Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

‘लखपति नोटा’ की आहट से भाजपा में घबराहट

Indore Seat NOTA: पिछले 35 वर्षों से भाजपा की सबसे मजबूत मानी जाने वाली इंदौर लोकसभा सीट पर कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी अक्षय कांति बम ने नामांकन वापसी के दिन अंतिम क्षणों में नामांकन वापस लेकर भगवा दुपट्टा ओढ़ लिया। ऐसा होने के कारण कांग्रेस के साथ ही भाजपा की अंदरूनी राजनीति का स्याह पक्ष भी जनता के समक्ष आ गया।

पूर्व लोकसभा अध्यक्ष और 8 बार इंदौर से सांसद रहीं सुमित्रा महाजन 'ताई' ने अक्षय बम के पूरे प्रकरण पर मात्र इतना ही कहा कि ऐसा करने की आवश्यकता ही नहीं थी। इससे जनता के सामने अच्छा संदेश नहीं गया है।

MP lok sabha chunav Indore Seat NOTA

फिर ताई ही क्यों, भाजपा के पुराने कायकर्ताओं से लेकर संघ के जमीनी स्वयंसेवकों में भी उक्त कृत्य की पीड़ा है। यह, तो हुई राजनीति से जुड़े लोगों की बात किंतु सबसे बड़ा सवाल है कि क्या अब जनता 13 मई को बढ़-चढ़ कर मतदान करने निकलेगी? क्या बिना राष्ट्रीय पार्टी के प्रत्याशी के आम जनता के बीच चुनाव नीरस नहीं हो गया?

इंदौर के चौराहों पर तो यही आशंका व्यक्त की जा रही है और हर चर्चा या तो चुनाव के बहिष्कार पर होती है अथवा नोटा के अधिकाधिक प्रयोग की। कांग्रेस ने भी अपना समर्थन 'नोटा' को देकर मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा की है। अब सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस की नोटा की अपील संविधान-सम्मत अथवा लोकतंत्र के लिए सही है? क्या इससे पहले किसी अन्य राष्ट्रीय दल ने नोटा के विकल्प को चुनने के लिए मतदाताओं को प्रेरित किया था?

भाजपा ने नीलगिरी में किया था नोटा के लिए प्रोत्साहित

2013 में दिल्ली, मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हुए विधानसभा चुनावों में पहली बार नोटा का इस्तेमाल किया गया। नोटा अर्थात 'नन ऑफ द एबव' (इनमें से कोई नहीं) का विकल्प ईवीएम मशीन पर इसलिए लाया गया ताकि जनता यदि किसी भी प्रत्याशी को वोट नहीं देना चाहती, तो वह मतदान करने से पीछे न हटते हुए नोटा पर बटन दबाकर अपना विरोध दर्ज करवा सकती है।

पहली बार लगभग 15 लाख लोगों ने नोटा के विकल्प का प्रयोग किया जो कुल मतदान का 1.5 प्रतिशत था। वर्ष 2014 में हुए आम चुनाव में 60 लाख से अधिक मतदाताओं ने नोटा का विकल्प चुना था। यहां तक कि सीपीआई और जदयू जैसे राजनीतिक दलों का वोट शेयर भी नोटा से कम था।

नोटा का सबसे दिलचस्प इस्तेमाल तमिलनाडु की नीलगिरी लोकसभा सीट पर हुआ था जहां नोटा को 46,559 वोट मिले थे और यह तीसरे स्थान पर रहा था। नोटा को मिले वोटों के कारण नीलगिरी सीट से मौजूदा सांसद और डीएमके उम्मीदवार ए राजा चुनाव हार गए थे। इस सीट पर नोटा के प्रयोग को भाजपा ने प्रोत्साहित किया था क्योंकि तब भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी एस. गुरुमूर्ति का पर्चा खारिज हो गया था जिसके चलते भाजपा ने अपने समर्थकों से अधिक से अधिक नोटा के प्रयोग की बात कही थी।

क्या नोटा इंदौर में नया रिकॉर्ड बनाएगा?

अब जबकि इंदौर में कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी ने पाला बदल लिया है तो कांग्रेस ने इंदौर में नोटा की मुहिम चला दी है। वैसे भी इंदौर में कोई भी चुनाव हो, यहां मतदान प्रतिशत हमेशा संतोषजनक रहता है। 2014 में इंदौर में 62.25 प्रतिशत तो 2019 में 69.56 प्रतिशत मतदान हुआ था किंतु इस बार यह आशंका भी जताई जा रही है कि कांग्रेस प्रत्याशी के चुनाव में न होने से मतदान प्रतिशत बहुत कम हो सकता है या कांग्रेस की नोटा की अपील रंग दिखा सकती है।

उदाहरण के लिए, 2019 में कांग्रेस प्रत्याशी पंकज संघवी को 5,20,815 वोट मिले थे, जो कुल मतदान का 31.97 प्रतिशत था। इससे पूर्व के लोकसभा चुनाव के आंकड़े देखें तो 1998 के बाद से 2019 तक, कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी को तीन लाख से अधिक वोट मिले ही हैं।

ऐसे में इस बार कांग्रेस प्रत्याशी के मैदान में न होने से क्या ये तीन लाख से अधिक वोट नोटा को मिलने वाले हैं या तीन लाख से अधिक कांग्रेस के समर्पित मतदाता मतदान का बहिष्कार करने वाले हैं, इसे लेकर इंदौर की राजनीति भीषण गर्मी में अधिक तप रही है। एक ओर प्रशासन कम मतदान से सहमा हुआ है, वहीं भाजपा सांसद शंकर लालवानी जिन्हें 8 लाख से अधिक की जीत का भरोसा था, अब जीत के पिछले 5,47,754 वोटों के अंतर के कम होने की आशंका से मायूस हैं।

कहां तो वे देश में अपनी जीत का रिकॉर्ड बनाने के लिए मेहनत कर रहे थे, वहीं अब उनके सामने नोटा के रिकॉर्ड को न बनने देने की चुनौती है। गृहमंत्री अमित शाह भोपाल में आकर मंत्रियों-विधायकों के क्षेत्र में कम मतदान से परिणाम भुगतने की चेतावनी देकर जा चुके हैं, वहीं दिल्ली दरबार ने भी इंदौर में नोटा के 'लखपति' बनने की आशंका को देखते हुए उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा को काम पर लगा दिया है ताकि वे डैमेज कंट्रोल कर सकें।

हालांकि यह इतना आसान भी नहीं है क्योंकि इंदौर की जनता ने जैसे स्वच्छता में शहर को देश का सिरमौर बनाया है, वह चाहती है कि शहर राजनीति के मामलों में भी स्वच्छ रहे। 13 मई को मतदान के दिन जनता का मूड क्या होता है, इसपर 'लखपति नोटा' की आशंका से संशय के बादल छटेंगे।

क्या 'लखपति नोटा' भाजपा प्रत्याशी की नैतिक हार होगी?

अक्षय बम के नामांकन वापसी से लेकर भगवा दल में प्रवेश को सभी से छुपा कर रखा गया था। पूर्व से लेकर वर्तमान सांसद तक को इसकी भनक नहीं थी। ऐसे में सांसद शंकर लालवानी के समर्थक जनता के बीच यह तर्क दे रहे हैं कि इस पूरे प्रकरण में उनका कोई हाथ नहीं है अतः इंदौर की जनता दूसरों के किए की सजा उन्हें न दे।

अव्वल तो पहले ही शंकर लालवानी का टिकट काफी राजनीतिक प्रपंचों के बाद हुआ था और जनता के बीच उनकी साख भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी, किंतु टिकट होने के बाद भाजपा प्रत्याशी के रूप में उन्हें स्वीकार किया जाने लगा था। वे भी रिकॉर्ड मतों से जीतने की तैयारी कर रहे थे। कांग्रेस प्रत्याशी न तो राजनेता थे, न ही उनका चेहरा इंदौर में जाना-पहचाना था किंतु नामांकन वापसी के बाद से शंकर लालवानी की दुविधा बढ़ी हुई है। वे जीतेंगे इसमें अब किसी को संशय नहीं है किंतु यदि कांग्रेस को मिलने वाले 10 प्रतिशत वोट भी नोटा को चले गए तो यह एक प्रत्याशी के तौर पर ललवानी की नैतिक हार होगी। इससे इंदौर के ऊपर भी ऐसा दाग लगेगा जिसकी चर्चा हर चुनाव में होगी। फिलहाल तो इंदौर की राजनीति और आम जनता, दोनों ही खुद को छला हुआ महसूस कर रहे हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+