Significance of Navratri: नवरात्रि का भौतिक एवं आध्यात्मिक महत्व
भारतीय ऋषियों ने सृष्टि के जटिल सिद्धांतों को सरल नियमावली में ढालकर लोक समाज को सौंप दिया है। लोक समाज धर्म मानकर उन नियमों का पालन करता है और भौतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति करता है। नवरात्रि उसमें सबसे महत्वपूर्ण है।

Significance of Navratri: 'दुर्गा सप्तसती' सबसे मूल्यवान धर्मग्रंथों में से एक है जो निश्चित रूप से नवरात्रि उत्सव के दौरान भक्तों द्वारा पढ़ा जाने वाला सबसे पवित्र ग्रंथ है। एक साहित्यिक रचना के रूप में देखें तो यह 'मार्कंडेय पुराण' का अंश है। जिसमें देवी महात्म्य सम्मिलित है। इसमें अलौकिक दिव्य स्त्री शक्ति अर्थात् देवी के स्तवन के रूप में रचित मंत्र और श्लोक हैं।
नवरात्रि के नौ दिन एक संक्रमणकालीन अवधि होते हैं, जो ऋतुओं के चक्रीय क्रम में परिवर्तन को निर्धारित करते हैं। सभी भारतीय पंचांगों के अनुसार नवरात्रि हर तीन महीने के बाद आती है। इसलिए, सभी भारतीय कैलेंडर में चार नवरात्रों का उल्लेख किया गया है। प्रकट रूप में धूमधाम से वर्ष में केवल दो नवरात्र मनाए जाते हैं और बाकी दो को गुप्त नवरात्रि के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
नवरात्रि से संबंधित लोकप्रिय धार्मिक परंपरा व्यक्तिगत जीवन में पवित्रता और शुद्धता के उच्च स्तर को बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित करती है। इसमें आहार का अभ्यास प्रमुखता से सम्मिलित है। इन नौ दिनों में ऐसे खाद्य पदार्थ ही लिए जाते हैं जिन्हें कृषि कार्य द्वारा अनाज के रूप में नहीं उगाया जाता है, बल्कि इन्हें स्वयं प्रकृति (आद्या शक्ति) द्वारा उत्पादित किया जाता है।
नवरात्रि दिन में दो बार देवी की पूजा के विशिष्ट विधि विधान के साथ मनाई जाती है। इसमें वायु को शुद्ध करने के लिए उपयोगी सामग्री कपूर, देवदार और चंदन की लकड़ी का अनुष्ठान होता है। तदनुसार, शरीर को भी दो बार शुद्ध किया जाना चाहिए और हर बार अच्छी तरह से स्वच्छ किया हुआ वस्त्र ही पहना जाना चाहिए। हमने पिछले दिनों में बार - बार हुए वायरस के हमलों के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग का महत्व समझा। यह सोशल डिस्टेंसिंग नवरात्र अनुष्ठान का मौलिक धार्मिक सिद्धांत है, जिसका नवरात्रि के समय नियम पूर्वक पालन किया जाता है।
नवरात्रि विभिन्न अनुष्ठानों का काल भी है जिसमें कई योग अभ्यासों की भी व्यवस्था की गई है। जिसमें 'कुंभक और रेचक' जैसी प्राणायाम श्वसन प्रणाली भी अनुष्ठान का हिस्सा हैं। हमारी प्राण वायु को शुद्ध करने के लिए 'कुंभक और रेचक' की विधि वाली 'ध्यान एकाग्रता' की यह एक प्रभावी विधि है। इसके अलावा, पूजा के समय पवित्र शंख को फूंक कर बजाया जाता है। जो व्यावहारिक रूप से फेफड़ों के लिए एक अच्छा व्यायाम माना जाता है।
वास्तव में, दुर्गा 'दुर्ग की देवी' हैं, दुर्ग का अर्थ है 'किला'। यहां, हमें यह जानना चाहिए कि मानव शरीर स्वयं एक दुर्ग की भांति दृढ़ संरचना है। अर्थात् दुर्गा की पूजा हमारे शरीर और आत्मा की ही पूजा है। दुर्गा सप्तशती के तीन मूल अध्याय जिन्हें कीलक, कवच और अर्गला कहा जाता है। इसमें शरीर, मन और आत्मा की रक्षा के लिए प्रार्थनाएं हैं।
पिछले दिनों कोरोना वायरस से महामारी की त्रासदी को हमने बहुत निकटता से देखा है। उसके बाद से आज भी विभिन्न स्वरूपों में विषाणु जनित बीमारियां हमारा पीछा कर रही हैं। दुर्गा सप्तशती में पौराणिक वायरोलॉजी का सिद्धांत है। इसे पूर्णतः वैज्ञानिक दृष्टिकोण से व्याख्यायित किया जा सकता है। इस तथ्य को हम सब समझते हैं कि मौसम में बदलाव के दौरान वायरस का संक्रमण बढ़ना आम बात है।
दुर्गा सप्तशती में वर्णित "चंड और मुंड" ऐसे ही दो पात्र हैं, जो मानव जाति के विनाश के लिए जिम्मेदार राक्षसों के रूप में वर्णित हैं। आधुनिक साइंस की भाषा में चंड का अर्थ - हेलिकल (Helical) है। जिसमें सर्पिल पैर होते हैं। और मुण्ड के लिए शब्द आईकोसैहेड्रॉन (icosahedron) है, जो आकार में गोलाकार होता है और सिर यानी मुंड की तरह दिखाई देता है।
चंड और मुंड के व्युत्पत्ति संबंधी अर्थ को इस प्रकार समझा जा सकता है - 'च' का अर्थ है चलायमान और मुंड का अर्थ 'खोपड़ी की तरह गोल आकार का' है। अर्थ भले ही पौराणिक और धार्मिक ही क्यों न हो, लेकिन जब भी वायरस के संक्रमण का खतरा बढ़ता है, ऐसे में नवरात्र के विशेष नियम, अनुष्ठान और योगिक क्रियाएं इससे निपटने में सहयोगी विधियां होती हैं। इस दृष्टिकोण से नवरात्र का भारतीय धार्मिक मूल्य, विषाणु जनित रोगों से सुरक्षा देने और उनका शमन करने में सहयोगी है। यही स्वास्थ्य की भारतीय अवधारणा का साधना मूलक मार्ग है।
नवरात्र में देवी उपासना में दुर्गा सप्तशती में उद्धृत बीज मंत्रो के जप का विशिष्ट महत्व है। लाखों मन्त्र इन्हीं बीज मंत्र से ऊर्जा एवं प्राण प्राप्त करते हैं। बीज मंत्रों का गूढ़ार्थ गहन साधना का गुप्त विषय है, ऐसे में जनसामान्य को कम से कम यह जानकारी तो होनी ही चाहिए कि व्याकरण की दृष्टि से इस महान बीज मंत्र का विन्यास क्या है।
वियद इकार संयुक्तं वीतिहोत्र समंवितं ।
अर्धेन्दु लसितं देव्या बीजं सर्वार्थ साधकं॥
यह मंत्र पञ्चतत्व अर्थात् पञ्च महाभूत का प्रतिनिधित्व करते हैं। उपरोक्त मंत्र के विषय में विचार करें तो यहां वियद इकार सयुंक्त - वियद अर्थात आकाश। आकाश तत्व का बीज मंत्र है "ह"। सनातन धर्म की जैन शाखा के दर्शन में उद्धृत 'दिगंबर' भी दिशा व अम्बर की ही बात है। यहां एक मत यह भी है कि दिशा ही अम्बर यानी वस्त्र हो गए। किन्तु दूसरा अर्थ शाब्दिक यह है कि यह सर्वव्यापक अम्बर यानी आकाश तत्व को भी व्याख्यायित करता है। यहां "ह" बीज से ईकार अर्थात ई की मात्रा संयुक्त हुई। ईकार का अर्थ मातृ शक्ति अर्थात पालन करने की शक्ति से है। जब आकाश तत्व के बीज अक्षर से ई-कार सयुंक्त हुआ जिससे शब्द हो गया "ही"।
मन्त्र में आगे लिखा है कि "वीतिहोत्र समंवितं"। वीतिहोत्र अर्थात अग्नि, अग्नि का बीज मंत्र है "र"। वियद और ईकार युक्त शब्द में अग्नि के बीज मंत्र का समन्वय हुआ और शब्द हो गया "ह्री"। इसके आगे मन्त्र कहता है "अर्धेन्दु लसितं"। अर्ध अर्थात आधा और इंदु अर्थात चन्द्रमा। इस तरह अर्धेन्दु का मतलब हुआ अर्ध चन्द्र बिंदु। लसितं अर्थात चमकना या प्रकाशित होना। इस तरह वियद, ई कार और वीतिहोत्र युक्त शब्द "ह्री" पर अर्ध चन्द्र बिंदु स्थापित हुआ। चंद्र बिंदु स्वयं देवी रूप है।
सुधा अक्षरे त्वमेव त्रिमात्रात्मिका स्थिरता।
अर्ध मात्रात्मिका स्थिता यानुचार्या विशेषतः॥
अर्थात सुधा अक्षर (ॐ) की तीनों मात्रा (अकार, उ कार, मकार ) एवं अर्धमात्रा (चन्द्रबिन्दु ) जिसका कोई स्वतंत्र उच्चारण नहीं है वह भी, हे देवी साक्षात् आपका ही स्वरूप है।
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यहां पौराणिक आख्यानों के माध्यम से लोक को सृष्टि विज्ञान के सूक्ष्म रहस्यों के व्यवहारिक पक्ष से जोड़ने का कार्य किया गया है। अब आधुनिक विज्ञान भी क्वांटम फिजिक्स की धारा से इस पक्ष को समझने की दिशा में प्रगति कर रहा है। भारतीय मनीषा ने जिसे पहले ही अध्यात्म विज्ञान के स्तर पर जाकर समझा और कुछ नियम बनाकर लोक को सौंप दिया है। यही नवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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