक रहे), नरेंद्र कुमार खींचड़ (2018 में मंडावा सीट से विधायक रहे) को संबंधित सीटों पर मजबूत प्रत्याशी नहीं होने के कारण टिकट दिए हैं।
राज्यसभा सांसद किरोड़ीलाला मीणा पूर्वी राजस्थान के दिग्गज नेता हैं, सचिन पायलट की उड़ान रोकने के लिए भाजपा ने उन्हें चुनाव मैदान में उतार दिया है। जेपी नड्डा ने हाल ही में बनाई अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में सदस्य बनाकर उन्हें ख़ास महत्व दिया था। गुर्जर आरक्षण आंदोलन की अगुवाई कर चुके कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला के बेटे विजय बैंसला को टिकट देकर भाजपा ने गुर्जर वोटों पर सचिन पायलट का एकाधिकार तोड़ने की कोशिश की है।
गुर्जर समाज भाजपा का वोट बैंक माना जाता रहा है, लेकिन 2018 के चुनाव में सचिन पायलट के मैदान में उतरने और उनके मुख्यमंत्री बनने की संभावना को देखते हुए भाजपा का गुर्जर वोट बैंक कांग्रेस के पाले में चला गया था, जिससे भाजपा को काफी नुकसान हुआ था। पांच साल तक लगातार अशोक गहलोत से राजनीतिक मात खाने के बाद इस बार पायलट अपने विधानसभा क्षेत्र टोंक में ही ज्यादा सक्रिय दिखाई दे रहे हैं|
भाजपा ने पहली सूची में 29 नए चेहरे उतार कर संदेश दिया है कि उसने अपने क्षेत्र में पैठ बनाने में विफल और जनता में कमजोर छवि वालों को मैदान से हटा दिया है। भाजपा ने पार्टी की छवि को प्राथमिकता देने का संदेश भी दिया। पहले माना जा रहा था कि लाल डायरी प्रकरण में गहलोत सरकार से बर्खास्त मंत्री राजेंद्र गुढ़ा के शिवसेना में जाने के बाद भाजपा यह सीट गुढ़ा के लिए छोड़ सकती है, लेकिन यहां पहले विधायक रह चुके शुभकरण चौधरी को टिकट दे दिया गया है।
भाजपा ने अपनी पहली सूची में नरपत सिंह राजवी समेत सात विधायकों के टिकट काटे हैं। इनमें राजपाल सिंह शेखावत (झोटवाड़ा, जयपुर), गोलमा देवी (सपोटरा, करौली), खेमाराम मेघवाल (सुजानगढ़, चूरू), कालूलाल गुर्जर, (मांडल, भीलवाड़ा), अलका सिंह गुर्जर (बांदीकुई, दौसा), रामस्वरूप कोली (वैर, भरतपुर), और अनिता सिंह (नगर, भरतपुर) शामिल हैं। इसके अलावा चुनावी तैयारियों की दृष्टि से भाजपा ने राज्य की सभी सीटों को चार हिस्सों में बांटा था, इनमें 19 सीटें ऐसी हैं, जहां तीन बार से पार्टी लगातार हार रही है, पहली सूची में इनमें से 11 सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर दी गए हैं। इनमें दांतारामगढ़, कोटपूतली, झुंझुनूं, सांचौर, फतेहपुर, लक्ष्मणगढ़, नवलगढ़, लालसोट, सपोटरा, बागीदौरा और बस्सी विधानसभा शामिल हैं|
ऐसा नहीं है कि वसुंधरा राजे को पूरी तरह साइडलाइन किया गया है, लेकिन जैसे पिछले तीन चुनावों में टिकटों के बंटवारे में उनकी चलती थी, वैसे नहीं चली है। कई सीटों पर वसुंधरा राजे समर्थकों को टिकट मिले हैं, तो कुछ सीटों पर टिकट कटे भी हैं। यानी टिकट का आधार सिर्फ चुनाव जीतने की क्षमता है। देखना होगा कि अगली सूची में क्या होता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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