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Millets in India: मोटी रोटी, ऊंचे लोग

माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स का एक वीडियो सामने आया है जिसमें वो मक्के की रोटी बनाते हुए दिख रहे हैं। इस वीडियो के सामने आने के बाद एक बार फिर मोटे अनाज से बनी मोटी रोटी की चर्चा शुरु हो गयी है।

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Millets in India: कोई ज्यादा समय नहीं बीता जब मोटी रोटी खाने वालों को छोटे लोग कहकर व्यंग किया जाता था। लेकिन बीते कुछ सालों में अचानक से मोटे अनाज के बढते महत्व ने पूरे विमर्श को बदलकर मोटी रोटी ऊंचे लोग कर दिया है। बिल गेट्स का वीडियो सामने आने के बाद शायद मोटे अनाज की सामाजिक चर्चा और आत्मविश्वास और बढे।

वरना, सत्तर अस्सी के दशक तक उत्तर भारत के अधिकांश ग्रामीण इलाकों में मोटे अनाज खाने वालों को अपने आप गरीब समझ लिया जाता था। आज भी ग्रामीण इलाकों में ऐसे लोग मिल जाएंगे जो आपको बताएंगे कि कैसे बचपन में वो अपने घरों में मेहमान के आने की प्रतीक्षा करते थे। यह प्रतीक्षा इसलिए नहीं होती थी कि मेहमान से उन बच्चों का कोई खास लगाव होता था। उन्हें पता होता था कि मेहमान घर में आयेंगे तो गेंहू की नर्म मुलायम रोटी खाने को मिलेगी।

हो सकता है ऐसी कहानियों पर आज लोगों को भरोसा न हो लेकिन ये सच है। बिहार और यूपी के पूर्वी हिस्से में जहां 1966-67 के दौरान भुखमरी फैली थी उससे उबरने में लंबा समय लगा। और ये भुखमरी कोई पहली बार तो फैली नहीं थी। उत्तर और पूर्वी भारत में भुखमरी का भयावह इतिहास रहा है। 1770 में बंगाल की भुखमरी इतनी भयावह थी कि बंगाल और वर्तमान बिहार की जनसंख्या 33 प्रतिशत (अनुमानित) कम हो गयी। उस समय बंगाल में दोहरा शासन था। बंगाल के नवाब नज्म उद दौला तथा ईस्ट इंडिया कंपनी। टैक्स वसूलने का काम नवाब का था लेकिन टैक्स की दरें निर्धारित ईस्ट इंडिया कंपनी करती थी। किसानों से कर वसूलने के लिए सख्ती की जाने लगी। लेकिन 1767-68 में फसलों की पैदावार अच्छी नहीं हुई। नतीजा, भुखमरी के नाम पर बड़ी जनसंख्या का विनाश।

इसके बाद भी भुखमरी के दौर आते ही रहे हैं। 1838 से 1838, 1860-61, 1866-68 में आनेवाली पंजाब, राजस्थान और कश्मीर की भुखमरी जिसमें 20 से 40 लाख लोग के करीब भूख से मर गये। 1866 की उड़ीसा की भुखमरी। 1876 से 1878 की मद्रास की भुखमरी। इतिहासकार कहते हैं कि इस मुखमरी में दक्षिण का अधिकांश हिस्सा आ गया था और 80 लाख से एक करोड़ लोग इसमें भूख से मारे गये थे। फिर आजादी से ठीक पहले 1943 में दोबारा बंगाल में आयी भुखमरी में भी 30 से 40 लाख लोग मारे गये थे।

एक लंबा दौर भारत में विदेशी शासकों का रहा तो उनके शासन में अनर्गल टैक्स के कारण आने वाली भुखमरी का भी रहा। ऐसे भयावह अतीत से जब भारत स्वतंत्र हुआ तो उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकता भोजन की अनिवार्य जरूरत को सुनिश्चित करना था। इस दिशा में स्वतंत्रता के बाद से ही प्रयास शुरु हो गये। भारत में रहनेवाले हर नागरिक को भरपेट भोजन मिल सके, इसके लिए जहां कृषि में बुनियादी बदलाव की जरूरत थी वहीं त्वरित पैदावार की भी जरूरत महसूस की गयी।

इन्हीं जरूरतों के कारण भारत ने परंपरागत मोटे अनाज से मुंह मोड़ना शुरु कर दिया। इसमें गेहूं एक ऐसा विकल्प बनकर उभरा जो कम से कम सबको भरपेट रोटी दे सकता था। इसे ग्रीन रिवोल्यूशन कहा गया जिसके प्रवर्तक वही लाल बहादुर शास्त्री थे जो स्वयं उस पूर्वी उत्तर प्रदेश से आते थे जहां गेहूं की नर्म मुलायम रोटी सबसे बड़ा सुख समझा जाता था।

1968 से शुरु हुए ग्रीन रिवोल्यूशन में मुख्य रूप से गेहूं और चावल का उत्पादन बढाने पर जोर दिया गया। भारत में इस ग्रीन रिवोल्यूशन का विचार नार्मन एस बोरलार्ग ने दिया था जो स्वयं गेहूं उत्पादन से जुड़े साइंटिस्ट थे। मैक्सिको में जब उन्होंने रॉकफेलर फाउण्डेशन की मदद से गेहूं का उत्पादन बढाने वाले प्रयोग शुरु किये तो शुरुआत में वहां भी किसानों ने विरोध किया था। हालांकि उनका वह प्रयोग भारत में ग्रीन रिवोल्यूशन बनकर आया और देखते ही देखते भारत में गेहूं मुख्य अनाज बन गया।

1960 के दशक में मात्र 11 मिलियन गेहूं का उत्पादन करने वाले भारत ने 2022 में 112 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन किया है। यानी छह दशक में गेहूं के उत्पादन में दस गुने से अधिक की वृद्धि हुई है। निश्चित ही इस दौरान भारत की जनसंख्या भी 50 करोड़ से बढकर 140 करोड़ हो गयी है। इस बढती हुई जनसंख्या को भरपेट रोटी देने का काम गेहूं ने ही किया।

लेकिन गेहूं के साथ कई बीमारियां भी मनुष्य के शरीर में घर करने लगीं। आज जो नये शोध हो रहे हैं उसके मुताबिक गेहूं में पाया जानेवाला ग्लूटेन पाचन संबंधी समस्याएं पैदा करता है। शरीर में पहुंचनेवाले भोजन में प्रोटीन और कार्बोहाइट्रेड को शरीर पचा लेता है लेकिन ग्लूटेन को पूरी तरह नहीं पचा पाता है। यहीं से शरीर में बीमारियों का जन्म होना शुरु होता है। बिना अवशोषित गेंहू का ग्लूटेन प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कई प्रकार की बीमारियों का कारण बनता है।

उस पर कोढ में खाज हुआ गेंहू के उत्पादन में अत्यधिक केमिकल फर्टिलाइजर का इस्तेमाल। ग्रीन रिवोल्यूशन मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में घटित हुआ। यहां गेहूं की अत्यधिक पैदावार पाने के लिए आवश्यकता से अधिक केमिकल फर्टिलाइजर का इस्तेमाल हुआ जिसके कारण गेहूं में जहरीले रासायनिक तत्व आ गये। आज भारत में कैंसर, डाइबिटीज जिस तरह से महामारी का रूप लेती जा रही हैं उसका एक कारण केमिकल फर्टिलाइजर युक्त खाद्यान्न भी हैं।

ऐसे में इस दुष्चक्र को तोड़ने के लिए जरूरी है कि भारत के लोग मोटे अनाज की ओर दोबारा लौटें। मोटे अनाज हों, दलहन हों या फिर तिलहन। ये ऐसी फसलें होती हैं जिनमें सबसे कम केमिकल फर्टिलाइजर का इस्तेमाल होता है, या तो बिल्कुल नहीं होता। ये अधिक फाइबरयुक्त होते हैं इसके कारण इनको पचाने में शरीर को अतिरिक्त मेहनत नहीं करनी पड़ती। इसलिए गेहूं के मुकाबले में मोटे अनाज शरीर को संतुलित रखने में मदद करते हैं।

भारत में केमिकल फर्टिलाइजर युक्त खाद्यान्न के कारण बढती बीमारियों को देखते हुए यह जरूरी है कि भारत के लोगों को याद दिलाया जाए कि उनके परंपरागत मोटे अनाज ज्यादा पौष्टिक और स्वास्थवर्धक हैं। वो अपने मोटे अनाजों की ओर वापस लौटें। सरकारी तौर पर भले ही 2023 को 'मिलेट इयर' घोषित कर दिया गया है लेकिन इतने से बात बनेगी नहीं। इसके लिए सामाजिक रूप से जनजागरण जरूरी है। मोटे अनाज खाना छोटे लोगों की निशानी नहीं है, बल्कि ऊंचे लोग होने की पहचान है। गेहूं की पतली नर्म मुलायम रोटी छोड़कर मोटे अनाज की मोटी रोटी की ओर लौटने का समय आ गया है। या कम से कम इन दोनों के बीच संतुलन बनाने का समय तो आ ही चुका है।

यह भी पढ़ें: Year of Millets: क्या है मिलेट मिशन 2023? क्यों दे रही सरकार इस पर इतना जोर?

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