NCERT Books: बच्चों की शिक्षा में विचारधाराओं वाले पूर्वाग्रह का क्या काम?
NCERT Books: इतिहास और सामाजिक विज्ञान से जुड़ी किताबें कोई आसमानी क़िताब या समाज-जीवन से नितांत निरपेक्ष एवं पृथक पाठ्य-पुस्तक तो हैं नहीं कि उनमें कोई परिवर्तन न किया जा सके।

NCERT Books: देश के 250 'शिक्षाविदों और इतिहासकारों' ने एक चिट्ठी लिखकर एनसीईआरटी की किताबों में हुए बदलाव का विरोध किया है। इनमें से ज्यादातर 'शिक्षाविद और इतिहासकार' वे ही हैं जिनके पूर्वाग्रहयुक्त विचारों से एनसीईआरटी की कुछ किताबों को मुक्त किया गया है।
अगर आप इन शिक्षाविदों और इतिहासकारों के नाम देखें तो अधिकतर नाम अपनी खेमेबाजी और वैचारिक गिरोहबंदी के लिए जाने जाते हैं। इनमें वही नाम हैं जिन्हें हम लंबे समय से शिक्षा और इतिहास में विचारधारा वाला पूर्वाग्रह परोसने के लिए जानते हैं। इरफान हबीब, रोमिला थापर, जयति घोष, मृदुला मुखर्जी, अपूर्वानंद जैसे लोग अपने वैचारिक पूर्वाग्रह के लिए जाने जाते हैं। आखिरकार विरोध में भी एक बार फिर वही लोग दिखाई दे रहे हैं।
असल में भारतीय शिक्षा व्यवस्था में शैक्षिक संस्थाओं एवं विश्वविद्यालयों के शीर्ष पदों पर निष्पक्ष, योग्य एवं अनुभवी विशेषज्ञों के स्थान पर दल एवं विचारधारा-विशेष के प्रति झुकाव एवं प्रतिबद्धता रखने वालों को अधिकाधिक वरीयता दी गई। इसका परिणाम यह हुआ कि संपूर्ण शिक्षा जगत ही वैचारिक ख़ेमेबाजी एवं पूर्वाग्रहों का अड्डा बनता चला गया। इतिहास, सामाजिक विज्ञान एवं साहित्य की पाठ्य-पुस्तकों एवं पाठ्यक्रमों में चुन-चुनकर ऐसी विषय-सामग्री संकलित की गईं, जो विद्यार्थी के मन में अपने ही प्रति हीनता की ग्रंथियाँ विकसित करती है।
इतिहास-लेखन एवं सामग्रियों के संकलन में पारंपरिक स्रोतों, प्राचीन शास्त्रों - वेदों- पुराणों- महाकाव्यों, उत्खनन से प्राप्त साक्ष्यों-सामग्रियों तथा तमाम तथ्यों की घनघोर उपेक्षा की गई। लोक साहित्य एवं लोक स्मृतियों को ताक पर रख दिया गया। तर्कशुद्ध-तटस्थ चिंतन एवं वस्तुपरक विवेचन के स्थान पर पूर्वाग्रहयुक्त धारणाओं व मनगढ़ंत मान्यताओं को इतिहास की सच्ची घटनाओं की तरह प्रस्तुत किया गया। उलटा चोर कोतवाल को डांटे की तर्ज़ पर वामपंथी एवं तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा परिवर्तन की हर पहल व प्रयास पर ही नहीं, बल्कि पदचाप पर भी हंगामा व शोर बरपाया जाता रहा।
ताजा हंगामा व शोर केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) द्वारा नवीं से बारहवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में आंशिक बदलाव किए जाने पर मचाया जा रहा है। दरअसल बोर्ड ने सत्र 2023-24 के लिए कक्षा 10 वीं, 11वीं और 12वीं के इतिहास एवं राजनीतिशास्त्र के पाठ्यक्रम से गुटनिरपेक्ष आंदोलन, शीतयुद्ध-काल, विश्व राजनीति में अमेरिकी आधिपत्य, लोकतंत्र और विविधता, लोकतंत्र की चुनौतियां, मशहूर संघर्ष और आंदोलन, संस्कृतियों का टकराव, सेंट्रल इस्लामिक लैंड्स, अफ़्रीकी-एशियाई देशों में इस्लामिक साम्राज्य की स्थापना, उदय एवं विस्तार, मुगल दरबारों का इतिहास और औद्योगिक क्रांति से जुड़े अध्यायों को हटाने का निर्णय लिया है।
इसी प्रकार कक्षा 10 के पाठ्यक्रम से ''कृषि पर वैश्वीकरण के प्रभाव'' नामक सामग्री भी हटा ली गई है। अभी तक यह 'खाद्य सुरक्षा' पाठ के अंतर्गत पढ़ाई जा रही थी। इसके साथ ही 'धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति सांप्रदायिकता, धर्मनिरपेक्ष राज्य' से फैज अहमद फैज की उर्दू में लिखी दो नज़्में भी हटाई गईं हैं। गणित एवं विज्ञान के पाठ्यक्रम में से भी कुछ अध्याय हटाए गए हैं और कुछ जोड़े गए हैं।
सनद रहे कि राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की संस्तुतियों पर पाठ्यक्रम को अधिक युक्तिसंगत, समाजोपयोगी एवं वर्तमान की अपेक्षाओं एवं आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने के लिए ये परिवर्तन गत वर्ष ही प्रारंभ कर दिए गए थे। पाठ्यक्रम को रोचक, रचनात्मक और ज्ञानवर्द्धक, बनाए रखने के उद्देश्य से ऐसे परिवर्तन पूर्व में भी किए जाते रहे हैं। फिर इतिहास और सामाजिक विज्ञान से जुड़ी किताबें कोई आसमानी क़िताब या समाज-जीवन से नितांत निरपेक्ष एवं पृथक पाठ्य-पुस्तक तो हैं नहीं कि उनमें कोई परिवर्तन न किया जा सके। बल्कि अच्छा तो यही होगा कि विज्ञान एवं तकनीकी की सहायता से अब जो बातें छूट गयीं तक उन पर गहन शोध एवं विशद अध्ययन कर नई-नई जानकारियों को सामने लाया जाय और उन्हें पाठ्यक्रम एवं पाठ्यपुस्तकों का हिस्सा बनाया जाय।
उल्लेखनीय है कि 11वीं के इतिहास के पाठ्यक्रम में घुमंतू या खानाबदोश साम्राज्य (नोमेडिक एंपायर) 12वीं में 'यात्रियों की नजरों से' तथा 'किसान, जमींदार और राज्य' शीर्षक को पिछले वर्ष जोड़ा गया था। वहीं राजनीतिशास्त्र में 'समकालीन विश्व में सुरक्षा' नामक अध्याय के अंतर्गत 'सुरक्षा : अर्थ और प्रकार, आतंकवाद', 'पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन' अध्याय के अंतर्गत 'पर्यावरण आंदोलन, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण' तथा 'क्षेत्रीय आकांक्षाएं' के अंतर्गत 'क्षेत्रीय दलों का उदय, पंजाब संकट, कश्मीर मुद्दा, स्वायत्तता के लिए आंदोलन' जैसे शीर्षकों (टॉपिक्स) को भी सम्मिलित किया गया था।
क्या इसमें भी कोई दो राय हो सकती है कि ये मुद्दे वर्तमान समय, परिवेश तथा देश-दुनिया के हितों व सरोकारों से बहुत गहरे जुड़े हैं? सजग एवं प्रबुद्ध वर्ग ही नहीं, अपितु सामान्य समझ रखने वाला साधारण व्यक्ति भी सरलता से यह आंकलन और विश्लेषण कर सकते हैं कि इन विषयों का अध्ययन शांति, सहयोग और सह-अस्तित्व पर आधारित जीवन-मूल्यों को विकसित करने में सहायक है। सच तो यह है कि पाठ्यक्रम में अपेक्षित सुधार एवं परिवर्तन की मांग दशकों से की जाती रही है। शिक्षा संबंधी सभी आयोगों एवं समितियों द्वारा इसकी संस्तुतियाँ की जाती रही हैं तथा अधिकांश शिक्षाविद भी इसके प्रबल पैरोकार रहे हैं।
सत्य यही है कि इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में व्यापक परिवर्तन समय की मांग है। वस्तुतः हमारा पूरा इतिहास-लेखन दिल्ली-केंद्रित है। वह आक्रांताओं के आक्रमणों, विजय-अभियानों, वंशावलियों तक सीमित है। मध्यकालीन एवं आधुनिक भारत का पूरा-का-पूरा इतिहास दिल्ली सल्तनत, मुगल वंश, ईस्ट इंडिया कंपनी, अंग्रेज लॉर्डों व सेनानायकों एवं स्वतंत्रता-आंदोलन के नाम पर कतिपय नेताओं के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गया है।
देश केवल राजधानी और उस पर आरूढ़ सुलतानों एवं चंद चेहरों तक सीमित नहीं होता। उसमें भूमि, नदी, पर्वत, वन, उपवन और उन सबसे अधिक सर्व साधारण जन सम्मिलित होते हैं। परंतु जन-गण-मन की बात तो दूर, हमारी पाठ्य-पुस्तकों में मौर्य, गुप्त एवं मराठा साम्राज्य जैसे कतिपय अपवादों को छोड़कर शेष सभी भारतीय सम्राटों और उनके राज्यों को भी किनारे कर दिया गया है। चोल, चालुक्य, पाल, प्रतिहार, पल्लव, परमार, मैत्रक, राष्ट्रकूट, वाकाटक, कार्कोट, कलिंग, काकतीय, सातवाहन, विजयनगर, मैसूर के ओडेयर, असम के अहोम, नागा, सिख आदि तमाम प्रभावशाली राज्यों व राजवंशों की चर्चा लगभग नगण्य है।
यही नहीं, भारतीय राजाओं की गणना में चंद्रगुप्त, अशोक, विक्रमादित्य, हर्षवर्धन, महाराणा सांगा, महाराणा प्रताप, शिवाजी, बाजीराव पेशवा जैसे चंद नामों को छोड़कर शायद ही कुछ अन्य नाम हमें सहसा याद आते हों। इन सबको पाठ्यक्रम में सम्मिलित किए बिना न तो समग्र एवं संपूर्ण राष्ट्रबोध ही विकसित किया जा सकता है और न अपनी विविधतापूर्ण समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को ही समझा जा सकता है।
यह भी पढ़ें: NCERT History Books: बदल गया इतिहास को देखने का दृष्टिकोण
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
-
मौत से हुआ सामना? दुबई से हैदराबाद लौटीं सानिया मिर्जा, आपबीती सुनाते हुए बयां किया दर्द -
'बच्चे के लिए किसी के साथ भी सो लूंगी', वड़ा पाव गर्ल Chandrika Dixit का शॉकिंग बयान, लोग बोले- ये बाजार में -
Parliament session: 'मोहब्बत हमसे, शादी मोदी से', राज्यसभा में बोले खड़गे, वायरल हुआ PM का रिएक्शन -
LPG Cylinder: कमर्शियल गैस सिलेंडर पर सरकार का चौंकाने वाला फैसला, आज से बदल गए नियम! -
Donald Trump Iran War: टूट के कगार पर NATO? ट्रंप ने सरेआम यूरोप को कहा 'धोखेबाज', आधी रात को लिया बड़ा फैसला -
Gold Rate Today: थमी सोने की रफ्तार, कीमतों में जबरदस्त गिरावट! खरीददारी से पहले चेक कर लें लेटेस्ट रेट -
Silver Price Today: चांदी की कीमतें क्रैश! मार्च महीने में अब तक की सबसे बड़ी गिरावट, कितना हुआ सिल्वर का रेट? -
Gold Rate Today: अचानक पलटा ट्रेंड! सोने में जोरदार उछाल, दिल्ली से पटना तक आज 22K-24K गोल्ड का ताजा भाव -
LPG सिलेंडर के लिए e-KYC क्या सभी कस्टमर्स के लिए अनिवार्य है? पेट्रोलियम मंत्रालय का आया बड़ा बयान -
Saudi Arabia Eid Ul Fitr 2026 : सऊदी अरब में 20 मार्च को मनाई जाएगी ईद, भारत में कब दिखेगा चांद? -
Iran Vs America: ईरान के बाद अब चीन पर कहर बनकर टूटेंगे ट्रंप! अमेरिकी रिपोर्ट के खुलासे से हड़कंप -
Silver Price Today: चांदी एक झटके में 4000 हुई महंगी,दिल्ली में 9000 टूटी, 10 ग्राम से 1 किलो तक का ताजा भाव












Click it and Unblock the Notifications