Nepotism in Politics: वंशवादी दलों में आंतरिक लोकतंत्र बहाल करना जरूरी
Nepotism in Politics: अजित पवार की बगावत के बाद एनसीपी भी शिवसेना की तरह ही दो-फाड़ हो सकती है। एकनाथ शिंदे ने बगावत करके शिवसेना को न सिर्फ तोड़ दिया था बल्कि उसी बगावत से वह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बन बैठे। शिंदे का विद्रोह मात्र पार्टी छोड़ने और विधायकों को बीजेपी के साथ लाने तक ही सीमित नहीं था वरन उन्होंने शिवसेना से ठाकरे परिवार का लगभग अस्तित्व ही समाप्त कर दिया। उद्धव ठाकरे से पार्टी का चुनाव चिह्न और नाम भी छीन लिया। इसी प्रकार संभावना है कि नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिन्ह भी अजित पवार गुट को मिल जाएगा।
लेकिन यह प्रश्न यहीं समाप्त नहीं होता। यह घटनाक्रम भारतीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली पर एक बहुत बड़ा प्रश्न खड़ा करता है। संविधान में स्पष्ट व्यवस्था नहीं होने के कारण इस तरह की "आया राम, गया राम" की राजनीति चलती रहती है। इसी के साथ एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि इस तरह के विद्रोह किसी पार्टी में क्यों होते हैं? अधिकतर ऐसा होता है कि यह विद्रोह उन नेताओं के विरुद्ध ही होते हैं जिन्होंने विद्रोही को पाल पोस कर राजनीतिक रूप से बड़ा किया होता है, विद्रोही का कद बढ़ाया होता है और उसको पहचान दी होती है। एक नहीं अनेकों ऐसे उदाहरण हैं। तेलुगू देशम के चंद्रबाबू नायडू द्वारा अपने ससुर एनटी रामाराव के विरुद्ध मोर्चा खोल करके पार्टी को हड़प लेना, एकनाथ शिंदे द्वारा अपनी ही पार्टी के नेता के विरुद्ध विद्रोह कर पार्टी को हड़प लेना इत्यादि, ऐसे कई उदाहरण हैं।

इस तरह के विद्रोह के दो प्रमुख कारण हैं- एक संविधान और कानून में स्पष्ट व्यवस्था का ना होना और दूसरा वंशवाद और परिवारवाद की राजनीति। हम आगे इन दोनों विषयों को अलग-अलग समझने का प्रयास करेंगे। भाजपा और कम्युनिस्ट पार्टियों को छोड़कर किसी भी अन्य पार्टी को ले लीजिए, सभी या तो एक व्यक्ति के गुलाम हैं या एक परिवार के। इनकी पहचान विशिष्ट व्यक्तियों या एक परिवार से होती है। सभी पार्टियों का केस स्टडी करने का कोई मतलब नहीं है। इन सब में एक बात समान है- शुरुआत से लेकर आज तक ये पार्टियां एक ही व्यक्ति/परिवार की विरासत हैं।
जैसे: अब्दुल्ला परिवार के साथ नेशनल कॉन्फ्रेंस; मुफ्ती परिवार के साथ पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी), बादल परिवार के पास शिरोमणि अकाली दल, स्व मुलायम सिंह यादव के बाद उनके बेटे अखिलेश यादव और परिवार के साथ समाजवादी पार्टी (सपा), मायावती के साथ बहुजन समाज पार्टी (बसपा), स्वर्गीय सोने लाल पटेल और अब उनकी बेटी अनुप्रिया पटेल के साथ अपना दल, स्वर्गीय देवीलाल और फिर उनके बेटे ओम प्रकाश चौटाला और अब पोते अभय सिंह चौटाला के साथ इंडियन नेशनल लोकदल, शिबू सोरेन और उनके बेटे हेमंत सोरेन के साथ झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, ममता बनर्जी के साथ अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस, लालू प्रसाद यादव और परिवार के साथ राष्ट्रीय जनता दल, दिवंगत अजीत सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी के साथ राष्ट्रीय लोकदल, ओवेसी परिवार के साथ ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम), दिवंगत बालासाहेब ठाकरे, उद्धव ठाकरे और उनके परिवार के साथ शिव सेना, शरद पवार परिवार के साथ एनसीपी, चंद्रशेखर राव और उनके परिवार के साथ भारत राष्ट्र समिति, दिवंगत एनटी रामाराव और अब उनके दामाद चंद्र बाबू नायडू के साथ तेलुगु देशम पार्टी, दिवंगत एम करुणानिधि के बाद उनके बेटे बेटी स्टालिन, अज़गिरी और कनिमोझी के साथ डीएमके स्थाई रूप से जुड़ी हुई है।
यह सूची संपूर्ण नहीं है, लेकिन राष्ट्र जिस परेशानी से जूझ रहा है, उसका संकेत देती है। उनमें से कई दशकों से इन पार्टियों के अध्यक्ष/प्रमुख नहीं बदले हैं। ये केवल "वंशवाद" की बुराई नहीं है, बल्कि पार्टी के भीतर लोकतंत्र के अभाव में "आंतरिक निरंकुशता" भी है। एक व्यक्ति दशकों तक बल्कि आधी सदी से पार्टी का मुखिया बना रहा। जी हाँ, दिवंगत एम करुणानिधि, 1969 से 2018 में अपनी मृत्यु तक, 49 वर्षों तक DMK के प्रमुख रहे। यह स्वतंत्र भारत में किसी राजनीतिक दल का सबसे लंबे समय तक नेतृत्व करने वाला व्यक्ति है। विडंबना यह है कि यह वह व्यक्ति थे जिन्होंने प्रमुखता से यह आवाज उठायी थी कि "बिना चुनाव के ब्राह्मणों द्वारा मठ पर कब्जा किया जाता है"। लेकिन राजनीति में आने के बाद वह स्वयं "राजनीतिक मठाधीश" बन गये। उन्होंने कभी भी पार्टी के किसी अन्य व्यक्ति को पार्टी का नेतृत्व करने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया और न ही कभी पद को खाली किया। आंतरिक चुनावों में जोड़-तोड़ करके वे अध्यक्ष पद पर बैठे रहे।
परिवारवादी राजनीति के इस स्वभाव के कारण पार्टियों में विद्रोह पनपते हैं। एकनाथ शिंदे, अजित पवार, चंद्राबाबू नायडू या ऐसे अनेक लोग विद्रोह इसीलिए करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि पार्टी पर एक व्यक्ति का कब्जा है जो बढ़ती उम्र के साथ भी खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। अजित पवार ने तो खुले मंच से कह दिया कि 83 साल की उम्र हो जाने के बाद भी आप (शरद पवार) कुर्सी/नहीं छोड़ रहे। आखिर अगली पीढी कब तक इंतजार करे?
अतः वंशवाद और परिवारवाद की राजनीति कैसे समाप्त हो इसपर विचार और व्यवहार आवश्यक है। यह भी आवश्यक है भारतीय लोकतंत्र में इस तरह की दुर्व्यवस्था को समाप्त करने के लिए कानून बनाया जाय। इस तरह के वंशवाद और परिवारवाद को रोकने के लिए निम्नलिखित कानून बनाना आवश्यक है।
पहला, भारत निर्वाचन आयोग के प्रतिनिधि की देखरेख में हर तीन साल में पार्टी का चुनाव कराना अनिवार्य होना चाहिए। यदि कोई राजनीतिक दल ऐसा करने में विफल रहता है, तो उसकी मान्यता रद्द कर दी जानी चाहिए, उसके प्रतीक चिन्ह जब्त कर लिए जाने चाहिए और क़ानून के अनुसार आंतरिक चुनाव होने तक उसे चुनाव लड़ने से रोक दिया जाना चाहिए।
दूसरा, किसी भी व्यक्ति को उसके पूरे जीवन काल में तीन कार्यकाल या 10 वर्ष, जो भी कम हो, से अधिक के लिए पंजीकृत/मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के संगठनात्मक पद पर रहने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए; विशेष रूप से अध्यक्ष/महासचिव/कोषाध्यक्ष के शक्तिशाली पद पर। यदि कार्यकाल समाप्त होने के बाद चुनाव नहीं होते हैं, तो पार्टी को भारत के चुनाव आयोग से अपंजीकृत कर दिया जाना चाहिए, उसका प्रतीक चिन्ह जब्त कर लिया जाना चाहिए और उसे चुनाव लड़ने से रोक दिया जाना चाहिए।
तीसरा, ऐसे किसी व्यक्ति को पदाधिकारी पद के लिए चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, जिसका करीबी रिश्तेदार पहले से ही संगठनात्मक पदों पर है। दूसरे शब्दों में पद या संगठनात्मक पदों का शासन सीधे रक्त संबंधियों जैसे पत्नी, बेटे, बेटियों, पोते/पोतियों, भतीजे, भतीजी, ससुराल वालों इत्यादि को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है। ये पद नियमित रूप से बदले जाने चाहिएं और 'आंतरिक लोकतंत्र' कायम रखना चाहिए।
जब तक परिवारवादी और वंशवादी राजनीति समाप्त नहीं होती कैडर में कुंठा, निराशा और विद्रोह की भावना पनपती रहेगी, विभाजन होते रहेंगे और पहले से ही कुकुरमुत्ते की तरह फैले राजनैतिक दलों की संख्या में वृद्धि होती रहेगी। अन्ततः यही बहुदल लोक सभा और विधानसभाओं में खंडित मत का कारण बन लोकतंत्र को अशक्त करते रहते हैं। इसलिए अब पार्टियों में तोड़फोड़ की खबरों से आगे सोचने की आवश्यकता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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