पैकेज्ड फूड पर जीएसटी का विरोध क्यों?
18 जुलाई से भारत में डिब्बाबंद खाद्य सामग्री (पैकेज्ड फूड) पर 5 प्रतिशत जीएसटी लग गयी है। सोशल मीडिया पर ही नहीं, राजनीतिक रूप से भी कुछ नेताओं ने बयानबाजी करके इसे गलत ठहराया है। इसमें सबसे आगे राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हैं जिन्होंने कहा है कि केन्द्र सरकार को इस बारे में पुनर्विचार करना चाहिए।

राजस्थान के मुख्यमंत्री का यह बयान शुद्ध रूप से राजनीतिक है जिसका वास्तविकता से कोई लेन देन नहीं है। अशोक गहलोत भी जानते हैं कि किस वस्तु पर जीएसटी लगानी है और किस पर हटानी है, यह केन्द्र सरकार नहीं तय करती। यह काम जीएसटी काउंसिल करती है जिसमें केन्द्रीय वित्तमंत्री के साथ हर राज्य के वित्तमंत्री शामिल होते हैं। जीएसटी का निर्णय सामूहिक होता है। अगर पैकेज्ड फूड आइटम पर जीएसटी लगाने का निर्णय हुआ है तो क्या अशोक गहलोत सरकार के प्रतिनिधि उसमें नहीं शामिल थे? अगर थे तो उस मीटिंग में उन्होंने विरोध किया था?
राजनीतिक विरोध से अलग सोशल मीडिया पर भी कुछ लोग ऐसा प्रचार कर रहे हैं मानों केन्द्र सरकार ने खाद्यान्न पर ही जीएसटी लगा दिया है। ऐसा नहीं है। जीएसटी लगाई गयी है पैकेज्ड फूड आइटम पर। ऐसे फूड आइटम जो डिब्बाबंद होकर लोगों तक पहुंच रहे हैं उन पर अब 5 प्रतिशत जीएसटी लगाया गया है। इसमें अनाज, दालें, दही, मांस, मछली इत्यादि ऐसे सभी खाद्य पदार्थ शामिल हैं जिन्हें पैकिंग में बेचा जाता है और जो 25 किलो से कम की पैकिंग में आते हैं।
ऐसे में एक सवाल और उठता है कि व्यापार संगठन इसका विरोध क्यों कर रहे हैं? जवाब है कि जीएसटी काउंसिल ने खाद्य सामग्री में ऐसे फूड आइटम पर भी जीएसटी लगा दिया है जिनका कोई ब्रांड नहीं है लेकिन वो पैकिंग में बिकते हैं। इससे व्यापारियों को लगता है कि 25 किलो से कम की पैकिंग में वो जिन खाद्य पदार्थों का व्यापार करते थे, जिन पर किसी ब्रांड का कोई लेबल नहीं लगा होता था, अब उन पर भी 5 प्रतिशत जीएसटी देनी होगी। लेबल लगे खाद्य पदार्थ या ब्रांडेड आइटम पर लगनेवाले जीएसटी का विरोध तो वो भी नहीं कर रहे क्योंकि व्यापारी जानते हैं कि यह बोझ उनके ऊपर नहीं बल्कि उपभोक्ता के ऊपर पड़ेगा।
उनके विरोध की एक बड़ा कारण ये है कि 5 प्रतिशत जीएसटी लगने के बाद खुदरा बाजार में उन्हें कीमतों को संतुलित रखने में बड़ी चुनौती मिलेगी। वही खाद्यान्न जो आढतियों के बगैर या फिर बिना मंडियों में गये सीधे किसान के जरिए किसी बाजार में पहुंच रहा है, वह मंडी से आये माल के मुकाबले सस्ता होगा। व्यापारी जानते हैं कि ऐसे हालात में कीमतों को संतुलित रखने से उनके लाभ पर असर पड़ेगा, इसलिए वो विरोध कर रहे हैं। लेकिन यह विरोध बेमतलब है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन ने साफ किया है 25 किलो से ऊपर की पैकिंग में अनाज का जो व्यापार होगा, उस पर कोई जीएसटी नहीं है। जो 5 प्रतिशत जीएसटी लगा है वह 25 किलो से कम छोटे पैकेज्ड फूड आइटम पर है। जीएसटी काउंसिल के लिए ऐसा करना गलत नहीं है। भारत का पैकेज्ड फूड मार्केट 35 अरब डॉलर (28 खरब रूपये) तक पहुंच गया है।
अगले पांच से दस साल में यह 70 अरब डॉलर (56 खरब रूपये) तक पहुंचने का अनुमान है। आज पैकेज्ड फूड आइटम में ही सबसे अधिक व्यावसायिक निवेश की होड़ है। विज्ञापनों पर अथाह खर्च करके बड़ी कंपनियां उपभोक्ताओं को पैकेज्ड फूड आइटम्स को खरीदने के लिए लुभाने में कामयाब हो रही हैं और असंगठित स्तर पर खाद्य सामग्री जैसे अनाज, दूध, इत्यादि के उत्पादन व बिक्री में लगे लोग बड़ी कंपनियों के सामने टिक नहीं पा रहे। फिर कोई भी सरकारी व्यवस्था इन खाद्य सामग्रियों पर कर लगाती है तो क्या गलत करती है?
यहां एक बात और महत्वपूर्ण है कि पैकेज्ड फूड के उपभोक्ता ज्यादातर नगरीय निवासी हैं। उन्हें गुणवत्ता के साथ अगर कोई सामग्री मिलती है तो उस सामग्री की कुल लागत का 5 प्रतिशत कर देने में क्या परेशानी होगी? जिन्हें लगता है कि पैकेज्ड फूड या ब्रांडेड आइटम उन्हें मंहगा पड़ रहा है वो बाजार से खुदरा सामान खरीद सकते हैं या फिर सीधे किसान के पास से खाने पीने का सामान ले सकते हैं। अगर पैकेज्ड डेरी आइटम मंहगा पड़ता है तो उन्हें किसी ऐसी डेयरी से डेरी आइटम खरीदना चाहिए जिसका अपना स्वयं का उत्पादन है और जो ब्रांडेड मार्केट का हिस्सा नहीं है।
अगर वो ऐसा करते हैं तो उन पर अतिरिक्त जीएसटी का बोझ भी नहीं पड़ता और किसान तथा छोटे डेयरी संचालकों को इसका सीधा लाभ भी मिल जाएगा। इसलिए इस फैसले का विरोध करने की बजाय सामान्य नागरिकों द्वारा इसका स्वागत किया जाना चाहिए।
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(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)
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