NCERT History Books: बदल गया इतिहास को देखने का दृष्टिकोण
नयी शिक्षा नीति के तहत एनसीईआरटी ने भी अपने पाठ्यक्रम में बदलाव किया है। इसमें इतिहास में बदलाव को लेकर जो अफवाह फैलायी जा रही है वह पूरी तरह से निराधार है। इतिहास नहीं बदला, इतिहास को देखने का दृष्टिकोण बदला गया है।

NCERT History Books: इतिहास की बात आते ही सबसे पहला सवाल यह होता है कि इतिहास को देखने का हमारा दृष्टिकोण क्या है? भारत की अपनी इतिहास दृष्टि राजा का इतिहास देखने की नहीं रही है। हम इतिहास को समाज के दृष्टिकोण से देखते हैं। हमारे लिए इतिहास वह पुराण है जिसके केन्द्र में समाज और ऋषि रहे हैं। राजा उसकी परिधि का नायक हुआ करता था। हमारी इतिहास दृष्टि में राजा का महत्व राजा होने के कारण नहीं बल्कि प्रजा के लिए किये जाने वाले कार्यों के कारण रहा है।
लेकिन दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद हम अपने ही दृष्टिकोण से अपना इतिहास नहीं पढ पाये कभी। जिन लोगों ने इतिहास लेखन किया या करवाया उन्होंने राजा का दृष्टिकोण केन्द्र में रखा। इसलिए हमारे लिए भारत का इतिहास आक्रमणकारियों का इतिहास होकर रह जाता है। हमने इतिहास को यूरोप के उस दृष्टिकोण से देखना शुरु कर दिया जो विजेता राजा की कथा सुनाता है। उसके शासन का वर्णन करता है। उसकी नीतियों का बखान करता है। जो कुछ इतिहास होता है वह शासक या राजा के इर्द गिर्द ही गढ़ा जाता है।
स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि हमारी इतिहास दृष्टि को भारतीय दृष्टिकोण दिया गया है। यह प्रयास हुआ है एनसीईआरटी की किताबों में। कक्षा 11 और 12 के इतिहास की पाठ्यपुस्तकों को नये सिरे से लिखा गया है। इसमें भारत की वही दृष्टि दिखती है जो राजा की बजाय प्रजा और समाज को केन्द्र में रखती है। इसके कारण यह शिकायत हो सकती है कि एनसीईआरटी ने इतिहास की पाठ्यपुस्तकों से तुर्क या मुगल इतिहास मिटा दिया लेकिन ऐसा नहीं है। जब हमने अपनी दृष्टि से इतिहास को देखा तो ये स्वत: ही सीमित हो गये। इसलिए पाठ्यपुस्तकों से भी बाहर नहीं हुए बल्कि जितना जरूरी हैं उतने ही रह गये।
एनसीईआरटी की कक्षा 11 और 12 की नयी लागू की गयी इतिहास की पाठ्य पुस्तकों को अगर आप देखेंगे तो पायेंगे कि इतिहास नहीं बदला गया है बल्कि इतिहास को देखने का दृ्ष्टिकोण बदल दिया गया है। जैसे, कक्षा 11 के इतिहास की पाठ्य पुस्तक का नाम है "विश्व इतिहास के कुछ विषय"। इसमें 6 अध्याय हैं। पहला अध्याय, प्रारंभिक समाजों के बारे में है। यानी धरती पर मनुष्य का विकास कैसे हुआ। उसने किस तरह से सभ्यताओं का विकास शुरु किया। संक्षेप में इसमें छह लाख साल का वर्णन मिलता है जिसमें 1 लाख 95 हजार साल पहले से होमोसेपियन्स के प्रमाण से लेकर पहली ईस्वी तक का वर्णन है।
इसी कक्षा के दूसरे और तीसरे अध्याय में यायावर समाजों और साम्राज्यों का वर्णन है। तीसरे अध्याय में उठाये गये एक महत्वपूर्ण सवाल से आप समझ सकते हैं कि किस तरह से भारत में इतिहास लेखन की दृष्टि को भारतीय दृष्टिकोण प्रदान किया गया है। तीसरे अध्याय में छात्रों से एक सवाल पूछा गया है कि "यदि इतिहास नगरों में रहनेवाले साहित्यकारों के लिखित विवरणों पर निर्भर करता है तो यायावर समाज के बारे में हमेशा प्रतिकूल विचार ही रखे जाएंगे। क्या आप इस कथन से सहमत हैं?" स्वाभाविक है यह सवाल छात्र के मन में यह विचार तो अवश्य पैदा करेगा कि इतिहास लेखन का कौन सा दृष्टिकोण सही माना जाए?
अब इसको यह कहना कि इतिहास की किताबों से मुगलों को मिटा दिया गया, गलत होगा। 11वीं कक्षा की ही इतिहास की इसी पुस्तक में मंगोलों का पूरा विवरण है लेकिन उसे 'विस्तारवादी साम्राज्य' के तहत रखा गया है। अब छात्र को यह निर्णय स्वयं करना होगा कि विस्तारवाद क्या एक सकारात्मक सिद्धांत है या नकारात्मक। जैसी उसकी समझ होगी, वैसा ही उसका इतिहास बोध निर्मित हो जाएगा।
कक्षा 12 के इतिहास की पाठ्य पुस्तक में थोड़ा विस्तार देने का प्रयास किया गया है। कक्षा 12 के लिए इतिहास विषय की तीन पुस्तकें हैं जिनका नाम है "भारतीय इतिहास के कुछ विषय-1,2 और 3। इन्हें 12 अध्यायों में बांटा गया है। इसके पहले हिस्से में विश्व इतिहास का संक्षिप्त परिचय है। कक्षा 11 की तरह ही इस हिस्से में समाज और साम्राज्य का वर्णन है। मेसोपोटामिया तथा रोमन साम्राज्य का विश्लेषण है। हां, इसमें उस काल में इन साम्राज्यों के शोषण का भी उन्हीं के इतिहासकारों के हवाले से वर्णन किया गया है। डॉक्टर गैलेन के हवाले से बताया गया है कि रोमन साम्राज्य में शहर के निवासी किस तरह से ग्रामीण लोगों का शोषण करते थे जिसके कारण ग्रामीण लोगों को कई बार पत्ते और छाल खाकर गुजारा करना पड़ता था। रोमन साम्राज्य में दास प्रथा और श्रमिकों के साथ व्यवहार का भी उल्लेख इसमें मिलता है।
कक्षा 12 के लिए ही इतिहास विषय की दूसरी पुस्तक में विदेशी यात्रियों का वर्णन मिलता है। अपनी यात्राओं के दौरान उन्होंने भारत को कैसे देखा यह बताया गया है। दसवीं से सोलहवीं शताब्दी के बीच इसमें अल बरुनी, मार्को पोलो, इब्न बतूता से लेकर फ्रांस्वा बर्नियर के यात्रा वृत्तांतों का वर्णन है। इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय में 'भारत में भक्ति परंपरा और सूफी मत' के प्रचार का उल्लेख है। तीसरे अध्याय में विजयनगर साम्राज्य का वर्णन है। चौथे अध्याय में कृषि, जमींदार और राज्य का वर्णन है। इस चैप्टर में राज्य से आशय मुगल काल से है और मुगलकाल की नीतियों का वर्णन और सामाजिक परिस्थिति का वर्णन इस अध्याय में दिखता है। इस अध्याय में सोलहवीं, सत्रहवीं सदी के हिन्दू तथा मुसलमानों की 'नीच जातियों' का वर्णन है जिनकी दशा "आज के दलितों" जितनी ही दयनीय बतायी गयी है।
तीसरी पुस्तक "भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग 3 में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रवेश के साथ ही ब्रिटिश उपनिवेश का वर्णन है। इसके दूसरे अध्याय में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ विद्रोह, तीसरे अध्याय में महात्मा गांधी का उदय और राष्ट्रीय आंदोलन तथा चौथे अध्याय में संविधान निर्माण का विवरण है। इस तरह बारहवीं कक्षा के लिए तीन पुस्तकों तथा कुल 12 अध्यायों में बांटे गये इतिहास को इस तरह से संयोजित किया गया है कि विद्यार्थी को दो सालों में विश्व इतिहास के साथ ही भारतीय इतिहास का एक आंकलन हो जाए।
इसे जानने के क्रम में जहां जितना जरुरी है वहां मुगल शासकों का ही नहीं बल्कि सल्तनत शासकों का भी उल्लेख मिलता है। लेकिन लेखन की दृष्टि किसी राजा या सुल्तान पर केन्द्रित न करके समाज पर केन्द्रित की गयी है। शायद यही कारण है कि मुगल शासकों से जुड़े अध्याय इन पुस्तकों से समाप्त हो गये। हालांकि जहां जरूरी है वहां उनका उल्लेख है।
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इसलिए किसी को भी यह भ्रम नहीं फैलाना चाहिए कि इतिहास की किताबों से मुगल शासकों को बाहर निकाल दिया गया। इतिहास से कुछ भी निकाला या जोड़ा नहीं जा सकता। जो हो सकता है वो यह कि हम इतिहास के उस हिस्से को कहां खड़े होकर देख रहे हैं। अगर भारत पर बाबर के हमले को समरकंद में खड़े होकर देखेंगे तो अपने ही इतिहास के साथ न्याय कैसे कर पायेंगे?
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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