Mob Lynching: मरने वाले का धर्म देखकर ही मॉब लिंचिग का हंगामा क्यों होता है?
बिहार के गोपालगंज में 27 जनवरी को अंकित नामक एक नौजवान की समुदाय विशेष द्वारा मॉब लिंचिंग कर दी गयी। सवाल है कि मॉब लिंचिंग का शोर फैलाने वाले लोग हिंदुओं के मारे जाने पर अचानक चुप क्यों हो जाते हैं?

Mob Lynching: गोपालगंज में अंकित की हत्या हिन्दू मुस्लिम झगड़ा माना जाए या नहीं? इस सवाल पर गोपालगंज के स्थानीय पत्रकार बताते हैं कि युवकों में क्रिकेट को लेकर आपसी कोई विवाद था। अंकित जब मुस्लिम मोहल्ले में आया तो उन्होंने अपनी कसर निकाल ली। हो सकता है कि पत्रकार के बयान में स्थानीय प्रशासन का दबाव हो लेकिन यह कहां से जायज हुआ कि क्रिकेट के मामूली विवाद में समुदाय विशेष के लोगों को एक युवक की नृशंस हत्या तक कर देने का अधिकार है? इस हत्या का एक उद्देश्य यह भी समझ में आता है कि भविष्य में ये घटना गोपालगंज के अंकितों के लिए एक मिसाल बन जाए।
2014 के बाद लेफ्ट लिबरल इको सिस्टम ने मीडिया में मॉब लिंचिंग शब्द को खूब प्रचारित-प्रसारित किया। जहां मॉब लिंचिंग का एक ही मतलब होता था कि मुस्लिम पीड़ित मवेशी लेकर जा रहा था और गौ रक्षकों ने उसकी मॉब लिंचिंग की। जबकि इसी दौरान मुसलमानों के हाथों हिन्दूओं की हो रही मॉब लिंचिंग को लेफ्ट लिबरल इको सिस्टम अपने मीडिया में स्थान देने को भी तैयार नहीं था।
आज भी हिन्दी पट्टी के जागरूक दर्शक और पाठक खबरों में जब हत्यारों की पहचान छुपा ली जाती है या पीड़ित का नाम जाहिर नहीं किया जाता तो 'बिटवीन द लाइन्स' पढ़कर पूरे मामले को समझने का प्रयास करते हैं। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की कांग्रेस के साथ मिली-जुली सरकार में दो सन्यासियों की उनके ड्राइवर के साथ पालघर में मॉब लिंचिंग हुई। उसके बाद जाहिर तौर पर 16 अप्रैल 2020 को आम लोगों को यह पता चला कि समाज में हिन्दू भी मॉब लिंचिंग का शिकार हो रहा है। वह भी उतना ही डरा हुआ है, जितना मीडिया में मुसलमानों को डरा हुआ दिखाया जा रहा है।
हाल ही में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने आतंकी नौशाद अली और जगजीत सिंह उर्फ जग्गा को दिल्ली के जहांगीरपुरी से गिरफ्तार किया है। भलस्वा डेरी स्थित एक कमरे में दोनों ने पिछले साल दिसंबर में राज कुमार नाम के युवक की बेरहमी से हत्या की थी। हत्या के बाद उन्होंने 37 सेकंड का वीडियो बनाकर उसे पाकिस्तान में बैठे लश्कर ए तैयबा के आतंकियो को भेजा था। इसके अलावा इन लोगों ने बिहार के आरा में दो नाबालिग लड़कों को टारगेट किलिंग का टार्गेट सौंपा था। उन नाबालिग लड़कों को इन्होंने टास्क दिया था कि जब आतंकी नौशाद संकेत करे, उन्हें दो नाबालिग बच्चों का सिर हलाल करके उसका वीडियो बनाना है। वे दोनों नाबालिग पुलिस की गिरफ्त में हैं। नाबालिग होने की वजह से पुलिस उनके नाम का खुलासा नहीं कर रही है।
एक बार फिर बात गोपालगंज के अंकित की करें तो उसके साथ जो हुआ, वह मॉब लिंचिंग नहीं तो और क्या था? यह आश्चर्यजनक है कि भारतीय मीडिया ने अखलाक की तरह अंकित पर बात करना मुनासिब नहीं समझा। यदि मॉब लिंचिंग भारतीय समाज को लगी एक गंभीर बीमारी है तो जब तक उसका ईमानदार परीक्षण नहीं होता, हम सही निष्कर्ष तक कैसे पहुंचेगे?
अंकित की हत्या अगर बच्चों का आपसी झगड़ा ही था तो घर के बड़े बुजुर्ग इसमें क्यों शामिल हो गये? उनकी अंकित से क्या दुश्मनी थी? अब तक जो सच्चाई सामने आयी है उसके मुताबिक हत्या करने वाले मुस्लिम नौजवानों के परिवार के सदस्य भी इस हत्याकांड में शामिल थे। यह भी सोचने का समय है कि वे किस समुदाय के लड़के हैं, जो मस्जिद के सामने घेरकर किसी गैर मुस्लिम लड़के का क्रूरतापूर्वक मर्डर करते हैं और उनका पूरा समाज मूकदर्शक बनकर देखता है।
बिहार में किसी हिन्दू की मॉब लिंचिंग की यह अकेली घटना नहीं है। कई घटनाएं तो सही प्रकार से दर्ज भी नहीं होती और समाचार पत्रों के स्थानीय संस्करणों में दबकर रह जाती हैं। पिछले साल जुलाई में एक और नौजवान धर्म साहू को मुस्लिम भीड़ द्वारा जघन्य तरीके से मार दिया गया था। धर्म सिंह साहू और उनके भाइयों ने एक मुस्लिम व्यक्ति मोहम्मद अजमल को कहा कि वह उसकी भतीजी का पीछा न करें, जिसका नाम काजल था। काजल विवाहित थी फिर भी अजमल उसके साथ छेड़खानी करता था।
पीछा करने वाला मोहम्मद अजमल नदाफ उनके ऐतराज से इतना भड़क गया कि उसने कुछ ही मिनटों में मुस्लिम भीड़ को इकट्ठा कर लिया और उन्होंने धरम और उसके परिवार पर "नारा-ए-तकबीर ... अल्लाह-हू अकबर" बोलते हुए हमला कर दिया। भीड़ ने यह भी कहा कि "हिंदुओं का मन बढ गया है, चलो उन्हें हलाल करते हैं।" आश्चर्यजनक रूप से इस हिंसक हत्यारी भीड़ में कई मुस्लिम महिलाएं भी शामिल थीं। इस लिंचिंग में नौजवान धर्म साहू मारे गये, बाकी परिवार के लोग गंभीर रूप से घायल हुए।
अभी महीनाभर पहले ही दिसंबर 2022 में एक जघन्य हत्या का मामला सामने आया था। भागलपुर में ओबीसी समुदाय से आने वाली नीलम यादव के हाथ, कान, स्तन शकील मियां ने इसलिए काट दिए क्योंकि उसने कथित तौर पर उससे कुछ पैसे उधार लिए थे। नीलम यादव के परिवार से मिलने के लिए राष्ट्रीय जनता दल का कोई प्रतिनिधि नहीं गया क्योंकि इससे उनका मुस्लिम यादव समीकरण बिगड़ सकता था। संभवत: राष्ट्रीय जनता दल के नेता सोचते हैं कि नृशंस हत्यारे के साथ मुसलमानों की सहानुभूति होगी क्योंकि हत्यारा उनके समुदाय का है।
इसी तरह अप्रैल 2021 में बिहार के किशनगंज नगर के थानाध्यक्ष अश्विनी कुमार की जिस बर्बर तरीके से मॉब लिंचिंग हुई थी, उसने पूरे देश में सनसनी पैदा कर दी थी। वो एक बाइक चोर को पकड़ने महज 12 किमी दूर गए थे। इस दौरान अंधेरे की वजह से दूसरे राज्य में चले जाने का अंदाजा वे लगा नहीं पाए और वे पश्चिम बंगाल के इस्लामपुर इलाके में चले गए। वहां इस्लामिक कट्टरपंथियों के हाथों वे मॉब लिंचिंग के शिकार हो गये। बेटे की मौत का सदमा उनकी मां बर्दाश्त नहीं कर पाई और 24 घंटे के अंदर एक ही परिवार से दो लोगों की अर्थी उठी। थानाध्यक्ष लिंचिंग मामले में जुबेर उर्फ जुबेर आलम, मोहिबुला, खबीर उर्फ अब्दुल खबीर, रोबू, मोहम्मद फिरदोह, फिरोज आलम, अबुजार आलम, सहीनुल खातुन, मलिक उर्फ अब्दुल मलिक, मोहम्मद इसराइल आरोपी बनाए गए थे।
लिंचिंग के मामले को जो लोग गूगल सर्च से समझने का प्रयास करेंगे, तो ऐसे कई लोगों के बयान और लेख मिलेंगे जो मुसलमानों को पीड़ित और हिंदुओं को आरोपी लिखेंगे। जमीनी हकीकत उससे बिल्कुल उलट है। बिहार सरकार के लिए इस समय सामाजिक न्याय का मतलब अल्पसंख्यक तुष्टीकरण बनकर रह गया है। यह प्रदेश में बढ़ रही साम्प्रदायिक हिंसा और मॉब लिंचिंग की घटनाओं में साफ दिखाई पड़ता है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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