Mahua Moitra Case: कॉरपोरेट पॉलिटिशियन गठजोड़ पर बहस जरूरी

Mahua Moitra Case: जिस तृणमूल कांग्रेस से महुआ मोइत्रा लोकसभा चुनकर आयी हैं, उसकी नेता ममता बनर्जी के बारे में मशहूर है कि उन्होंने सूती धोती और हवाई चप्पल से आगे कोई शौक श्रृंगार किया ही नहीं। लेकिन महुआ मोइत्रा इसके ठीक उलट ऐसे ऐसे मंहगे ब्रांड के लेडीज बैग की दीवानी हैं जिन ब्रांड्स का नाम भारत में बहुत धनी संपन्न लोग ही शायद जानते हों। इसलिए उन्होंने वह किया जो एक जनप्रतिनिधि से कोई उम्मीद नहीं कर सकता। परिणाम ये हुआ कि वो बदनाम भी हुईं और उनकी सांसदी भी चली गयी।

किसी से पैसा या लाभ लेकर सवाल पूछने का धब्बा अभी तक उन सांसदों पर ही लगता रहा है जिन्हें संसदीय गरिमा का भी अंदाज शायद नहीं रहा होगा। वह घटना भी दिसंबर की ही है। 12 दिसंबर 2005 को एक निजी टीवी चैनल पर प्रसारित ऑनलाइन समाचार साइट कोबरापोस्ट के एक स्टिंग ऑपरेशन में 11 सांसदों को संसद में सवाल उठाने के बदले नकद स्वीकार करते हुए दिखाया गया था।

Mahua Moitra Case: Debate necessary on corporate politician nexus

हालांकि यह मामला पूरी तरह से एक स्टिंग आपरेशन करनेवाले द्वारा प्रायोजित था फिर भी मामले में आरोपी 11 सांसदों को सदन से निकाल दिया गया था। इनमें से छह भाजपा से थे, तीन बसपा से और एक-एक राजद और कांग्रेस से थे। इनके नाम थे वाईजी महाजन (बीजेपी), छत्रपाल सिंह लोढ़ा (बीजेपी), अन्ना साहेब एमके पाटिल (बीजेपी), मनोज कुमार (आरजेडी), चंद्र प्रताप सिंह (बीजेपी), राम सेवक सिंह (कांग्रेस), नरेंद्र कुमार कुशवाहा (बीएसपी), प्रदीप गांधी (भाजपा), सुरेश चंदेल (भाजपा), लाल चंद्र कोल (बसपा) और राजा रामपाल (बसपा)।

उस समय इस मामले में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने यह कहते हुए विरोध जताया था कि संसद कंगारू कोर्ट बन गयी है। तब कांग्रेस सांसदों के आचरण को संसदीय गरिमा के खिलाफ मान रही थी और भाजपा इसे एक षड्यंत्र बता रही थी। आडवाणी ने यह तो माना था कि सांसदों ने जो किया वह भ्रष्टाचार है लेकिन इतने के लिए संसद से निकाल देना ज्यादा कठोर सजा कही जाएगी।

लेकिन इस बार जिस महुआ मोइत्रा के खिलाफ पैसा लेकर संसद में सवाल पूछने का आरोप लगा तो इसके पीछे कोई स्टिंग ऑपरेशन नहीं बल्कि उन्हीं के पुराने ब्वायफ्रेन्ड की सीबीआई में शिकायत थी। मामला खुला तो खुलता चला गया। महुआ मुंबई के हीरानंदानी समूह को लाभ पहुंचानेवाले सवाल पूछने के एवज में उनके पैसे से मंहगी शॉपिंग और विदेश की सैर किया करती थीं। सीबीआई को भेजी गई शिकायत में जय अनंत देहाद्राई ने उन सवालों का उल्लेख किया है जो महुआ ने संसद में हीरानंदानी समूह को फायदा पहुंचाने के लिए पूछे हैं। शिकायत के अनुसार महुआ ने 61 में से 50 सवाल दर्शन हीरानंदानी को फायदा पहुंचाने के लिए पूछे थे। देहद्राई की शिकायत में एक-एक कर कई सवालों का जिक्र है और उन सवालों से हीरानंदानी समूह को पहुंचने वाले लाभ का जिक्र इन दस्तावेजों में हैं।

अब सवाल यह उठता है कि आखिर उनके पुराने ब्वायफ्रेन्ड जय अनंत ने ऐसा किया क्यों? पुरानी अंतरंग मित्रता टूटने के कारण जो भी रहे हों, लेकिन यह जानकर और अधिक आश्चर्य होता है कि दोनों के बीच झगड़ा एक विदेशी नस्ल के कुत्ते को लेकर बहुत बढ़ गया। देहाद्राई ने महुआ मोइत्रा को वह कुत्ता गिफ्ट किया था। जब उनमें ब्रेकअप हुआ तो उसने अपना कुत्ता वापस मांग लिया। जब महुआ ने वापस नहीं दिया तो जय उसे जबरन ले गया। इस पर महुआ ने कुत्ता चोरी होने की एफआईआर भी करवा दी। सांसद होने का लाभ उठाकर पुलिस के दवाब से कुत्ता फिर से हासिल कर लिया। इससे दोनों की दुश्मनी ऐसी बढ़ी कि देहाद्राई ने महुआ का पोलिटिकल कैरियर ही चौपट कर दिया।

इन बातों को देख सुनकर सामान्य व्यक्ति के लिए यह समझना ही बड़ा मुश्किल है कि जिन्हें वो आम आदमी का नेता समझते हैं, दिल्ली पहुंचते ही कैसे वो कॉरपोरेट क्लास का हिस्सा हो जाते हैं। महुआ मोइत्रा तो फिर वैसे भी कॉरपोरेट कल्चर से ही पॉलिटिक्स में आई हैं। उनकी शुरुआती पढ़ाई कोलकाता से हुई उसके बाद वो आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका चली गयीं। उसके बाद न्यूयार्क और लंदन में एक फाइनेन्सियल फर्म जेपीमोर्गन में नौकरी भी की।

2009 में अचानक से उन्हें राजनीति में आकर जनसेवा का शौक चढ़ा। ये शौक उन्हें खुद चढ़ा या चढ़ाया गया, यह तो वही बेहतर जानती होंगी लेकिन इधर के कुछ दशकों में बड़े कॉरपोरेट फर्म में काम करके राजनीति में आनेवालों की संख्या बढ़ी है। महुआ भी उसी लहर पर सवार होकर राजनीति में आयी और कांग्रेस होते हुए तृणमूल में पहुंच गयीं। एक बार विधायक बनीं और अगली बार 2019 में सांसद बनकर दिल्ली पहुंच गयीं। संसद में उनकी पहचान एक ऐसे फायरब्रांड नेता की बन रही थी जो मॉडर्न विचारों की है। भाजपा और आरएसएस पर तीखे हमले करती हैं और एक खास कॉरपोरेट घराने को भी टार्गेट करती हैं।

तो क्या यह सब उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता और कौशल था या इसके पीछे की कहानी कुछ और थी? अब लाभ लेकर संसद में सवाल पूछने का दोष सिद्ध होने के बाद तो समझा ही जा सकता है कि वो किसी कंपनी के एजंडे को संसद में सवाल पूछकर पूरा कर रही थीं। उन्होंने संसद की वेबसाइट का अपना लॉगिन पॉसवर्ड तक हीरानंदानी समूह के लोगों को दे दिया था। मतलब उनके लिए संसद की गरिमा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण किसी कॉरपोरेट घराने को लाभ पहुंचाना था।

लेकिन जो लोग इनके पीछे पड़कर इनकी सच्चाई सामने लाये हैं, उनकी सच्चाई क्या है? दुर्भाग्य से उनका बैकग्राउण्ड भी कॉरपोरेट घरानों के जरिए ही राजनीति में घुसपैठ का रहा है। उन्होंने अपना लॉगिन पासवर्ड भले ही समर्थक कॉरपोरेट घरानों को न दिया हो लेकिन लुटियन दिल्ली का यह सच तो है ही यहां जो कॉरपोरेट-पॉलिटिशियन गठजोड़ होता है उसकी दोषी अकेली महुआ मोइत्रा ही तो नहीं है।

सांसद नीतियां और कानून बनाते हैं और कॉरपोरेट जगत उन्हें प्रभावित करने के उपाय करता है। दुनियाभर में इसे लॉबिंग कहा जाता है, भारत में इसे कॉरपोरेट लाइजनिंग कहते हैं। लुटियन जोन के आसपास मंहगे फाइवस्टार होटल ऐसी लाइजनिंग के लिए ही इस्तेमाल किये जाते हैं। आम आदमी या मध्यम वर्गीय व्यापारी की इतनी हैसियत कभी नहीं होती कि वह सरकारों को प्रभावित करके अपने हित में नीतियां बनवा ले। यह काम वह अपने जनप्रतिनिधियों के भरोसे छोड़ देता है। लेकिन वही जनप्रतिनिधि किसी कॉरपोरेट घराने का लाइजनर हो जाए तो?

महुआ मोइत्रा के बहाने ही सही इस कॉरपोरेट पॉलिटिशियन नेक्सस पर बहस होनी चाहिए। यह मामला इतना सीधा और सरल नहीं है कि पैसा लेकर संसद में सवाल पूछ लिया। यह उससे अधिक जटिल है। लुटियन जोन में कॉरपोरेट जगत का सीमांकन नहीं हुआ तो ऐसे न जाने कितने प्रायोजित सवाल संसद में पूछे जाते रहेंगे जिससे किसी न किसी कॉरपोरेट घराने का हित जुड़ा रहेगा। जो पकड़ा गया वो चोर बाकी सब ईमानदार की मानसिकता से बाहर निकलकर इस ग्लोबलाइजेशन के युग में आम आदमी के हक और हित को सुनिश्चित करना जनप्रतिनिधियों के लिए ज्यादा बड़ी जिम्मेवारी है।

जनता सिर्फ वोट देने का उपकरण नहीं है जिनसे पांच साल में एक बार जीत का प्रमाणपत्र लेकर फिर बाकी समय किसी कॉरपोरेट घराने की लॉबिंग करना है। किसी सांसद या विधायक के लिए यह वैधानिक प्रश्न भी है और नैतिक प्रश्न भी। हर सांसद विधायक को इस बारे में जरूर सोचना चाहिए कि वह किसका प्रतिनिधि है और किसके लिए काम करना है।

बहरहाल महुआ मोइत्रा को एथिक्स कमेटी के सामने अपना पक्ष रखने का मौका तो मिला लेकिन संसद में उन्हें बोलने की अनुमति नहीं दी गयी। यही उचित भी था। वो संसद की कार्यवाही को अपने पोलिटिकल माइलेज के लिए इस्तेमाल करतीं। लेकिन संसद से बाहर विपक्ष की मौजूदगी में जिस तरह से अपने भ्रष्टाचार को स्वीकार न करते हुए वीरांगना बनने का प्रयास किया है वह और भी निंदनीय है। कॉरपोरेट लॉबिंग के लिए हर हद पार कर देनेवाली महुआ का दोषसिद्ध होने के बाद संसद से निष्कासन तो एथिक्स कमेटी के हाथ में था लेकिन ऐसे नेताओं को टिकट न देना तो पार्टियों के हाथ में है। उम्मीद करनी चाहिए कि ममता बनर्जी अगले लोकसभा चुनाव में महुआ से अपने आप को दूर कर लेंगी।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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