Cyber Crimes: जहां जितनी तकनीकी क्रांति, वहां उतना साइबर अपराध
Cyber Crimes: साइबर अपराध के सबसे ज्यादा आम तीन प्रारूप हैं, ब्लैकमेलिंग, बैंकिंग फ्रॉड और ओटीपी फ्रॉड। इनमें तेलंगाना जैसा छोटा राज्य शीर्ष पर है।

न सिर्फ आगे है, बल्कि इन अपराधों की संख्या के लिहाज से भी दूसरे नंबर पर रहने वाले राज्यों की तुलना में यहॉं करीब ढाई से दस गुना ज्यादा तक अपराध दर्ज किए गए हैं। जैसे कि ओटीपी फ्रॉड केस में 201 मामलों के साथ ओड़िशा दूसरे स्थान पर है, जबकि तेलंगाना में 2179 मामले दर्ज हुए।
इसी तरह ब्लैकमेलिंग और बैंकिंग फ्रॉड के केसों की संख्या में भी यहॉं दूसरे स्थान पर रहने वाले महाराष्ट्र के क्रमश: 95 व 909 केसों की तुलना में 234 व 3223 मामले दर्ज हुए। हालांकि यह बात थोड़ी राहत भरी हो सकती है कि बीते वर्ष तेलंगाना, 261 साइबर अपराध प्रति एक लाख व्यक्ति की दृष्टि से, देश में तीसरे स्थान पर है। हालांकि राष्ट्रीय औसत 129 अपराध प्रति एक लाख व्यक्ति से तुलना करें तो यह संख्या दोगुने से भी अधिक है। लेकिन दिल्ली के 755 प्रति लाख और हरियाणा के 381 प्रति लाख से तो यह कम ही है।
जाहिर है कि समस्या सिर्फ तेलंगाना की नहीं है, जो उन्नत प्रौद्यिगिकी के लिहाज से देश के अग्रणी राज्यों में गिना जाता है। तकनीकी क्रान्ति का फायदा उठाकर साइबर अपराधियों ने अपेक्षाकृत कम आधुनिक माने जाने वाले बिहार, राजस्थान व उ.प्र. जैसे राज्यों को भी इस मामले में शीर्ष पर ला खड़ा किया है। यही वजह है कि देश भर में एटीएम फ्रॉड के कुल दर्ज 1690 मामलों में, अकेले बिहार की ही हिस्सेदारी 638 है और क्रेडिट/डेबिट कार्ड संबंधी धोखाधड़ी में भी बिहार ही शीर्ष पर है।
इंडियन साइबर कोऑर्डिनेशन सेंटर के मुताबिक, देश में होने वाले साइबर अपराधों में सबसे ज्यादा करीब एक तिहाई मामले कस्टमर केअर, रिफंड और केवाईसी एक्सपायरी से संबंधित होते हैं और लगभग एक चौथाई सेक्सटॉर्शन के। इसके बाद ऑनलाइन बुकिंग फ्रॉड और बायोमेट्रिक क्लोनिंग आदि। अप्रैल 2021 से 31 दिसंबर, 2023 के बीच नागरिकों को ऑनलाइन धोखाधड़ी की वजह से कुल 10,319 करोड़ रुपये की चपत लगी, जिसमें लगभग दस फीसदी, करीब 1,127 करोड़ रुपये, की ही रिकवरी हो पाई। वह भी इसलिए कि शिकार व्यक्तियों ने समय रहते अपने साथ हुई धोखाधड़ी की सूचना सिटीजन फाइनेंशियल साइबर फ्रॉड रिपोर्टिंग एंड मैनेजमेंट सिस्टम (सीएफसीएफआरएमएस CFCFRMS) और फाइनेंशियल साइबर फ्रॉड हेल्पलाइन 1930 तक पहुँचा दी थी। इंडियन साइबर कोऑर्डिनेशन सेंटर के मुताबिक इस हेल्पाइन की वजह से अब तक करीब सवा चार लाख लोग लाभान्वित हो चुके हैं।
सच तो यह है कि साइबर अपराधों की गंभीरता, आँकड़ों के उछाल से कहीं ज्यादा है। इनके पीड़ितों को वित्तीय नुकसान, भावनात्मक आघात और हताशा के जिस एहसास से गुजरना पड़ता है, उसका अंदाजा एक भुक्तभोगी ही लगा सकता है। ऑनलाइन घोटाले और सेक्सटॉर्शन की घटनाएं कई बार शिकार को डर, चिंता और शर्मिंदगी का सामना करने के लिए मजबूर कर देती हैं।
भारत में बढ़ते साइबर अपराधों के पीछे बहुत सारी वजह हो सकती हैं। सबसे बड़ी वजह यह है कि तकनीक जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, हम उसका फायदा उठाना तेजी से सीख लेते हैं, लेकिन उसके नुकसानों से बचने के खतरों पर शायद इतनी गंभीरता या तत्परता से विचार नहीं कर पाते। नई प्रौद्योगिकियॉं सिखाने वाली तमाम व्यवस्थाएं व संस्थान भी सारा जोर इनका उपयोग सिखाने पर लगा देते हैं, इनके क्या-क्या साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं, इनसे कैसे बचा जा सकता है, इस बारे में बताने की जरूरत उन्हें कभी महसूस नहीं होती। इसलिए इसका गलत फायदा उठाने वाले हमेशा सुरक्षात्मक उपायों और कानूनी व्यवस्थाओं के मुकाबले हमेशा 'डाल डाल' और 'पात-पात' वाली स्थिति में ही रहते हैं।
हर नई तकनीक, उसका सकारात्मक उपयोग करने वालों से ज्यादा साइबर अपराधियों के लिए एक नई उपजाऊ जमीन तैयार कर देती है, जो बैंकिंग सिस्टम से लेकर व्यक्तिगत उपकरणों और रुझानों तक, हर कमजोरी का फायदा उठाने में माहिर होते हैं। और उनसे निपटने की मौजूदा व्यवस्थाएं स्वयं को इतनी तेजी से अपग्रेड नहीं कर पातीं। जैसे कि डीपफेक। नकली आवाजों, वीडियो और कंटेंट के जरिए तरह-तरह के अपराधों को अंजाम दिए जाने की खबरें हम आए दिन पढ़ रहे हैं। जब तक हम इसकी काट सोचेंगे, कोई नई तकनीक इजाद हो चुकी होगी, जिसके मुकाबले डीपफेक कुछ भी नहीं होगी।
दरअसल, कोई भी इकाई अकेले, साइबर अपराध से प्रभावी ढंग से मुकाबला नहीं कर सकती। संसाधनों, विशेषज्ञता को साझा करने और व्यापक साइबर रक्षा रणनीतियों को विकसित करने के लिए सरकारी एजेंसियों, तकनीकी कंपनियों, वित्तीय संस्थानों, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों और गैर सरकारी संगठनों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी महत्वपूर्ण है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि साइबर अपराध भौगोलिक सीमाओं को नहीं मानता। जरूरी नहीं कि आपको शिकार बनाने वाला साइबर अपराधी जामताड़ा, नूह या मेवात से ही हों, वे नाइजीरिया और तंजानिया जैसे देशों से भी हो सकते है।
यह एक आर्थिक या आपराधिक समस्या ही नहीं, बल्कि इसके कई सामाजिक और भावनात्मक पहलू भी हो सकते हैं। इसलिए साइबर अपराधों की जटिल चुनौती से निपटने के लिए बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। सार्वजनिक जागरूकता अभियान इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, जो नागरिकों को संभावित साइबर जोखिमों, सुरक्षित ऑनलाइन व्यवहार, और संदिग्ध गतिविधि की पहचान करने और रिपोर्ट करने के बारे में शिक्षित करते हों।
सरकार को एक मजबूत साइबर सुरक्षा बुनियादी ढांचे के निर्माण में निवेश करना चाहिए, जिसमें प्रशिक्षित कर्मियों से युक्त समर्पित इकाइयाँ, अत्याधुनिक तकनीक और आसन्न खतरों का पता लगाने वाले उपकरण शामिल हों। इसके अलावा साइबर अपराधों की परंपरागत और नवाचारी प्रवृति पर अंकुश लगाने के लिए मौजूदा कानूनों को निरंतर अद्यतन करते रहना भी बेहद आवश्यक है। सख्त दंड और अधिक व्यापक कानूनी ढांचे निवारक के रूप में कार्य कर सकते हैं।
साइबर अपराध के शिकार लोगों को यदि न्याय का विश्वास दिलाया जा सके और समय रहते उन्हें हुए नुकसान की भरपाई की जा सके तो दूसरे लोगों में भी व्यवस्था के प्रति भरोसा पैदा होगा और वे अधिक से अधिक संख्या में अपने साथ हुई धोखाधड़ी या अपराधों की रिपोर्ट कराने के लिए आगे आएंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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