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Pasmanda Muslims: भाजपा की नजर क्यों हैं पसमांदा मुसलमानों पर?

पसमांदा यानि पिछड़े, दलित और शोषित मुसलमानों पर भाजपा ने विशेष ध्यान देना शुरू कर दिया है। वह पसमांदा मुससमानों को अपने साथ जोड़कर विपक्ष की मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति को तगड़ा झटका देने की तैयारी में है।

Mission 2024 BJP wants to Woo Pasmanda Muslims ahead of polls

पहली बार सार्वजनिक रूप से 3 जुलाई 2022 को हैदराबाद में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाजपा के नेताओं को स्नेह यात्राएं निकालकर पसमांदा मुसलमानों को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए कहा था। इसके 190 दिन बाद 17 जनवरी को दिल्ली में हुई भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने फिर से नेताओं और कार्यकर्ताओं को मुस्लिम समुदाय के बोहरा, पसमांदा और पढ़े-लिखे लोगों तक सरकार की नीतियां लेकर जाने और उनको भाजपा से जोड़ने का आव्हान करते हुए कहा कि हमें समाज के सभी अंगों से जुड़ना है और उन्हें अपने साथ जोड़ना है।'

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा पसमांदा मुस्लिम समाज को भाजपा से जोड़ने के लक्ष्य का लगातार जिक्र यह दर्शाता है कि मोदी भारत में पिछड़े और दलित मुस्लिमों, जिन्हें पसमांदा कहा जाता है, को साथ लेकर मुस्लिम वोटों की राजनीति करने वाले विपक्ष को तगड़ी चोट देने की रणनीति में जुट गए हैं। मोदी की इस कोशिश में पसमांदा आंदोलन के प्रमुख बौद्धिक पैरोकार खालिद अनीस अंसारी का यह बयान भी महत्वपूर्ण है कि संघ और भाजपा ने मिलकर न्यू इंडिया नामक जो विराट राजनीतिक मशीन तैयार की है, उसमें नई नई बातें सीखने की अभूतपूर्व क्षमता है।

संघ और भाजपा पसमांदा मुसलमानों को जोड़ने की जिस दीर्घकालीन योजना पर काम कर रहे हैं, उसके परिणाम बहुमुखी हो सकते हैं। मुसलमानों के साथ संबंध सुधारने का सबसे बड़ा लाभ भाजपा को यह होगा कि मोदी सरकार की अंतरराष्ट्रीय छवि बदलेगी। विपक्ष लगातार सरकार को अल्पसंख्यक विरोधी बताकर उसके लोकतांत्रिक स्वरूप पर सवालिया निशान लगा रहा है। भाजपा को विपक्ष के इन आरोपों से निपटने में आसानी होगी। दूसरा फायदा यह होगा कि भाजपा मुसलमानों में पैठ बनाकर मुस्लिम युवाओं को अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक कट्टरतावाद के चंगुल में फंसने से रोकने की कोशिश करेगी। भाजपा की इस रणनीति का तीसरा पहलू चुनावी है। अगर भाजपा पसमांदा मुसलमानों के एक छोटे हिस्से को भी अपनी ओर खींच पाई तो उत्तर ही नहीं दक्षिण में भी सत्ता पाने की कोशिश मे जुटी भाजपा को इसका फायदा मिलना तय है।

पसमांदा मुस्लिम समुदाय को कभी भी राजनीतिक ताकत नहीं मिली। भाजपा उनको राजनीतिक ताकत देकर अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। पसमांदाओं का कहना है कि मुसलमानों में अजलाफ यानी (आरक्षण की जद में आने वाली पिछड़ी जातियों) और अरजाल यानी (संवैधानिक मान्यता से वंचित अनुसूचित जातियों) की संख्या करीब 85 प्रतिशत है। लेकिन उनकी नेतागिरी 15 प्रतिशत अशराफ (ऊंची जाति के मुसलमान) करते हैं। कांग्रेस का वोट बैक रहा यह वर्ग कांग्रेस के पराभव के बाद पिछड़े वर्ग के आधार वाली सपा, बसपा, राजद को वोट देता रहा है।

'ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के संस्थापक और राज्यसभा सांसद रहे अली अनवर अंसारी का कहना है कि मुस्लिम समाज भी जातियों में बंटा है। जो मुस्लिम जातियां सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ी हैं उन्हें पसमांदा मुस्लिम कहते हैं। इनमें वो जातियां भी शामिल हैं जिनसे छुआछूत होती है लेकिन यह हिंदू दलितों की तरह अनुसूचित जातियों यानी एससी की सूची में शामिल नहीं हैं।

भारतीय मुस्लिमों में पसमांदा मुस्लिमों की आबादी 80 से 85 प्रतिशत के आसपास है। भाजपा मानती है कि पसमांदा मुसलमानों का एक वर्ग भाजपा को वोट दे रहा है। उत्तर प्रदेश के 45% मुस्लिम आबादी वाली रामपुर लोकसभा सीट पर उपचुनाव में भाजपा को 42 हजार वोटों से जीत और मुस्लिमों के गढ़ माने जाने वाले आजमगढ़ उप-चुनाव में भी 13 साल बाद भाजपा कमल खिलाने में कामयाब रही है। इस जीत के बाद भाजपा ने दावा किया था कि विधानसभा चुनाव में 8% पसमांदा का वोट भाजपा को मिला था।

इसके अलावा सीएसडीएस लोकनीति सर्वे 2022 ने भी अपने रिपोर्ट में बताया है कि 8% पसमांदा मुस्लिमों ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में भाजपा को वोट दिया था। पसमांदा मुसलमानों की वजह से भाजपा कई सीटों पर जीतने में सफल रही थी। यूपी विधानसभा चुनाव 2022 में 34 मुस्लिम विधायक जीतकर लखनऊ पहुंचे हैं, जिनमें से 30 विधायक पसमांदा हैं।

उत्तर प्रदेश की कुल आबादी में पसमांदा मुस्लिम 18% हैं। ऐसे में साफ है कि भाजपा न सिर्फ 80 लोकसभा वाले यूपी बल्कि बिहार, बंगाल, झारखंड जैसे राज्यों में भी राजनीति साधने की कोशिश कर रही है।

पसमांदा पर सच्चर कमेटी का सुझाव

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक, 1936 में जब अंग्रेजों के सामने ये मामला गया तो एक इंपीरियल ऑर्डर के तहत सिख, बौद्ध, मुस्लिम और ईसाई दलितों को बतौर दलित मान्यता दी गई, लेकिन इन्हें हिंदू दलितों को मिलने वाले फायदे नहीं दिए गए। 1950 में आजाद भारत के संविधान में भी यही व्यवस्था रही।

हालांकि 1956 में सिख दलितों और 1990 में नव-बौद्धों को दलितों में शामिल तो कर लिया गया पर मुस्लिम दलित जातियों को मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होने के बाद ओबीसी लिस्ट में ही जगह मिल पाई। इसलिए कमीशन की रिपोर्ट में दलित पसमांदा मुस्लिमों को एससी में शामिल करने का सुझाव दिया गया।

इस सुझाव के पीछे पसमांदा मुस्लिमों की सार्वजनिक जीवन में कम भागीदारी है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 1947 से लेकर 14वीं लोकसभा तक कुल 7,500 सांसद बने, जिनमें से 400 मुस्लिम थे। हैरानी की बात यह है कि इनमें से 340 सांसद अशराफ यानी उच्च मुस्लिम जाति के थे और सिर्फ 60 मुस्लिम सांसद पसमांदा समाज से।

पसमांदा समाज के लिए भाजपा की पहल

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने उच्च जाति के केबिनेट मंत्री मोहसिन रजा को हटाकर पसमांदा समाज के दानिश आजाद अंसारी को मंत्री बनाया। इसके साथ ही पसमांदा मुस्लिमों तक पहुंचने के लिए भाजपा 'स्नेह यात्रा' निकाल रही है।

मुफ्त राशन, शौचालय, गैस सिलेण्डर, आवास, छोटे व्यवसाय के लिए त्वरित ऋण अल्पसंख्यक मंत्रालय के माध्यम से मोदी सरकार पसमांदा मुसलमानों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। हर राज्य में अल्पसंख्यक मोर्चा की टीम बनाकर उनसे पसमांदा मुसलमानों को जोड़ने के प्लान पर भी भाजपा काम कर रही है।

भाजपा से क्या चाहता है पसमांदा मुसलमान?

अगर पसमांदा मुस्लिम समाज की उम्मीदों पर नजर डालें तो पसमांदा समाज की पहली मांग यह है कि पसमांदा समुदाय को सरकार शेड्यूल्ड कास्ट का दर्जा दे। दूसरी मांग यह है कि पसमांदा मुस्लिम समाज के लोगों के साथ सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर अन्याय बंद हो। तीसरी मांग यह है कि राजनीतिक स्तर पर दलों में पसमांदा समाज के लोगों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाया जाए। ताकि इस समुदाय के ज्यादा लोग संसद और विधानसभा पहुंचे।

देश के पांच राज्यों में 190 लोकसभा सीटें आती हैं जहां सबसे ज्यादा पसमांदा मुसलमान रहते हैं। भाजपा की कोशिश 2024 के विधानसभा चुनाव में इस पिछड़े मुसलमानों के वर्ग को अपने साथ करने की है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी इस समुदाय को जोड़ने की कोशिश अपने स्तर पर कर रहा है। जमीनी स्तर पर संघ के स्वयंसेवक और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के नेता भी इस समुदाय के घर तक पहुंच बनाने में जुटे हैं।

मुसलमानों का यह तबका भाजपा का कितना साथ देता है यह आने वाला समय बताएगा लेकिन एक बात तय है कि भाजपा ने इस समुदाय पर फोकस कर मुस्लिम वोटों की राजनीति करने वाले दलों के माथे पर पसीना ला दिया है।

यह भी पढ़ें: Pasmanda Muslims: वे कौन हैं, जो भाजपा को वोट नहीं देते

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