Parliament Inauguration: नए संसद भवन का उद्घाटन कौन करे, राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री?
विपक्ष के विरोध के बीच असली पेच फंसता है राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पर। नए संसद भवन का उद्घाटन किससे कराना चाहिए - राष्ट्रपति से या प्रधानमंत्री से?

लगभग 60 हजार राष्ट्र-श्रमिक दिनों के कठिन परिश्रम की बदौलत आजादी के 75 साल बाद पहली बार भारत ने अपने संसद भवन का निर्माण किया है। अंग्रेजों द्वारा बनवाये गये पुराने संसद भवन से यह बड़ा भी है, बेहतर भी है और हाइटेक भी है। देश के प्रधानमंत्री 28 मई को इसका उद्घाटन करने जा रहे हैं, लेकिन कांग्रेस समेत 19 विपक्षी दलों ने इसके उद्घाटन समारोह का बहिष्कार करने का फैसला किया है। मुमकिन है कि इन दलों के दबाव में कुछेक और दल इस बहिष्कार में शामिल हो जाएं।
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सुनने में यह कितना भी अजीब और अप्रत्याशित क्यों न लगे, लेकिन विपक्षी पार्टियों की दलील यह है कि नये संसद भवन का उद्घाटन राष्ट्रपति को करना चाहिए, न कि प्रधानमंत्री को। प्रधानमंत्री से नए संसद भवन का उद्घाटन कराने को वे राष्ट्रपति और संविधान का अपमान बता रहे हैं। आजादी के बाद शायद यह पहली ही बार कहा जा रहा है कि देश के किसी प्रतीक का उद्घाटन यदि प्रधानमंत्री कर देंगे तो संविधान का अपमान हो जाएगा।
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AIMIM के असदुद्दीन ओवैसी जैसे भी कुछ नेता हैं, जो न तो कांग्रेस के साथ खड़े दिखना चाहते हैं, न भाजपा की बी-टीम कहलाना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने एक बिल्कुल अलग ही राग अलापा है कि संसद भवन का उद्घाटन लोकसभा अध्यक्ष से कराया जाना चाहिए। तो सबसे पहले इस पेचीदा सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश करते हैं कि नए संसद भवन का उद्घाटन किससे कराया जाना चाहिए - राष्ट्रपति से या प्रधानमंत्री से या फिर लोकसभा के अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति यानी उपराष्ट्रपति से?
जहां तक लोकसभा के अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति का प्रश्न है, तो संवैधानिक दृष्टि से भी और व्यावहारिक दृष्टि से भी ये दोनों ही नए संसद भवन का उद्घाटन करने के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं हैं, क्योंकि अगर बात केवल लोकसभा की होती, तो लोकसभा के अध्यक्ष उपयुक्त होते। अगर बात केवल राज्यसभा की होती तो राज्यसभा के सभापति भी उपयुक्त होते। लेकिन यहां बात संसद की हो रही है, जिसमें लोकसभा और राज्यसभा दोनों ही समाहित हैं। इसलिए चाहे लोकसभा अध्यक्ष हों या राज्यसभा के सभापति - ये दोनों ही संपूर्णता में इस देश की संसद के अध्यक्ष या सभापति नहीं होकर महज एक-एक सदन के अध्यक्ष या सभापति हैं।
आइए अब बात करते हैं राष्ट्रपति की। यह सच है कि राष्ट्रपति को इस देश के प्रथम नागरिक का दर्जा प्राप्त है। यह भी सच है कि संविधान के अनुच्छेद 53 के अनुसार, संघ की कार्यपालिका शक्तियां राष्ट्रपति में निहित हैं अर्थात वे इस देश के कार्यपालिका प्रमुख हैं। भारत में ऑर्डर ऑफ प्रेसिडेंस में राष्ट्रपति पहले नंबर पर, उपराष्ट्रपति दूसरे नंबर पर और प्रधानमंत्री तीसरे नंबर पर आते हैं। संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार, देश की संसद राष्ट्रपति तथा दोनों सदनों यानी राज्यसभा और लोकसभा से मिलकर बनेगी। अर्थात राष्ट्रपति भारतीय संसद का एक अभिन्न अंग होते हैं। इसके बावजूद कि वे स्वयं संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होते, वे राज्यसभा में विभिन्न क्षेत्रों के 12 सदस्यों को मनोनीत कर सकते हैं। संसद के दोनों सदनों से पास हो चुके बिल को भी कानून बनने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी चाहिए होती है। इतना ही नहीं, राष्ट्रपति ही लोकसभा को भंग करते हैं, और चुनाव के बाद उसके प्रथम सत्र को संबोधित करते हैं। वे संसद के दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुलाकर संबोधित करने की शक्ति भी रखते हैं। औपचारिक रूप से वही संसद सत्र आहूत और सत्रावसान भी करते हैं।
इस प्रकार, इसमें कोई शक नहीं कि संवैधानिक और सैद्धांतिक दृष्टि से राष्ट्रपति को संसद से अलग करके नहीं देखा जा सकता, बल्कि निर्विवाद रूप से वे ही इस देश की संसद के दोनों सदनों के अभिभावक हैं। ऐसे में यदि संसद के नए भवन का उद्घाटन उनसे कराया जाता, तो इसमें भी कोई बुराई नहीं थी। बल्कि इस भवन के उद्घाटन के लिए राष्ट्रपति पहले और सर्वस्वीकार्य विकल्प हो सकते थे।
अब सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री द्वारा नए संसद भवन का उद्घाटन किया जाना गलत है? तो सीधे तौर पर ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कागज पर राष्ट्रपति की स्थिति चाहे जो भी हो, लेकिन वास्तविकता में प्रधानमंत्री ही इस देश के एक्जीक्यूटिव हेड और सरकार के मुखिया होते हैं। और यह स्थिति कोई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में नहीं बनी है, बल्कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के ही समय से कायम है। राष्ट्रपति की स्थिति के सन्दर्भ में खुद पंडित जवाहरलाल नेहरू का यह वक्तव्य गौर करने लायक है कि "हमने अपने राष्ट्रपति को वास्तविक शक्ति नहीं दी है, अपितु हमने उनके पद को सत्ता एवं प्रतिष्ठा से विभूषित किया है।" और इसीलिए हम देखते हैं कि संवैधानिक रूप से राष्ट्रपति की सर्वोच्चता होते हुए भी व्यावहारिक रूप से प्रधानमंत्री ही इस देश में सर्वाधिक शक्तिशाली दिखाई देते हैं। यहां तक कि राष्ट्रपति के चयन में भी प्रधानमंत्री की इच्छा की एक मुख्य भूमिका दिखाई देती है, जबकि प्रधानमंत्री के चयन में राष्ट्रपति की इच्छा का कोई रोल नहीं होता। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को छोड़कर अब तक शायद ही कोई दूसरा राष्ट्रपति ऐसा हुआ, जो प्रधानमंत्री की मर्जी न होते हुए भी इस पद पर काबिज हो गया।
यह सच है कि प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ वे किसी न किसी पार्टी के नेता भी होते हैं, लेकिन ऐसा होने की वजह से संविधान में कहीं भी ऐसा नहीं लिखा है कि वे पूरे देश के प्रधानमंत्री न होकर किसी खास पार्टी या गठबंधन के प्रधानमंत्री होते हैं। अगर राष्ट्रपति गणतंत्र दिवस पर देश के मुख्य समारोह में राष्ट्रध्वज फहराते हैं, तो प्रधानमंत्री भी स्वतंत्रता दिवस के दिन यानी 15 अगस्त को लाल किले से झंडा फहराते हैं। 1947 सहित अब तक लगातार 76 बार ऐसा हो चुका है, जब समूचे देश के नेता के तौर पर प्रधानमंत्री ने ही लाल किले से झंडा फहराया है। लेकिन आज तक किसी ने यह तो नहीं कहा कि चूंकि प्रधानमंत्री किसी खास पार्टी के नेता हैं, इसलिए उन्हें लाल किले से झंडा नहीं फहराना चाहिए। तो जब देश के नेता के तौर पर प्रधानमंत्री लाल किले से झंडा फहरा सकते हैं, तो यदि वे इसी तौर पर देश के संसद भवन का भी उद्घाटन करने जा रहे हैं, तो इसमें हाय-तौबा मचाने जैसी क्या बात है?
इसलिए, देखा जाए तो यह बहस ही गैर-मुनासिब है कि नए संसद भवन का उद्घाटन राष्ट्रपति करेंगी या प्रधानमंत्री करेंगे। अब तक ऐसे फैसले सरकार की मर्जी से ही होते रहे हैं और राष्ट्रपति अथवा प्रधानमंत्री दोनों ही नए संसद भवन का उद्घाटन करने के लिए पूर्ण रूप से सक्षम पदाधिकारी हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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