इंग्लिश मीडियम में पढ़ी भव्या राय की फूहड़ता से आधुनिक शिक्षा पर सवाल
नोएडा में जेपी सोसाइटी में रहने वाली एडवोकेट भव्या राय ने सुरक्षा गार्ड के साथ अभद्रता की सारी सीमाएं पार कर दी। गार्ड से गलती ये हो गयी कि वह गेट समय से नहीं खोल पाया। इतने से ही शराब के नशे में धुत भव्या राय ने उसे मां बहन की ऐसी पुरुषवादी गालियां दीं कि वीडियो वायरल होने पर सारा सोशल मीडिया सन्न रह गया। जैसे ही वीडियो वायरल हुआ, उससे एक मूलभूत प्रश्न भी उठ खड़ा हुआ कि आखिर ऐसा क्या कारण है कि आधुनिक शिक्षा प्राप्त महिलाएं ही ज्यादातर ऐसी फूहड़ता करती हुई पायी जाती हैं?

भव्या राय अशिक्षित और अज्ञानी लड़की नहीं थी कि बिना सोचे विचारे जोर जोर से इतनी गंदी गाली गलौज करने लगती। उसकी इंग्लिश मिडियम शिक्षा को देखा जाए तो वह कहीं से भी कम नहीं है। उसने दिल्ली के कार्मेल कॉन्वेंट से स्कूल की पढ़ाई की, सिंबॉयसिस से एलएलबी की, और उसके बाद दुनिया की टॉप यूनिवर्सटीज़ में शामिल बॉस्टन से एलएलएम करने के बाद टॉप लीगल कंपनियों में कंसलटेंट और एसोसिएट रह चुकी हैं। लेकिन अपनी सोसाइटी के गार्ड को जिस तरह से वो फूहड़ व गंदी गालियां देते हुए दिख रही हैं, उससे सहज सवाल खड़ा होता है कि इतनी पढी लिखी महिला की ऐसी गिरी हुई और ओछी हरकत क्यों?
क्या इंग्लिश मिडियम शिक्षा है जिम्मेदार?
एक प्रश्न जो बार-बार उभर कर आता है, वह यह कि क्या इसके पीछे संस्कार विहीन इंग्लिश मिडियम शिक्षा मुख्य कारक है? भारत में मिशनरी शिक्षा (अंग्रेजी शिक्षा) को लेकर सीएफ एंड्रूज़ ने अपनी पुस्तक 'रेनेसां इन इंडिया एंड इट्स मिशनरी आस्पेक्ट' (वर्ष 1912 में प्रकाशित) में यह स्पष्ट लिखा था कि "भारत में ईसाई मत की शिक्षा दी जानी चाहिए। और वह शिक्षा मात्र तभी दी जा सकती है जब अंग्रेजी भाषा में शिक्षा दी जाएगी। क्योंकि अंग्रेजी शिक्षा केवल ईसाई सभ्यता ही नहीं बताती है बल्कि वह ईसाई धर्म में रची बसी है। अंग्रेजी साहित्य, अंग्रेजी इतिहास, अंग्रेजी अर्थशास्त्र, अंग्रेजी दर्शन अपने साथ ईसाई जीवन की आवश्यक जीवन अवधारणाएं लाता है; क्योंकि जिन लोगों ने यह लिखा है, उन्होंने ईसाई माहौल में ही लिखा है!"
जब हम आधुनिक शिक्षा की बात करते हैं तब इस एजेंडे पर विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है, क्योंकि "विद्या ददाति विनयम्" भारतीय अवधारणा है। क्या इंग्लिश मिडियम शिक्षा हमारे समाज को और विशेषकर महिलाओं को कहीं न कहीं भारतीय मूल्यों से परे कर रही है? क्योंकि ऐसी एक और घटना हाल ही में सोशल मीडिया पर आई थी जिसमें एक महिला ज़ोमैटो के डिलीवरी बॉय को जूतों से पीट रही है!
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या इंग्लिश मिडियम शिक्षा पहले पारिवारिक मूल्यों से दूर करती है और ईसाई मान्यताएं स्थापित करती है, जैसा सीएफएंड्रूज़ ने कहा था कि हमें धीरे धीरे पीढ़ियों में भारतीय जीवन मूल्य को विलुप्त करना है। सीएफ एंड्रूज़ ने लिखा है कि डफ (मिशनरी) ने हिन्दू संस्कृति के सम्बन्ध में रूट एंड ब्रांच अर्थात जड़ तथा शाखा नीति का पालन किया। अर्थात उसकी इच्छा थी कि हिन्दुओं का अतीत मिटाकर पहले उसके दिमाग को कोरी स्लेट बनाया जाए और फिर भारतीय दिमाग को "अंग्रेज" बनाया जाए।
यह तो षड्यंत्रों के आरम्भ की बात है क्योंकि डफ का इतिहास 1825 के बाद से आरम्भ होता है। क्या यह कहा जा सकता है कि अब दो सौ वर्ष बाद हमारा शहरी मध्यवर्गीय समाज उस मानसिकता में पहुंच गया है, जहाँ पर यूरोपीय मिशनरी हमें पहुंचाना चाहते थे। इंग्लिश मिडियम में पढ़ा हमारा मध्यवर्गीय समाज भारतीय मूल्यों से कटा हुआ है, और अंग्रेजी न बोलने वाले वर्ग के प्रति घृणा से भरा रहता है, उसमें भी वही अहंकार और अभिजात्यता है जो अंग्रेजों में थी।
गाली देते समय पढी लिखी भव्या राय सिक्योरिटी गार्ड को बिहारी कहकर गाली देती है और कहती है कि सभी बिहारियों को भगाओ यहां से। बिहारी से अर्थ है हिन्दी पट्टी से अर्थात हिन्दी बोलने वाले से। अर्थात उनके लिए अंग्रेजी जैसी भाषा की तुलना में हिन्दी भाषा वाले गंवार लोग हैं। भव्या राय की मानसिकता वही है जो डफ बनाना चाहता था और जैसी कल्पना मैकाले ने की थी।
भारतीयता से नफरत सिखाता है पाश्चात्य फेमिनिज्म
महिला विरोधी फूहड़ गालियां देनेवाली भव्या राय का मामला उस पाश्चात्य फेमिनिज्म का भी मामला है, जो हम पर बाहरी विमर्श के माध्यम से थोपा गया। भारत में पहले से ही स्त्री सशक्त थी, क्योंकि वह अपने मूल्यों को थाम कर चलती थी, वह पुरुषों की पूरक थी, वह उनकी प्रतिद्वंदी नहीं थी और न ही कभी हो सकती थी। परन्तु जो बाहरी विमर्श हम पर थोपा गया उसमें जो समाज परिवार केन्द्रित था उसे पश्चिमी विमर्श के चलते गाइनोसेंटरिक अर्थात स्त्री केन्द्रित बनाया गया।
बॉब ल्युज़ अपनी पुस्तक "फेमिनिस्ट लाई - इट वाज़ नेवर अबाउट ईक्वेलिटी" में लिखते हैं कि "फेमिनिज्म पर कोई भी बात तब तक नहीं हो सकती है जब तक हम गाइनोसेंटरिक पर बात नहीं करते।" गाइनोसेंटरिक का अर्थ होता है कि "महिलाओं के हितों पर जोर देना या उनका ही वर्चस्व होना या फिर सिर्फ महिलाओं का ही दृष्टिकोण!" अर्बन डिक्शनरी इस शब्द का अर्थ बताती है कि हमेशा ही महिलाओं को पहले रखना, फिर दूसरों को चाहे कोई भी कीमत चुकानी पड़े। इसका परिणाम होता है महिला की श्रेष्ठता या सत्ता या फिर कहें कि महिला को हर दोष से मुक्त कर देना, कि वह तो महिला है, वह कभी कुछ गलत कर ही नहीं सकती। यही सोच अंत में पुरुषों के प्रति घृणा में बदल जाती है।
जबकि भारत के मूल्य व संस्कार बार बार यह कहते हैं कि स्त्री और पुरुष परस्पर एक दूसरे के पूरक रहते हुए अर्द्धनारीश्वर बनते हैं, उत्तरदायित्व का निर्वहन परस्पर करते हैं। पश्चिमी विमर्श ने पहले मूल्यों को ऊपरी समानता में बदला क्योंकि अर्धनारीश्वर का सिद्धांत तो कहीं शिक्षा में है नहीं। हाँ, पाश्चात्य फेमिनिज्म में वह विमर्श है जो यह कहता है कि स्त्री पर बहुत अत्याचार हुआ है, और किया है पुरुषों ने, तो भारतीय स्त्रियों में अपने उन पुरुष संबंधियों के प्रति घृणा भर जाती है, जिन्हें यह तक नहीं पता होता है कि अंतत: उनका दोष क्या है?
ऐसे में सामान्य पुरुष महिलाओं की ओर से सदैव एक ऐसी घृणा का सामना करते हैं, जिसका वह न कारण जानते हैं और न ही कारण होते हैं, फिर भी वह एक अपराधबोध में जीवित रहते हैं, क्योंकि उन्हें कक्षा 7 से ही सामाजिक विज्ञान में यह पढ़ाया जाता है कि उन्होंने स्त्रियों पर बहुत अत्याचार किए थे, और उन्हें अब स्त्रियों का आदर करना है। परन्तु कक्षा 6 या 7 में पढने वाले बच्चे को न ही यह पता होता है कि आखिर पुरुषों ने क्या अत्याचार किये और न ही बच्ची को पता होता है कि पुरुषों ने उस पर क्या अत्याचार किए।
फिर भी जैसे जैसे यह विमर्श ऊपरी कक्षाओं में विस्तार लेता जाता है वैसे वैसे लड़का कहीं न कहीं अपराध बोध में दबता जाता है और लड़की एक ऐसी सोच का शिकार बन जाती है जहाँ वह पूर्ण सत्ता के रूप में है, उसे पुरुषों से अत्याचारों का बदला लेना है और जहाँ पर वह स्वयं को ऐसी स्थिति में पाती है कि उससे तो कोई गलती हो ही नहीं सकती है।
इसी भाव में वह पुरुषों को अपराधी व अत्याचारी समझते हुए अवसर पाते ही अपनी कुंठा का वमन करने लगती है जैसे भव्या राय ने किया। इसमें वर्ग के प्रति घृणा, वर्ण के प्रति घृणा, पुरुषों के प्रति घृणा, हिन्दी, और हिन्दू संस्कारों के प्रति घृणा बाहर आती है। तभी कोई भव्या राय आती हैं, जो अपनी जड़ों से कटी हैं, जो आधुनिक शिक्षा प्राप्त है, वह उस भारत के गरीब सिक्योरिटी गार्ड पर अपनी तमाम अभिजात्यात्मक कुंठा निकालती है, जो असल में भारत के आम लोगों के प्रति उस जैसी इंग्लिश मिडियम में पढ़ी महिलाओं के दिल में भरी हुई है।
क्या भव्या राय ही आधुनिक महिला सशक्तीकरण का मानक है, जिसे लागू करने के लिए इंग्लिश मिडियम में पढ़ी महिलाओं की एक लॉबी दिन रात लगी हुई है?
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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