सत्ता और पुलिस का गठजोड़ : सभी के दोनों हाथ में लड्डू
सत्ता और पुलिस का गठजोड़ अब पुराना हो चला है| इस गठजोड़ में पुलिस हरदम फायदे में रहती है| कहा जा सकता है कि सत्ता किसी की हो-पुलिस के दोनों हाथ में लड्डू होता है| जैसे-जैसे राजनीति में गिरावट आई, वैसे-वैसे यह गठजोड़ और मजबूत होता गया| मुंबई में अर्नब गोस्वामी के खिलाफ पुलिस कार्रवाई हो या यूपी में अनेक जिलों में हाल में पत्रकारों के खिलाफ दर्ज मामले हों या अपराधियों के खिलाफ चल रही कार्रवाई, सब सत्ता के चश्मे के नम्बर बदलने की बानगी भर हैं| पुलिस सत्ता के इशारे को बखूबी समझते हुए उसका दस्तावेजीकरण भी कर देती है| यह और बात है कि कई बार अदालत पहुँचने के साथ ही इनका भांडा फूट जाता है| अब सिस्टम में इतना घुन लग चुका है कि इलाज मुश्किल है| एक थानेदार कहते हैं-आपके पास दो हजार के दो जाली नोट मिले| अगर जेल भेजना है तब पुलिस लिखेगी-पत्रकारिता की आड़ में यह आदमी जाली नोटों का कारोबार करता है| यह काम वर्षों से चल रहा है| इसका गिरोह नेपाल तक पसरा हुआ है| छोड़ना हुआ तब लिखा जाएगा-दो हजार के ये दो नोट गलती से इनकी जेब में आ गये थे| ये बहुत ही सम्मानित व्यक्ति हैं और इनकी आम शोहरत भी अच्छी है| ये जाली नोटों के सौदागर हो ही नहीं सकते| जुर्म एक लेकिन पुलिस का विवेक यहाँ बहुत महत्वपूर्ण भूमिका में है| इसी भूमिका की पुलिस खाती आ रही है|

सजा उन्हें भी मिले
अर्नब गोस्वामी या कोई और, दोषी हैं तो निश्चित सजा मिलनी चाहिए लेकिन सजा उन पुलिस अधिकारियों-कर्मचारियों को भी मिलनी चाहिए जिन्होंने अर्नब का केस पहले बंद कर दिया था| जाँच इस बात की भी होनी चाहिए कि आखिर यह कारनामा पुलिस ने किसके कहने पर किया| अनेक मौकों पर हम सबने देखा है कि पुलिस / प्रशासन सत्ता के इशारे पर क्या आम, क्या ख़ास, सब पर बलपूर्वक कार्रवाई करते हैं| जब से देश में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का प्रादुर्भाव हुआ, गठजोड़ की राजनीति शुरू हुई, तब से पुलिस-प्रशासन-सत्ता-अपराधी गठजोड़ और मजबूत हुआ|
यूपी में जड़ें हुईं गहरी
उत्तर प्रदेश में भी इस घटिया गठजोड़ ने बीते 30-32 वर्षों में अपनी जड़ें खूब जमा ली हैं| कुख्यात आपराधिक चरित्र के जो लोग अपने राजनीतिक आकाओं के लिए बूथ लूटा करते थे, बाद के दिनों में खुद विधान सभा पहुँचने लगे| लोकसभा भी इनसे दूर नहीं रहा| सभी दलों ने जिताऊ कैंडिडेट मानते हुए इन्हें टिकट बाँटे| हर दल ने इनका स्वागत खुले हाथों से किया| देखते ही देखते हालात बदले और जो पुलिस इनकी तलाश में भागती फिरती थी, वही इनकी सुरक्षा में दिखने लगी|
मुख़्तार परिवार संकट में लेकिन संरक्षक मस्त
कानून की धाराओं को पढ़ने और पुलिस के चश्मे का ही कमाल है कि आज यूपी में मुख़्तार अंसारी का पूरा परिवार संकट में है| सब पर ईनाम है| मऊ से लेकर लखनऊ तक इनकी और इनके चाहने वालों की संपत्तियां जब्त हो रही हैं| ढहाई जा रही हैं|असलहों के लाइसेंस रदद् हो रहे हैं| कानपुर में विकास दुबे की पुलिस मुठभेड़ में मौत भी चश्मे के नम्बर बदलने की वजह से हुई| अन्यथा, वर्षों से अगर उसे संरक्षण दिया किसने था? जांच इस बात की भी होनी चाहिए| प्रयागराज के अतीक और उनके गुर्गे हों या कोई और? किसने इन्हें संरक्षण दिया और क्यों? अब कैसे हो पा रही है कार्रवाई? जितने निर्माण ढहाए गए हैं, सबकी अनुमति तो अफसरों ने ही दी होगी| उनके खिलाफ क्यों नहीं की जानी चाहिए कार्रवाई? किसी जमाने में कुख्यात श्रीप्रकाश शुक्ला को किसने संरक्षण दिया और कैसे वह पुलिस की गोलियों का शिकार हुआ, यह भी अब किसी से छिपा नहीं है| पुलिस की गोलियों से मारा गया ददुआ और ठोकिया भी राजनीतिक दलों के लिए काम करते रहे| आज ददुआ के परिवार के लोग राजनीति में हैं| एक समय था जब चित्रकूट जिले के ग्रामीण इलाकों की विकास की धारा ददुआ ही तय करता रहा| पंचायत चुनावों में उसके या गिरोह के सदस्यों का ही कब्ज़ा हुआ करता था|

अपराधियों पर जब भी कार्रवाई होती है, आमजन को ख़ुशी मिलती है लेकिन इन्हीं अपराधियों को संरक्षण देने, लाइसेंस देने में मददगार पुलिस / प्रशासनिक अमले के खिलाफ भी कार्रवाई शुरू हो तो रोग का इलाज दोगुनी रफ़्तार से शुरू हो जाएगा| पर, यह हो नहीं पाता| मुख़्तार की जिन बिल्डिगों को गिराकर एलडीए अफसरों ने वाहवाही लूटी है, उसका नक्शा किसने पास किया था? मुख़्तार के परिवार में असलहों के लाइसेंस किसने दिए थे? क्या इस बात की जाँच-पड़ताल-कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? होनी चाहिए| तभी यह गठजोड़ टूटेगा|
पुलिस-प्रशासन का हुआ बेजा इस्तेमाल
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अवसान की ओर थी| एनडी तिवारी इस पार्टी के अंतिम मुख्यमंत्री थे| उसके बाद से कांग्रेस ने समर्थन जरुर दिया लेकिन खुद कभी सत्ता में नहीं लौट पायी| राम नरेश यादव के बाद मुलायम सिंह यादव पहले गैरकांग्रेसी मुख्यमंत्री बने और इसी के साथ राज्य में एक ऐसी शुरुआत हुई, जो अब परम्परा बन गयी है| शायद उसे कोई तोड़ना भी नहीं चाहता| अब चाहे कोई अनजाना भय हो या सत्ता पर अपनी पकड़ ढीली न होने पाने की चिंता, पर इस राज्य में सभी ने राज चलाने के लिए पुलिस और प्रशासन का अपने-अपने तरीके से इस्तेमाल किया| जब इन अफसरों को इस बात का एहसास हो गया तो वे भी सत्ता का इस्तेमाल अपने हितों के लिए करने लगे तब लखनऊ से लेकर नोएडा तक घोटालों का शोर होने लगा| ऐसा नहीं था कि पहले बेईमानी नहीं होती थी, तब अफसर दाल में नमक मिलाते थे, अब नमक में दाल मिलाने की परम्परा हो चली है| इसी वजह से अनेक बार कुछ घोटालेबाज जेल भी जाते रहे हैं लेकिन ज्यादातर बचते भी रहे हैं|

एनडी तिवारी के बाद किसी ने गृह मंत्री नहीं बनाया
गृह विभाग मुलायम सिंह यादव के पहले कार्यकाल के बाद से अब तक सभी मुख्यमंत्रियों ने अपने पास ही रखा और इसका भरपूर लाभ पहले के गृह सचिव, प्रमुख सचिव गृह और अब अपर मुख्य सचिव गृह के रूप में तैनात अफसर उठा रहे हैं| पुलिस प्रतिष्ठान की छवि में बट्टा लगाने में गृह विभाग के अफसरों ने कोई कसर नहीं छोड़ी क्योंकि पुलिस की चमक-दमक से दूर ये भी नहीं रहना चाहते या यूँ कहें कि सीएम इन्हीं के सहारे पुलिस को हाँकते आ रहे हैं| किसी भी सीएम ने गृह विभाग किसी सहयोगी मंत्री को नहीं सौंपा| अनेक परम्पराओं, मान्यताओं, रूढ़ियों को तोड़कर नया रिकार्ड बनाने और भारी बहुमत से सरकार बनाने वाले मौजूदा सीएम योगी आदित्यनाथ भी अपनी कैबिनेट में किसी को गृह विभाग नहीं सौंप पाये| खैर, मुख्यमंत्रियों ने अपने सहयोगी को गृह विभाग क्यों नहीं सौंपा? इसके पीछे कारण क्या थे? इस पर अपनी-अपनी जानकारी के हिसाब से हर किसी की अलग-अलग राय हो सकती है लेकिन मोटी-मोटी जो धारणा बनी हुई है, वह यही है कि पुलिस विभाग के जरिए प्रदेश को संचालित करने की नियति की वजह से ऐसा नहीं किया गया| पुलिस एक ऐसा विभाग है जो अनेक कारणों से खूब विवादों में रहता है और यह महत्वपूर्ण महकमा गृह विभाग के अधीन ही आता है|
जोर-जुगाड़ से बनीं सरकारें और इस्तेमाल हटा रहा सिस्टम
मुलायम सिंह यादव जब पहली बार सीएम बने तो जोर-जुगाड़ से बने थे| मायावती और कल्याण सिंह ने भी जोर-जुगाड़ से सरकारें बनाईं और चलाईं| अनेक बार पुलिस सरकारों के गठन में टूल बनती हुई दिखी| बदनाम भी हुई लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि पुलिस ने वही किया जो उसके आका ने चाहा और कहा| उधर, जब मुख्यमंत्रियों ने पुलिस का 'दुरुपयोग’ अपने हिसाब से करना शुरू किया और उसका लाभ अपने दल और लोगों तक पहुँचाना शुरू किया तो इसका लाभ लेने में पुलिसजन भी पीछे नहीं रहे| उन्होंने भी अपने-अपने तरीके से नेताओं का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए किया| मनचाही पोस्टिंग हो या जायज-नाजायज काम का समर्थन, उसके बाद ज्यादा शुरू हुआ| एक रोचक तथ्य यह भी रहा कि सीएम ने गृह मंत्री भले न किसी को बनाया हो लेकिन इस कुर्सी पर किसी के न रहने और हर मुख्यमंत्री की अन्यत्र व्यस्तता का लाभ अपने तरीके से उठाने में सरकारों में प्रभावशाली मंत्री और गृह सचिव के रूप में तैनात अफसर कभी पीछे नहीं रहे| अपनी चाहत को पूरी करने के लिए ही तबादलों के सभी नियम बार-बार और अनेक बार खंड-खंड होते हुए देखे गए| कथित नियम आज भी लागू हैं, अब तो सुप्रीम कोर्ट का डंडा भी है लेकिन 'जनहित’में लगातार फैसले होते आ रहे हैं| इन्हीं तबादलों की आड़ में गृह विभाग के अफसर पुलिस को अपने काबू में करते गए और अब बहुत कामयाबी के साथ इसे संचालित कर रहे हैं|
जानकर कहते हैं कि पहले हर रोज राज्य की गतिविधियों की रिपोर्ट देने के लिए इंटेलिजेंस प्रमुख जाया करते थे| सीएम से उनकी यह मुलाकात एकांत में होती थी| ऐसे में लिखकर देने वाली बात कागज में और जुबानी बताने वाली बात खुद से बता देते थे| यह रिपोर्टिंग केवल पुलिस की नहीं होती थी, इसमें डीएम, कमिश्नर, अन्य छोटे अफसरों के बारे में भी सूचनाएं देने की परम्परा थी| धीरे-धीरे यह परम्परा टूटती गयी और अब इंटेलिजेंस की रिपोर्ट केवल फाइल का हिस्सा है और वह भी गृह विभाग के माध्यम से मुख्यमंत्री के दफ्तर तक पहुँचने की व्यवस्था है| ऐसे में ढेरों कच्ची बातों से सीएम अवगत ही नहीं हो पा रहे हैं, जो उन्हें सहज मिल जाती थीं| अब जो भी सूचनाएं पहुँच रही हैं, वह अफसरों के फिल्टर के बाद पहुँच रही हैं|

कागज में डीजीपी हैं सीएम के सलाहकार
पुलिस रेगुलेशन में दर्ज है कि डीजीपी मुख्यमंत्री का सलाहकार होगा| पर, आज ऐसा कुछ भी नहीं है| डीजीपी हर तरह से सीनियर होने के बावजूद प्रमुख सचिव गृह की मातहती में ही काम कर रहे हैं| बहुत से अधिकार अब डीजीपी के पास नहीं है| इसका नुकसान यह हुआ कि अफसरों की निष्ठा अब पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से ज्यादा गृह विभाग के अफसरों के प्रति है| पुलिस रेगुलेशन में एक और व्यवस्था है| वह यह कि जिले का एसपी थानाध्यक्ष की तैनाती जिलाधिकारी की मंजूरी से करेगा| उसका कड़ाई से पालन हो रहा है और सीएम के सलाहकार होने के बावजूद डीजीपी का कद दिन-ब-दिन कम होता गया| राजनीतिक लोगों को इतना महीन ज्ञान नहीं है और सचिव संवर्ग उन्हें अपनी सुविधा से ही ज्ञान देना पसंद करते हैं| पुलिस के इस्तेमाल या कहिये कि दुरुपयोग की शुरुआत चौकी स्तर तक पहुँच चुकी है| व्यवस्था सड़ चुकी है| यहाँ तक पहुंचाने में सभी ने अपना-अपना योगदान अपने-अपने तरीके से दिया| नेता भी| अफसर भी| प्रकाश सिंह उत्तर प्रदेश के अंतिम डीजीपी थे जो किसी भी गृह सचिव के दफ्तर में दरबार नहीं लगाते थे| वे सीएम या कभी सीएस से मिलते और वापस अपने दफ्तर| कालान्तर में बुआ सिंह ने डीजीपी के रूप में अनेक बार प्रमुख सचिव गृह को अपने दफ्तर बुलाना शुरू कर दिया था लेकिन यह तब संभव हुआ था जब वे खुद सीएम के बहुत ज्यादा करीब थे और तब के प्रमुख सचिव गृह से उनकी व्यक्तिगत दोस्ती थी|
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डीजीपी के रूप में प्रकाश सिंह एसपी की पोस्टिंग करके शासन को सूचना भेज दिया करते थे| तब भी आदेश आईजी कार्मिक के दस्तखत से निकलते थे और आज भी, बस फर्क यह आया है कि अब पुलिस उपाधीक्षक तक के तबादले की सूची शासन से बनकर डीजीपी दफ्तर भेज दी जाती है और यहाँ के अफसर उसका औपचारिक आदेश निकालकर संबंधित अधिकारी तक भेजने और फाइल्स में औपचारिक तरीके से लगाने का काम बेहद तल्लीनता से करते नजर आ रहे हैं| कई बार ऐसा भी देखा गया है कि अधिकारी नई जगह ज्वाइन कर लेता है और उसका औपचारिक आदेश बाद में बनता है|
सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी न हो पाया लागू
पुलिस महकमे में लगातार आई इन गिरावटों और ईमानदार पुलिस अफसरों-कर्मचारियों का मनोबल बढ़ाने के इरादे से दो बार यूपी के डीजीपी रहे प्रकाश सिंह सुप्रीम कोर्ट जाते हैं| वहाँ लम्बी लड़ाई के बाद उन्हें जीत मिलती है| वे खुश होते हैं| प्रकाश सिंह मीडिया की नजरों में हीरो की तरह दिखने लगते हैं क्योंकि उनकी लड़ाई पुलिस महकमे के आन-बान-शान की लड़ाई थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अपने सख्त फैसले के रूप में उनके पक्ष में दिया था लेकिन अफ़सोस देश के किसी भी हिस्से में वह फैसला आज भी पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है| जहाँ कुछ हिस्सा लागू भी हुआ है वहाँ भी कागजी आदेश और जमीनी सच्चाई में जमीन-आसमान का फर्क है| 'जनहित’ के नाम पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की धज्जियाँ पूरे देश में उड़ाई जा रही हैं और किसी के कान पर जूँ तक नहीं रेंगे रही है|उत्तर प्रदेश में भी|रिटायर पुलिस अफसर के रूप में प्रकाश सिंह अभी भी सक्रिय हैं लेकिन उनकी मेहनत पर नेताओं-पुलिस/प्रशासनिक अफसरों का गठजोड़ सुबह-शाम पानी फेर रहा है| पुलिस में गिरावट की शुरुआत और अब, जब पुलिस जमीन के अंदर दिखती है, तब में अब में 30 वर्ष से ज्यादा का फासला है| वर्ष 1990 में जो युवा आईपीएस के रूप में भर्ती हुए, वे डीजी स्तर के अधिकारी हैं| कई तो रिटायर हो चुके हैं| उनके बाद आने वाली पीढ़ी का प्रवेश ही उसी गिरावट के दौर में हुआ है| हमारे बुजुर्ग भी कहते हैं कि बच्चे जो देखते हैं, वही सीखते हैं| अब जब शीर्ष अधिकारी नेताओं के पैरों में पड़े मिलेंगे तो नए अफसर को ग़लतफ़हमी हो सकती है और वह उस दिशा में कदम बढ़ा चुका है| बड़ों का पैर छूना कतई दोष नहीं है| यह हमारे संस्कार हैं लेकिन अगर सिर पर सरकारी टोपी लगाकर कोई बेटा भी अपने पिता के पैर छूता है तो यह पद की गरिमा के खिलाफ है| लेकिन अब तो सरेराह अधिकारी नेताओं के पैर छू रहे हैं| नेताओं के जूते-चप्पल उठाते हुए अनेक वीडियो वायरल हो चुके हैं|

झूठ के दावे की शानदार दीवार
ध्यान रहे, जब भी राज्य में अपराध बढ़ते हैं तो तत्काल शासन-प्रशासन के अधिकारीगण आंकड़ों के जरिए बताते हैं कि उनके शासन काल में अपराध पिछली सरकार की तुलना में कम हुए हैं|ऐसा कोई सीएम नहीं जिसके कार्यकाल में ऐसे आँकड़े पेश न किये जाते हों| इसके दो पहलू हैं| एक-अगर यह सच है कि पिछली सरकार से इस सरकार में आंकड़े कम हुए हैं तो इन वर्षों में राज्य को अपराध मुक्त हो जाना चाहिए था| दो-इस सच को सब जानते हैं कि हमारी पुलिस अपराध दर्ज करने में कितनी फिसड्डी है| फिर भी झूठे दावे पर शानदार दीवार खड़ी करना कोई हमारे नेताओं की देखरेख में पल रहे अफसरों से सीखे| अच्छा होता कि हम एक बार सभी थानेदारों को खुली छूट देते कि जो भी सूचनाएं थाने पहुँच रही हैं, उन्हें वे खुले मन से दर्ज कर सकें तो शायद राज्य को ज्यादा फायदा हो पाता| अपराध के हिसाब से पुलिस का आधुनिकीकरण करने की मांग जोर पकड़ती| पुलिस आज भी झूठी सूचनाएं दर्ज करने के बाद एक्सपंज करती है| कम से कम एक बार सच तो सामने आता| पर, अफ़सोस कोई नहीं चाहता कि सच सामने आये| सबकी मंशा अपने कार्यकाल को चमकाने की है और उस चक्कर में अपराध सामने नहीं आ पा रहे हैं| थानों से लेकर तहसीलों में छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए रिश्वत आम बात है| पर, ढेरों कथित प्रयास के बाद ये रुक नहीं पा रहे हैं| आखिर कौन है जो इन्हें रिश्वतखोरों को समर्थन दे रहा है| रजिस्ट्री दफ्तरों में रिश्वत की दरें आम हैं| पर क्यों नहीं रुक पा रही है राज्य भर के रजिस्ट्री दफ्तरों में रिश्वतखोरी और कौन दे रहा है इस गिरोह को ताकत? खनन हमेशा से विवादों में रहा है|नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार में डूबे इस महकमे की नजीर हैं गायत्री प्रजापति| अफसरों की कृपा से जेल में लम्बी पारी खेल रहे हैं| उनकी मदद करने वाला कोई भी अफसर उनके साथ जेल नहीं गया| पुलिस इन सभी मामलों में सहयात्री है|
सच्चाई-ईमानदारी के अब केवल किस्से
अब एक नयी मुश्किल आ खड़ी हुई है| वह यह कि सच्चाई-ईमानदारी के अब केवल किस्से ही हैं| नए अफसरोंके सामने मॉडल अफसरों का भारी टोटा है| कुछ अगर हैं भी तो कहीं ऐसी जगह पड़े हुए हैं, जहाँ नवनियुक्त अफसरों का ध्यान ही नहीं जाता|ऐसे में निश्चित मोदी-योगी के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की हवा निकालने में अफसरों-नेताओं का गठजोड़ अपना पूरा काम ईमानदारी से कर रहा है| मैं दुआ करूँगा कि पुलिस–नेता-अफसर अपनीदागदार छवि से बाहर निकल पाएँ| और जनता को इनके कर्तव्यों का लाभ मिल सके| हालाँकि, अभी यह दूर की कौड़ी है, तब जब मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी की मेहनत और ईमानदारी पर उनके राजनीतिक विरोधियों के अलावा किसी और को शक नहीं है|
(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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