इंडिया गेट से: ममता का एजेंडा कुछ और था

ममता बनर्जी राष्ट्रपति चुनाव के लिए साझा उम्मीदवार की कोशिश कर रही हैं। हालांकि उन की यह कोशिश न तो कांग्रेस को पसंद आ रही है, न बाकी विपक्षी दलों को।

नई दिल्ली: राष्ट्रपति के चुनाव की तस्वीर एक दम साफ़ है। इसलिए भाजपा के बाद सब से ज्यादा वोटों वाली कांग्रेस ज्यादा समझदारी से काम ले रही है। लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभाओं के सभी वोटरों को मिला कर भाजपा के पास 4,56,582 वोट हैं, सहयोगी दलों के साथ मिल कर भाजपा के पास 5,25,893 वोट हैं, जो कुल मिला कर 48.67 प्रतिशत बन रहा है। कांग्रेस 1,47,181 वोटों के साथ दूसरे नंबर पर है और सहयोगी यूपीए दलों के वोटों को मिला कर उसके पास 2,59,290 वोट हैं, जो कुल मिला कर 24.02 प्रतिशत बन रहा है।

mamata banerjee

23 जून को लोकसभा की तीन सीटों आजमगढ़, रामपुर, संगरूर और विधानसभाओं की सात सीटों पर चुनाव हो जाने के बाद भाजपा कांग्रेस की मौजूदा वोट संख्या पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ेगा। कांग्रेस जानती है कि भाजपा का चुनाव जीतना तय है, इसलिए वह राष्ट्रपति पद के चुनाव में विपक्षी एकता की कोई पहल नहीं कर रही है। पर सिर्फ 58,632 वोटों वाली तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी साझा उम्मीदवार की कोशिश कर रही हैं। हालांकि उन की यह कोशिश न तो कांग्रेस को पसंद आ रही है, न बाकी विपक्षी दलों को।

शरद पवार ने तो ममता बनर्जी और उन से बात करने गए कम्युनिस्ट नेताओं सीताराम येचुरी और डी राजा को साफ़ ही कह दिया था कि वह हारने के लिए उम्मीदवार नहीं बनेंगे। पर ममता बनर्जी का एजेंडा दूसरा है। वह खुद को विपक्ष की धुरी बनाना चाहती हैं। पहले प्रशांत किशोर ने उन्हें राष्ट्रीय विकल्प बनने का सपना दिखाया था और अब भाजपा के दो पूर्व नेताओं यशवंत सिंहा और सुधीन्द्र कुलकर्णी ने ममता के दिमाग में बिठा दिया है कि सोनिया गांधी राजनीतिक तौर पर निष्प्रभावी हो चुकी हैं, शरद पवार भी जल्द ही निष्प्रभावी होने वाले हैं, राहुल गांधी अपना प्रभाव बना ही नहीं पा रहे, इसलिए भाजपा का राष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला करने के लिए वही बचती हैं।

ये सुधीन्द्र कुलकर्णी वही हैं, जिन्होंने लाल कृष्ण आडवाणी से जिन्ना की तारीफ़ में कसीदे पढ़वा कर उनका राजनीतिक कैरियर चौपट करवाया था। सब लोगों ने देखा होगा कि ममता बनर्जी की ओर से 16 जून को बुलाई गई बैठक का असली एजेंडा क्या था। बैठक बुलाई तो साझा उम्मीदवार तय करने के लिए थी, लेकिन ममता ने मोदी सरकार के खिलाफ एक प्रस्ताव पेश कर दिया। इस प्रस्ताव को यशवंत सिन्हा और सुधीन्द्र कुलकर्णी ने ही तैयार किया था। मकसद था राष्ट्रीय स्तर पर मोदी विरोधी लीडरशिप हथियाना। बैठक में शामिल सभी दलों के नेता घोर मोदी विरोधी हैं, इसके बावजूद यूपीए के घटक दलों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया।

टी आर बालू ने कहा कि बैठक तो साझा उम्मीदवार तय करने के लिए थी, ममता के लिए यह संकेत काफी था कि विपक्ष की नेता सोनिया गांधी हैं और अगर विपक्ष की तरफ से कोई साझा प्रस्ताव पास किया जाना है, तो वह बैठक सोनिया गांधी की ओर से बुलाई जानी चाहिए। लेकिन ममता की इज्जत बचाने के लिए छोटा सा प्रस्ताव पास कर दिया गया।

ममता को अपनी औकात में रहने के लिए दूसरा संकेत शरद पवार ने खुद दिया, जब प्रेस कांफ्रेंस में अपनी संक्षिप्त सी बात कहकर माईक ममता के हाथ में थमा कर वह उठकर चले गए। अगर ममता बनर्जी को जरा भी समझ होगी तो वह समझ गई होंगी कि उन्हें विपक्ष के नेता के तौर पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। वैसे तो उन के लिए यह संकेत ही काफी था कि बैठक में बुलाए गए सात मुख्यमंत्रियों एम के स्टालिन, उद्धव ठाकरे, हेमंत सोरेन, पिनयारी विजयन, के. चन्द्रशेखर राव, अरविन्द केजरीवाल, भगवंत सिंह मान और नवीन पटनायक में से कोई नही आया।

इनमें तीन मुख्यमंत्री तो यूपीए के हैं, वे सोनिया को अपना नेता मानते हैं। दो राज्यों में आम आदमी पार्टी की सरकार होने के बाद अब केजरीवाल खुद को ममता से बड़ा नेता मानते हैं। सीपीएम और सीपीआई के महासचिव तक बैठक में नही आए, तो सीपीएम के मुख्यमंत्री के आने का तो सवाल ही नहीं था। नवीन पटनायक के आने की बात तो ममता ने सोच ही कैसे ली। उनके पास 31,686 यानी 2.94 प्रतिशत वोट हैं, भाजपा को जिताने के लिए वह एक ही काफी हैं। जब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और वाईएसआर के अध्यक्ष जग्गन मोहन रेड्डी को बुलाया ही नहीं गया तो ममता राष्ट्रपति चुनाव में हार तो पहले ही मान चुकी हैं। क्योंकि 45,550 यानि 4.22 वोटों के साथ जगनमोहन रेड्डी अकेले ही भाजपा उम्मीदवार की जीत तय कर सकते हैं।

जगनमोहन रेड्डी को नहीं बुलाए जाने से ही साफ़ है की ममता का मकसद राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा को कड़ी टक्कर देना नहीं, बल्कि अपनी लीडरशिप स्थापित करना था। लेकिन उस में वह पूरी तरह विफल हो गई, क्योंकि किसी भी दल का कोई बड़ा नेता बैठक में नहीं आया। कांग्रेस में दूसरे नंबर के नेता राहुल गांधी और पद के हिसाब से तीसरे नंबर के नेता अधीर रंजन चौधरी हैं, न कि मल्लिकार्जुन खड्गे। जयराम रमेश और सुरजेवाला तो आठवें दसवें नंबर के नेता भी नहीं। कुल मिलाकर ममता को सभी छोटे-बड़े दलों ने उनकी औकात बता दी है।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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