Nepal Politics: प्रचंड की कुर्सी पर अब सुप्रीम संकट

अभी 25 दिसंबर 2022 को प्रचंड ने तीसरी बार नेपाल के तेरहवें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। लेकिन उनकी कुर्सी पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

Nepal Politics crisis supreme court on Prime Minister Pushp Kumar Dahal prachand

Nepal Politics: नेपाल के माओवादी नेता और वर्तमान प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड एक मुसीबत से निकलते हैं तो दूसरी में फंस जाते हैं। कुछ दिनों पहले केपी शर्मा ओली के समर्थन से प्रधानमंत्री बनने वाले प्रचंड से ओली ने समर्थन इसलिए वापस ले लिया क्योंकि प्रचंड उनके राष्ट्रपति उम्मीदवार को समर्थन करने को तैयार नहीं थे। अब जबकि प्रचंड के समर्थन से नेपाली कांग्रेस के रामचंद्र पौडेल नेपाल के राष्ट्रपति चुन लिये गये हैं तब प्रचंड पर नयी मुसीबत सुप्रीम कोर्ट से आती दिख रही है।

नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड को जनसंहार के मामले में कारण बताओ नोटिस जारी करके पूछा है कि क्यों न उनके खिलाफ अपराधिक जांच की याचिका को मंजूर किया जाये? माओवादी नेता प्रचंड ने भूमिगत रहकर 1996 से 2008 तक नेपाल में चली भयंकर हिंसा का नेतृत्व किया था। नेपाली सेना के खिलाफ छेड़ी गई लड़ाई को वामपंथी अतिवादियों ने उस समय जनयुद्ध का नाम दिया था।

माओवादियों के कथित 'जनयुद्ध' में 5000 से अधिक नेपाली नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया गया था। तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने वाले प्रचंड सार्वजनिक बयान में स्वीकार कर चुके हैं कि जनयुद्घ में 5000 नेपालियों को मौत के घाट उतार दिया गया। प्रधानमंत्री की यह स्वीकारोक्ति ही नई मुसीबत का सबब बनी है। इसे लेकर वरिष्ठ अधिवक्ता ज्ञानेद्र आर्यन और हिंसा के शिकार लोग सर्वोच्च न्यायालय की शरण में पहुंच गए। अदालत ने इनकी याचिका को सुनवाई के लिए न सिर्फ मंजूर कर लिया बल्कि इस पर प्रधानमंत्री प्रचंड के खिलाफ नोटिस जारी कर बड़ा बखेड़ा खड़ा कर दिया है।

अब नेपाल की सर्वोच्च अदालत को प्रधानमंत्री प्रचंड की ओर से आने वाले जवाब का इंतजार है। नेपाली कांग्रेस का राष्ट्रपति बनाकर भले ही प्रचंड निश्चिंत हो चुके हों कि ओली के समर्थन वापसी के बाद भी वो प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे रहेंगे लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट में तय होना है कि प्रचंड आगे प्रधानमंत्री बने रहेंगे या नहीं?

प्रधानमंत्री प्रचंड की प्रतिभा से प्रभावित लोग मानते हैं कि किसी नए पैंतरें से वह मुकदमों की सुनवाई के हश्र तक को प्रभावित कर सकते हैं। उनमें संभावना है कि वो लंबे समय तक जेल जाने से बच सकते हैं। गंभीर अपराध की सजा पाने की आशंका को निर्मूल कर विरोधियों को विस्मित कर सकते हैं। जबकि नेपाल के कानून के जानकारों का कहना है कि इस हाई प्रोफाइल मामले में सुप्रीम कोर्ट के जज को मैनेज कर पाना नामुमकिन है। फिर भी मानने वालों की कमी नहीं है कि प्रचंड जब तक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर हैं, तब तक कुछ भी मुमकिन नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में जारी मुकदमे से इतर नेपाल के राजनीतिक हालात को लेकर भी गंभीर सवाल उभर आए हैं। मसलन, क्या राष्ट्रपति पद पर अपना प्रत्याशी जिताने के बाद अब संसद की सबसे बड़ी पार्टी नेपाली कांग्रेस आगे चुप बैठ जाएगी ? क्या दोगुने उत्साह से भरी नेपाली कांग्रेस को प्रचंड को ही प्रधानमंत्री बनाए रखना कबूल होगा? या फिर गंभीर मुकदमे में जा फंसे माओवादी नेता प्रचंड को पूर्व में की गई मौका परस्ती की याद दिला कर आइना दिखाया जायेगा और नेपाली कांग्रेस की ओर से तत्काल प्रचंड से छुटकारा पा लेने का उपक्रम होगा। जाहिर है कि राष्ट्रपति बनने के साथ रामचंद्र पौडेल अपने पुराने मित्र शेरबहादुर देउबा को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाकर राष्ट्रपति बनाने का अहसान उतारना पसंद करेंगे।

गौरतलब है कि नेपाल में 240 साल पुरानी राजशाही को खत्म कर 2008 में कायम हुए जनतंत्र को लेकर सर्वविदित कहावत है कि सबसे आसान काम नेपाल के प्रधानमंत्री को बदल देना है। लगभग डेढ दशक की राजनीति में आज भी नेपाल में स्थिरता आती नहीं दिख रही है। ओली, प्रचंड और नेपाली कांग्रेस के बीच नेपाल की राजनीति इस तरह फंस गयी है कि कोई भरोसे से यह नहीं कह सकता कि पूरे कार्यकाल का प्रधानमंत्री कभी बनेगा भी या नहीं?

प्रधानमंत्री प्रचंड की वर्तमान सरकार अल्पमत में है। राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की पार्टी सीपीएन (माले) ने प्रधानमंत्री प्रचंड पर धोखा देने का इलजाम लगाकर सरकार से समर्थन वापस ले रखा है। प्रचंड की पार्टी ने राष्ट्रपति चुनाव में सरकार की सहयोगी पार्टी सीपीएन (माले) के उम्मीदवार सुभाष नेमांग का समर्थन करने की बजाय मौकापरस्ती का रूख अपनाया। उन्होंने प्रतिपक्षी नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार रामचंद्र पौडेल का समर्थन करने का फैसला लिया था।

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    इस जोखिम के बाद आगे प्रचंड को प्रधानमंत्री बने रहने के लिए सदन में सबसे बड़े दल नेपाली कांग्रेस के समर्थन की आवश्यकता है। देखना है कि प्रचंड को जनयुद्ध का खलनायक मानती रही नेपाली कांग्रेस का नया रुख क्या होता है। चुनाव में कांग्रेस का राष्ट्रपति बनवाने वाले प्रधानमंत्री को वाजिब हक मिलता है या नेपाली कांग्रेस सर्वोच्च न्यायालय के रुख को भांपकर कई नेपाली कांग्रेस के नेताओं और समर्थकों की असामयिक मौत का कारण बने प्रचंड से मुक्ति पाने का रास्ता अपनाती है। प्रचंड के साथ जो हो लेकिन नेपाल के साथ तो बुरा ही होगा। इस अस्थिर राजनीतिक हालात में नेपाल की जनता का विकास बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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