सर सैयद अहमद खान को पाकिस्तान ने क्यों दिया पाकिस्तान के नायक होने का सम्मान?
अलीगढ मुस्लिम युनिवर्सिटी के संस्थापक सर सैय्यद अहमद खान को पाकिस्तान ने बड़ा सम्मान दिया है। पाकिस्तान बनने के 75वें साल में पाकिस्तान सरकार ने 75 रूपये का एक विशेष करंसी नोट जारी किया है। इस करंसी नोट पर चार लोगों के चित्र लगाये गये हैं। इसमें मोहम्मद अली जिन्ना के अलावा अल्लामा इकबाल, फातिमा जिन्ना और सर सैयद अहमद खान का फोटो लगाया है।

स्वाभाविक है कि पाकिस्तान ने इस करंसी नोट के जरिए अपने नागरिकों को ये बताने का प्रयास किया है कि पाकिस्तान बनने में किन लोगों का योगदान है। मोहम्मद अली जिन्ना और उनकी बहन फातिमा जिन्ना को पाकिस्तान में कायद ए आजम और मादर ए मिल्लत की उपाधि दी गयी है। इनके अलावा अल्लामा इकबाल पाकिस्तान के पहले स्वप्नद्रष्टा के रूप में याद किये जाते हैं जिन्होंने 1930 में इलाहाबाद में अलग इस्लामिक राज्य की रूपरेखा सामने रखी थी।
लेकिन इनके साथ सर सैय्यद अहमद खान की फोटो चौंकानेवाली घटना है। पाकिस्तान बनने से पचास साल पहले सर सैय्यद अहमद खान मर चुके थे। 1898 में जब सर सैय्यद अहमद खान का निधन हुआ उस समय तो दूर दूर तक इस्लामिक राज्य बनने की कोई चर्चा नहीं थी। फिर पाकिस्तान ने उन्हें पाकिस्तान बनानेवाले लीडरों में कैसे शामिल कर लिया?
सर सैय्यद अहमद खान का जन्म 1817 में दिल्ली में हुआ था। उनका परिवार सूफी नक्सबंदी था जो वर्तमान अफगानिस्तान से दिल्ली आकर बस गया था। नक्सबंदी सूफियों में कट्टर सुन्नी मुसलमान होते हैं जो बड़ी कड़ाई से शरीयत के नियमों को लागू करते हैं। क्योंकि भारतीय मुसलमानों में खान, पठान, ईरानी या फिर अरब, तुर्क मुसलमानों को यहां के स्थानीय मुसलमानों से श्रेष्ठ माना जाता है इसलिए इन्हें मुसलमानों में अशराफिया तबका कहा जाता है। सर सैय्यद के खानदान को भी भारत में अशराफिया मुसलमान ही कहा जाता था जो यहां के स्थानीय मुसलमानों से अपने आप को श्रेष्ठ समझते थे।
सर सैय्यद अहमद खान ने बचपन से ही इस्लाम की पढाई की थी। भारत में पहली बार उन्होंने ही कुरान का उर्दू में अनुवाद किया। बाद के दिनों में वो अंग्रेजी और अंग्रेजियत से बहुत प्रभावित हुए। इसके पीछे भी उनके समकालीन मिर्जा गालिब का हाथ था। मिर्जा गालिब जब पहली बार कलकत्ता गये और वहां ब्रिटिश हुकूमत की चमक दमक देखी तो उन्होंने सर सैय्यद को चिट्ठी लिखी कि अगर नयी दुनिया देखनी है तो कलकत्ता जाओ। अंग्रेजी को अपनाओ। बिना उसके मुसलमानों को इस नयी दुनिया के दर्शन नहीं करवाया जा सकता।
मिर्जा गालिब के कहने पर सर सैय्यद कलकत्ता गये और अंग्रेजी तथा अंग्रेजियत दोनों का महत्व समझा। उन्होंने ये भी देखा कि राजा राम मोहन राय जैसे हिन्दू नेताओं ने कैसे अंग्रेजी को अपनाकर हिन्दुओं को प्रोग्रेसिव बना दिया है। इसके बाद ही उन्होंने मुसलमानों को अंग्रेजी शिक्षा के लिए प्रेरित करना शुरु किया।
वो ब्रिटिश सरकार की नौकरी करते थे और उत्तर प्रदेश के अलग अलग जिलों में उनकी पोस्टिंग होती रहती थी। लेकिन अग्रेजों की वैज्ञानिक प्रगति से वो इतना प्रभावित थे कि गाजीपुर में अपनी पोस्टिंग के दौरान 1863 में एक ऐसे मदरसे की स्थापना की जिसमें विज्ञान और अंग्रेजी की पढाई भी होती थी।
1877 में अलीगढ मुस्लिम युनिवर्सिटी की स्थापना से पहले 1875 में उन्होंने अलीगढ में मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल स्कूल की शुरुआत कर दी थी। असल में 1857 की क्रांति के बाद से ही सर सैय्यद अहमद खान पूरी तरह से अंग्रेजों के साथ हो गये थे। 1857 की क्रांति को उन्होंने बगावत बताया था और एक किताब भी लिखी थी "असबाब ए बगावत ए हिन्द"। इस किताब में उन्होंने साफ तौर पर लिखा था कि "हम मुसलमानों का अशराफिया तबका पूरी तरह से अंग्रेजों के साथ है। जो खिलाफ हैं वो बदजात मुसलमान हैं।"
पाकिस्तानी मूल के राजनीतिशास्त्री इश्तियाक अहमद जैसे लोग मानते हैं कि सर सैय्यद अहमद खान मान चुके थे कि अंग्रेज भारत से कभी नहीं जाएंगे इसलिए उन्होंने अंग्रेजों से लड़ने की बजाय उनके साथ रहकर मुसलमानों के लिए अधिक से अधिक सहूलियत पाने की कोशिश शुरु कर दी थी। अंग्रेजों को सर सैय्यद अहमद खान की ये रुचि बहुत पसंद भी आयी और उन्होंने सर सैय्यद को 1969 में 'आर्डर आफ द स्टार' सम्मान से सम्मानित भी किया था। सर सैय्यद अंग्रेजों के इतने बड़े पैरोकार हो गये थे कि वो मुसलमानों से आजादी के आंदोलन से दूर रहने और कांग्रेस में शामिल न होने के लिए कहते थे।
सर सैय्यद अहमद खान हिन्दुओं और मुसलमानों को दो अलग कौम मानते थे। इसलिए सर सैय्यद हिन्दुओं और मुसलमानों की किसी भी प्रकार की राजनीतिक एकता के खिलाफ थे। वो मुसलमानों के लिए अलग चुनाव की बात करते थे और किसी भी प्रकार की लोकतांत्रिक व्यवस्था का यह कहकर विरोध करते थे कि इससे 'हिन्दू अक्सरियत' (बहुमत) मुसलमानों पर हावी हो जाएगी।
14 मार्च 1888 को मेरठ में दिये अपने एक भाषण में उन्होंने यहां तक कह दिया था कि "जैसे अंग्रेजों ने भारत को जीता है वैसे ही हम (मुसलमानों) ने भी भारत को अपना गुलाम बनाकर रखा था। मगर जिन्होंने कभी शासन नहीं किया उन हिन्दुओं को ये बात समझ में नहीं आयेगी।" अपने इसी भाषण में सर सैय्यद ने यहां तक कह दिया था कि "जब अंग्रेज यहां से जाएं तो सत्ता हिन्दुओं को सौंपकर न जाएं। भारत की सत्ता का फैसला हिन्दू मुसलमानों के बीच तलवार से होगा।"
साफ है जिस द्विराष्ट्रवाद सिद्धांत को अल्लामा इकबाल ने 1930 में सामने रखा, उस द्विराष्ट्रवाद सिद्धांत को बहुत पहले सर सैय्यद अहमद खान सामने रख चुके थे। सबसे पहले सर सैय्यद ने ही कहा था कि हिन्दू और मुसलमान दो अलग कौमें हैं जो कभी साथ नहीं रह सकती। यही सोच आगे चलकर पाकिस्तान की बुनियाद बनी। अल्लामा इकबाल हों या मोहम्मद अली जिन्ना। पाकिस्तान बनाने के लिए वो इसी एक तर्क को बार बार सामने रखते रहे। इसी दो कौमी नजरिये या द्विराष्ट्रवाद सिद्धांत के ऊपर आखिरकार 1947 में भारत तीन हिस्सों में टूट गया।
भारत से अलग होकर जो पाकिस्तान बना, उसका स्वप्न भले ही सर सैय्यद ने कभी न देखा हो, लेकिन अपने दो कौमी नजरिये से वो भारतीय मुसलमानों को वह स्वप्न दे गये थे जिस पर चलकर पाकिस्तान बना। ये बात पाकिस्तान के सिद्धांतकार जानते हैं और उसके लिए सर सैय्यद के योगदान को भी पहचानते हैं। इसलिए उन्होंने अपने 75वें साल में सर सैय्यद को अपनी करंसी पर जगह देकर उन्हें सम्मानित किया है। आशा है अब भारत के सेक्युलर इतिहासकार भी पाकिस्तान के निर्माण में सर सैयद अहमद खान के योगदान को स्वीकार करेंगे।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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