Opinion: काशी में संघ प्रमुख मोहन भागवत की उपस्थिति में संपन्न हुआ अक्षय कन्या दान समारोह
Opinion: विगत दिनों अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर वाराणसी में शंकुल धारा कुंड पर संपूर्ण विधि विधान और भव्यता के साथ 125 कन्याओं का सामूहिक विवाह समारोह आयोजित किया गया जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की गरिमामयी उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय रही।
इस अनूठे अक्षय कन्या दान समारोह में संघ प्रमुख ने स्वयं भी रजवंती नामक एक आदिवासी युवती के पांव पखारे और परंपरागत विधि से उसका कन्यादान किया।

इस अवसर पर अपने उद्बोधन में संघ प्रमुख मोहन ने कहा कि समाज में विवाह समारोह तो होते रहते हैं किन्तु शिव की नगरी काशी की पावन धरा , गंगा का किनारा और पवित्र तीर्थ शंकुल धारा जैसी पुण्य स्थली पर विवाह होना वर वधू के साथ ही हम सभी के लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने कहा कि विवाह केवल दो व्यक्तियों नहीं बल्कि दो कुटुम्बों और व्यापक रूप से समाज के निर्माण का आधार है। कुटुंब मकान की ईंट के समान होता है और यह संस्कारों से ही मजबूत होता है। संस्कारित व्यक्ति देश और समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। परिवार का अर्थ केवल पति-पत्नी और बच्चे नहीं है।
ऐसा भाव रखने से परिवार और समाज पीछे रह जाता है। भागवत ने कहा कि मानव संस्कृति को अमरता प्रदान करने का जो नैसर्गिक संस्कार है उस परिणय संस्कार का संयोग काशी में भगवान द्वारकाधीश के समक्ष पौराणिक शंकुल धारा कुंड पर देखने को मिला। जिन लोगों ने भी यहां जिसे बेटी मानकर कन्या दान किया है उनसे मेरा अनुरोध है कि वे उसके सुख-दुख में साथ निभाएं। जिस बेटी का आज उन्होंने कन्यादान किया है उसे साल में एक बार अवश्य अपने घर बुलाएं और एक बार उसके घर जाएं।
संघ प्रमुख ने कहा विश्व में शांति का मार्ग प्रशस्त करने के लिए अपनत्व की भावना को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि मजहब से नहीं बल्कि अपनेपन से विश्व में शांति लाई जा सकती है। हमारी संस्कृति दुनिया में मार्गदर्शन का केंद्र बिंदु रही है।जिसने भी विश्व को अपना कुटुंब माना उसके सामने सब झुक जाते हैं । संघ प्रमुख ने कार्यक्रम के आयोजन पर हर्ष व्यक्त करते हुए काशी के लोगों से अनुरोध किया कि कि वे ऐसा कार्यक्रम इस पावन तीर्थ पर हर साल आयोजित करें और अगर किसी कारण वश यह पवित्र तीर्थ स्थान उपलब्ध न हो तो किसी दूसरे स्थान पर करिए लेकिन यह सिलसिला जारी रहना चाहिए।यह हमें जिम्मेदार बनाने वाला कार्यक्रम है।
समाज को एक जुट करने और समाज को बनाने वाला माध्यम है। जिन लोगों की इस साल कन्या दान करने की इच्छा अधूरी रह गई हो वे अगले साल अक्षय तृतीया के पुनीत अवसर पर और भव्यता के साथ यह कार्य क्रम आयोजित कर उसमें अपनी इच्छा पूर्ण करें। भागवत ने कहा कि जिन लोगों ने कन्या दान किया उन्होंने महान कार्य किया। हर व्यक्ति को साल में एक बार कन्या दान का पवित्र कार्य अवश्य करना चाहिए।
मोहन भागवत ने 125 कन्याओं के इस यादगार सामूहिक विवाह कार्यक्रम में एक आदिवासी युवती रजवंती का परंपरागत विधि से कन्या दान किया। उन्होंने दुल्हन के पांव पखारने से लेकर विदाई तक सभी पारंपरिक रस्में पूर्ण की और उसे पिता के रूप में अपना आशीर्वाद प्रदान किया। संघ प्रमुख ने विदाई के वक्त रजवंती के पति से कहा मेरी बेटी का ख्याल रखना। उल्लेखनीय है कि रजवंती के पिता जयनाथ माल ढुलाई का कार्य करते हैं जबकि रजवंती से परिणय बंधन में आबद्ध हुए अमन वाहन चालक हैं। अमन ने दो दिन पहले ही रजवंती को देखा था और उसी समय उसे अपनी जीवन संगिनी बनाने की इच्छा व्यक्त की थी। मोहन भागवत ने नवदंपति को शगुन के रूप में 501 की राशि भेंट की।
इस अनूठे सामूहिक विवाह कार्यक्रम के अंतर्गत 125 दूल्हों को सुसज्जित बग्घी और घोड़ी पर बिठा कर विवाह मंडप तक लाया गया। इस आयोजन में जिन जोड़ों ने सात फेरे लिए उनमें अधिकांश ऐसे थे जिनके घरों में आर्थिक परेशानियों के कारण शादी में विलम्ब हो रहा था। वाराणसी के शंकुल धारा कुंड के तट पर संपन्न अक्षय कन्या दान समारोह में 125 वेदियां तैयार की गई थीं जिन पर पूरे विधि-विधान के साथ 125 जोड़ों के विवाह की रस्में पूर्ण कराने के लिए 125 आचार्य मौजूद थे।
यह अनूठा अविस्मरणीय अक्षय कन्या दान समारोह श्री काशी विद्वत परिषद के महामंत्री प्रोफेसर रामनारायण द्विवेदी की देखरेख में संपन्न हुआ।इस कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश सरकार के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री डा महेंद्र नाथ पांडेय सहित अनेक विशिष्ट अतिथियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
डिस्क्लेमर: लेखक राजनैतिक विश्लेषक हैं। ये लेखक के अपने विचार हैं oneindia hindi इसकी वैचारिक पुष्टि नहीं करता है।
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