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मेधा पाटकर: आंदोलन, प्रसिद्धि, राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा और भ्रष्टाचार का कीचड़

केन्द्र में 2014 से चल रही मोदी सरकार की एक पहचान समाज के अंदर "मूर्ति बनाने वाली सरकार" की है तो इस सरकार की एक दूसरी पहचान भी है। इस सरकार ने कई चेहरों पर पड़ा मुखौटा उतारा, कई लोगों की असलियत का खुलासा किया। इस सरकार में बहुत से बुत टूटे और न जाने कितने खानकाह उजड़ गये। उतर रहे मुखौटो में और टूट रही मूर्तियों में एक चेहरा मेधा पाटकर का भी है।

Medha Patkar: Movement and investigate of fraud case

नर्मदा बचाओ आंदोलन में मेधा पाटकर के संघर्ष से परिचित कोई साथी कैसे इस बात पर विश्वास कर सकता है कि 1985 में प्रारंभ हुआ नर्मदा बचाओ आंदोलन 25 साल पूरा करते-करते अपनी राह भटकने लगा था। मध्य प्रदेश में यह संघर्ष खत्म होने के लिए किसी कृष्णविवर की राह ले चुका था। अब इस आंदोलन के नाम पर चल रही कई गड़बड़ियां सरकारी जांच के दायरे में हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने उनके नर्मदा नवनिर्माण ट्रस्ट में आर्थिक लेन देन की गड़बड़ियों की जांच के लिए एक एसआईटी का गठन कर दिया है। यह एसआईटी बड़वानी से लेकर नंदुरबार तक मेधा पाटेकर के दफ्तरों के कागजात खंगाल रही है।

एक वह दौर था, जब आंदोलन के बड़वानी खेमे का विवाद सतह पर आ गया था। स्थिति ऐसी थी कि आंदोलन को खत्म करना है, इसलिए इसका बंदरबांट कर लिया जाए। समाचार पत्रों में चाहे यह खबर प्रमुखता से ना छपी हो लेकिन आंदोलन को जानने वाले इस बात से परिचित हैं कि आंदोलन दो हिस्सों में बंट चुका था। मध्य प्रदेश वाले हिस्से पर मेधा का नियंत्रण कमजोर पड़ गया था। वहां चित्तरूपा पलित की स्थिति मजबूत थी। मेधा मध्य प्रदेश के मामले में कम हस्तक्षेप करने लगी थी।

2016 की घटना है जब मेधा पाटकर को नर्मदा नदी पर दिए गए अपने कथित आपत्तिजनक बयान के लिए माफी मांगनी पड़ी थी। उन्होंने सफाई भी दी कि उनके कथन को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया। गौरतलब है कि नशा मुक्ति के नाम पर चल रहे अभियान में आंदोलन के कार्यकर्ता बड़ी संख्या में बीड़ी, सिगरेट और गुटका खाते पाए गए। जब पत्रकारों ने जब इस पर आंदोलन का पक्ष मांगा तो मेधा का जवाब था कि उनके नशा मुक्ति का अर्थ सिर्फ शराब से मुक्ति हैं। सिगरेट, बीड़ी और गुटका का विरोध उनके आंदोलन का हिस्सा नहीं है। इस तरह के विवाद और अनावश्यक बयानों ने आंदोलन को कमजोर किया। आंदोलन के शीर्ष के नेतृत्व में तनातनी की वजह जो पहले स्पष्ट नहीं थी, बाहर से आ रहे चंदे की मोटी रकम की जानकारी सार्वजनिक होने के बाद सारे तार जुड़ रहे हैं।

माहेश्वर (मध्य प्रदेश) में एक एनजीओ के कार्यक्रम में मेधा पाटकर को सुनने का मौका मिला। मेधा ने बताया कि सभी अखबारों में आंदोलन की जब खबर छपती है तो मेरी तस्वीर लगा दी जाती है। जो मुझे पसंद नहीं है। अच्छा होता कि जो लोग आंदोलन के लिए जमीन पर संघर्ष कर रहे हैं, उनसे बात की जाती।

इस बात ने मेरे युवा मन को प्रभावित किया। मैंने दिल्ली से निकलने वाले एक समाचार पत्र के संपादक से बात करके उन्हें आंदोलन के किसी गुमनाम योद्धा के साक्षात्कार के लिए तैयार किया ताकि मेधा पाटकर के कहे अनुसार आंदोलन से जुड़े अनाम लोगों के नाम को सामने लाया जा सके। एक ऐसी कार्यकर्ता से संपर्क करने का प्रयास हुआ जो जमीन पर सक्रिय थीं, जिसके पीछे सैकड़ों विस्थापित खड़े थे, जो सबकी चिन्ता कर रही थी।

जब मैंने उस आंदोलनकर्मी से संपर्क करने का प्रयास किया तो आंदोलन के बड़वानी कार्यालय से बताया गया कि चित्तरूपा की अनुमति के बिना यह साक्षात्कार नहीं हो पाएगा। इस प्रक्रिया में दो से तीन दिन लग सकते हैं। समाचार पत्र को एक दिन में वह साक्षात्कार चाहिए था। तीसरे दिन वह प्रकाशित होना था। वह साक्षात्कार नहीं मिल पाया। ना इस सवाल का जवाब मिला कि जब आंदोलन में सभी बराबर हैं फिर मेधा, चित्तरूपा, मधुरेश को बयान देने से पहले अनुमति क्यों नहीं लेनी पड़ती? जबकि जिन गांव वालों के दम पर पूरा आंदोलन खड़ा है, उनके बोलने पर आंदोलन ने इतने सारे पहरे लगा रखे हैं। ऐसा क्यों?

पत्रकारिता की पढ़ाई करते हुए हम जैसे छात्र नर्मदा बचाओ आंदोलन और उसकी नेत्री मेधा पाटकर के सामाजिक जीवन के प्रशंसक थे। स्वतंत्रता सेनानी, मजदूर नेता वसंत खानोलकर और सरकारी अधिकारी इंदुमती खानोलकर की बेटी मेधा को आंदोलन विरासत में ही मिला था। वरिष्ठ पत्रकार और मेधा के आंदोलन के साथी राकेश दीवान ने बताया था कि मेधा कार्यकर्ताओं के साथ कभी रूकती नहीं, कभी थकती नहीं।

आंदोलन के दौरान आंदोलनकर्मियों के साथ रहती हैं, उनके साथ खाना खाती हैं और बहुत कहने पर भी वह सुनती नहीं। आराम नहीं करती। कई बार तो बीमारी की स्थिति में भी वह लगातार काम करती रहीं। वह नर्मदा के विस्थापितों को न्याय दिलाना चाहती थीं। उनके लिए लड़ रहीं थी। उनकी इस लड़ाई के साथ हजारों की संख्या में विस्थापित जुड़े। इस आंदोलन ने दुनिया भर में मेधा को पहचान दी।

संभव है कि उन्हें मिली इस ख्याति ने उनके अंदर राजनीतिक महत्वाकांक्षा को जन्म दिया। 1996 में, मेधा पाटकर ने अन्य कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर नेशनल अलायंस आफ पीपुल्स मूवमेंट की स्थापना की। यह अलायंस अपने लिए राजनीतिक जमीन तलाशने लगा था। शांतिपूर्ण आंदोलन किसी सिरे नहीं चढ़ रहा था। धीरे धीरे विस्थापित भी निराश होने लगे थे। उस दौरान राजनीति ही सभी समस्या का समाधान दिखाई दे रहा था।

आंदोलन को सबसे अधिक चुनौती राजनीति से मिली, इसलिए आंदोलन को राजनीति के गढ्ढे में उतारने को लेकर वहां सहमति बनने लगी। इस सहमति में शर्ते थी कि हम समझौता नहीं करेंगे। अपनी पार्टी खड़ी करेंगे और भी बहुत कुछ। ऐसी सहमतियों के बीच किसी ने यह क्यों नहीं सोचा कि राजनीतिक सत्ता का आकर्षण प्रभावित तो करता है लेकिन यह आकर्षण आंदोलनों को नुकसान बहुत पहुंचाता है।

अरविन्द केजरीवाल ने जब आम आदमी पार्टी बनाई। अन्ना हजारे ने सबसे पहले उस राजनीतिक दल से खुद को अलग किया और अपने गांव रालेगढ सिद्धि (अहमद नगर) चले गए। आम आदमी पार्टी बनने की पूरी प्रक्रिया में अन्ना ने खुद को ठगा हुआ महसूस किया। लेकिन उसी पार्टी को 2014 में मेधा पाटकर ने ज्वाइन कर लिया। उसी पार्टी के टिकट पर चुनाव भी लड़ा। मध्य प्रदेश में स्थिति ऐसी है कि आज आम आदमी पार्टी और नर्मदा बचाओ आंदोलन में अंतर करना मुश्किल है। एक ही कार्यकर्ता दोनों गतिविधियां संभाल रहे हैं।

बात 2007 के आस पास की है। सामाजिक कार्यकर्ता अनुराधा तलवार के बुलावे पर मेधा पश्चिम बंगाल में एक जन जागृति यात्रा के लिए आई थीं। नक्सल आंदोलन से एक समय सहानुभूति रखने वाले समर दास ने उस यात्रा का किस्सा सुनाया था। समर ने मेधा के काम काज से प्रभावित होकर एनएपीएम ज्वाइन किया था। वे यात्रा में शामिल थे। यात्रा के दौरान जगह-जगह मंच सजाया गया था। मेधा का स्वागत माला पहनाकर किया जा रहा था। फिर वहां भाषण होता था। समर को यह बात अच्छी नहीं लगी। समर के अनुसार - एक राजनीतिक व्यक्ति और एक जन आंदोलनकर्मी में थोड़ा फर्क होना चाहिए। यदि हम भी मंच, माला, माइक की लालसा में पड़ गए फिर आंदोलन नहीं कर पाएंगे। राजनीति ही करेंगे।

समर सही साबित हुए। 2014 में मेधा आधिकारिक तौर पर राजनीति के मैदान में उतर आईं। बहरहाल मेधा पाटकर समेत 11 अन्य लोगों के खिलाफ बड़वानी में प्रीतम राज बड़ोले नाम के युवक ने एफआईआर दर्ज कराई है। आरोप है कि मेधा ने नर्मदा घाटी के लोगों के कल्याण के नाम पर, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के आदिवासी बच्चों को प्राथमिक स्तर की शिक्षा देने के नाम पर बहुत सारा पैसा दान में लिया, लेकिन उसका उपयोग मेधा और अन्य लोगों द्वारा राजनीतिक एजेंडे और और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के लिए किया गया।

एफआईआर में मेधा का नाम है, चूंकि मामला बडवानी से जुड़ा है इसलिए हो सकता है पुलिस बड़वानी में नर्मदा बचाओ आंदोलन का चेहरा और आम आदमी पार्टी की प्रत्याशी चयन समिति की अध्यक्षा चित्तरूपा पलित से भी सवाल करे। लेकिन इस एफआईआर और जांच का चित्तरुपा जैसे लोगों पर शायद उतना असर न पड़े जितना मेधा के नाम और छवि पर पड़ेगा। एसआईटी की जांच का जो नतीजा होगा, वह सामने आयेगा लेकिन ऐसे आरोपों और जांच से नर्मदा बचाओं आंदोलन जैसे आंदोलनों का नुकसान बहुत होता है। आंदोलन अपने नाम और छवि पर चलते हैं। एक बार उनके नाम और छवि पर भ्रष्टाचार का कीचड़ उछल जाए तो आंदोलनों के अवसान का खतरा पैदा हो जाता है।

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(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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