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NGT on ponds: तालाब बचाने के लिए ऐतिहासिक फैसला

तालाब की अपनी पारिस्थितिकी होती है। उसमें विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु निवास करते हैं। विभिन्न प्रकार की वनस्पतियां पनपती हैं। यही नहीं, तालाब से भूगर्भ जलभंडार का पुनर्भरण होता है और आसपास के इलाके में भी नमी बनी रहती है।
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National Green Tribunal decision on ponds

NGT on ponds: तालाबों की प्राकृतिक संरचना के संरक्षण हेतु नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया है। दरभंगा के एलएनएम यूनिवर्सिटी परिसर में स्थित तालाब के कछार पर लगाई गयीं ईंटों को हटाकर वहां मिट्टी का ढलान बनाने के लिए कहा है।

17 नवंबर को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा दिया गया यह फैसला देखने में भले ही बहुत छोटा लगता हो लेकिन तालाब के जरिए जल संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक फैसला है। दरअसल, बिहार के दरभंगा में एलएनएम यूनिवर्सिटी के परिसर में एक तालाब है। इसमें सुन्दरीकरण के नाम पर ईंटे लगा दी गई हैं और चारों तरफ टहलने के लिए कंक्रीट का फुटपाथ बना दिया गया है। ट्रिब्यूनल ने कहा है कि ईंटे हटाकर तालाब के किनारे मिट्टी के तटबंध बनाए जाएं, घास व दूसरे पौधे लगाए जाएं और आसपास के इलाके को इको-पार्क की तरह विकसित किया जाए।

असल में ट्रिब्यूनल ने यह आदेश दूसरी बार दिया है। पहली बार फरवरी 2022 में जब ट्रिब्यूनल ने आदेश दिया था तब उसके फैसले के खिलाफ विश्वविद्यालय प्रशासन सुप्रीम कोर्ट चला गया था। सुप्रीम कोर्ट ने ग्रीन ट्रिब्यूनल के फैसले को बहाल रखा, केवल अनुपालन के लिए प्रशासन को थोड़ा समय दे दिया। वह समय सीमा भी बीत गई।

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड (वर्तमान चीफ जस्टिस) और जस्टिस पीएस नरसिंहा की खंडपीठ में हुई थी। विश्वविद्यालय प्रशासन फिर भी निष्क्रिय बना रहा। अदालत की अवमानना की नोटिस दी गई और एक बार फिर मामला ग्रीन ट्रिब्यूनल में गया और ट्रिब्यूनल की कलकत्ता पीठ ने पिछले आदेश (23 फरवरी 2022) को तीन सप्ताह के भीतर अनुपालन की ताकीद करते हुए फिर 17 नवंबर को नया आदेश दिया है। देखना है कि राज्य सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन इस बार क्या करता है।

तालाबों के सुन्दरीकरण के नाम पर इस तरह के निर्माण बिहार की अन्य जगहों पर बने तालाबों में भी हुए हैं और हो रहे हैं। राज्य सरकार योजना बनाकर राज्य के एक सौ तालाबों का सुन्दरीकरण कर रही है। उन तालाबों को अमृत सरोवर नाम दिया गया है। हालांकि पानी के आने और निकलने का रास्ता नहीं होने से पर्यावरणविद उन्हें 'विष-सरोवर' कह रहे हैं। सभी तालाबों के कछार (ढलान) पर ईंटे लगा दी गई हैं। चारों तरफ फुटपाथ भी बन रहे हैं।

ग्रीन ट्रिब्यूनल के इस फैसले से इस तरह के सभी निर्माण रुक जाने चाहिएं, परन्तु ट्रिब्यूनल के फैसले का कोई प्रभाव पड़ता नहीं दिख रहा। राज्य सरकार तालाब सुन्दरीकरण के नाम पर हर प्रखंड में इस तरह कम से कम एक तालाब बनाने की योजना पर काम कर रही है।

'तालाबों के शहर' दरभंगा में यह तालाब दरभंगा महाराज के आवासीय परिसर में है जिसमें अब एलएनएम यूनिवर्सिटी का दफ्तर है। इस परिसर में दस तालाब हैं जिनमें यह तालाब सबसे बड़ा करीब ढाई एकड़ का है। यह दूसरे तालाबों से जुड़ा रहा है। हालांकि करीब बीस साल पहले गर्ल्स हॉस्टल बनने में दूसरे तालाबों से इसका संपर्क भंग हो गया। फिर भी तालाब में अधिक पानी आने पर उसे निकालने के लिए ह्यूम पाइप लगाकर व्यवस्था की गई है। यह तालाब यूरोपीयन गेस्ट हाउस के सामने है जिसे अब गांधी सदन कहा जाता है।

तालाब बचाओ अभियान के संयोजक नारायण चौधरी कहते हैं कि तालाब की अपनी पारिस्थितिकी होती है। उसमें विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु निवास करते हैं। विभिन्न प्रकार की वनस्पतियां पनपती हैं। यही नहीं, तालाब से भूगर्भ जलभंडार का पुनर्भरण होता है और आसपास के इलाके में भी नमी बनी रहती है। लेकिन तालाब के तटवर्ती ढलान जिसे कछार कहा जाता है, ईंट या सीमेंट कंक्रीट से पक्का बना देने से उनका बुनियादी चरित्र बदल जाता है। तालाब स्वीमिंग पूल में बदल जाता है। उसके जीव-जंतु व वनस्पति नष्ट होते ही हैं, आसपास की मिट्टी की नमी भी बरकरार नहीं रह पाती।

नारायण चौधरी करीब दस साल पहले तालाब बचाने के काम में लगे। उन्होंने दरभंगा शहर में चापाकलों के सूखते जाने को देखकर अध्ययन करना शुरु किया तो पता चला कि इसका संबंध तालाबों की संख्या घटने से है। तालाबों के नहीं होने से बरसात में भूगर्भ जलभंडार का पुनर्भरण नहीं हो पा रहा है। तभी से वे तालाब बचाने के लिए पर्चा, पोस्टर, बैठक, गोष्ठी, धरना आदि आयोजित करने लगे। इसी बीच विश्वविद्यालय परिसर में तालाब को सुंदर बनाने के नाम पर हो रहे नासमझी भरे निर्माण की जानकारी मिली और उन्होंने मामले को ग्रीन ट्रिब्यूनल में उठाया।

बिहार के मिथिलांचल में तालाबों का सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व रहा है। तालाबों पर ढेर सारे लोगों की आजीविका निर्भर रही है। मछली पकड़ने वाले मछुआरों के अलावा मखाना, सिंघाडा की खेती करने वाले किसान भी इन पर निर्भर होते हैं। नहाने-धोने के अलावा सिंचाई में भी तालाबों की उपयोगिता रहती है। शादी-विवाह के अलावा विभिन्न पूजा-पाठ में इसकी भूमिका रहती है।

लेकिन दरभंगा समेत सभी शहरों में तालाबों को भरकर घर बना लेने की कोशिशें पिछले दशकों में लगातार होने लगी है। पहले तालाबों में कूड़ा-कचरा डालकर भरने की कोशिश होती है। फिर तालाब भरने से निकली जमीन को भूमि-माफिया बेच डालते है और उस जमीन पर मकान बन जाते हैं। इससे निपटने के बजाय सरकारी व्यवस्था तालाब को ईंट-गारे से पाटकर सुंदर बनाने की बेवकूफी भरी कवायद में लगी हुई है।

सुन्दरीकरण के नाम पर ऐसी मूर्खता सिर्फ बिहार में ही हो रही है, ऐसा नहीं है। इस समय हिन्दी पट्टी के हर राज्य के लिए तालाब महत्वपूर्ण सरकारी कार्यक्रम का हिस्सा हो गये हैं। मनरेगा के तहत पहले से तालाब बनाये जा रहे हैं। इसके अलावा तालाबों का सुन्दरीकरण भी किया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी हर जिले में मनरेगा के तहत 75 नये तालाब बनाने का आह्वान किया है।

लेकिन समस्या ये है कि मनरेगा के तहत बनने वाले अधिकांश तालाब बेकार पड़े हैं। आंकड़ों के अनुसार 2014-20 के बीच केवल इस काम पर ही लगभग चार लाख करोड़ रुपये खर्च हुए हैं, लेकिन नतीजे बहुत संतोषजनक नहीं मिले। इसका कारण वही है जैसा दरभंगा के एलएनएम परिसर स्थित तालाब से जुड़ा है। तालाब को एक नकली जलाशय की तरह बनाया जाता है, जबकि तालाब एक जलतंत्र हैं। वह पानी को अपने में समेटता है और पूरे पर्यावरण को पोषित करता है।

उम्मीद है नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के फैसले के बाद देशभर की सरकारी मशीनरी को तालाब का महत्व समझ में आयेगा, जिसे नेता और अधिकारी लगभग भूल चुके हैं।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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National Green Tribunal decision on ponds
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