Mahashivratri: इष्ट की पूजा से अभीष्ट की प्राप्ति का उत्सव है महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि इष्ट की पूजा से अभिष्ट की सिद्धि का उत्सव है। भौतिक व आध्यात्मिक विकास के लिए महाशिवरात्रि खगोल विद्या के दृष्टिकोण से परम प्रभावी तिथि है।

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महाशिवरात्रि की रात महासिद्धिदायिनी होती है। इस रात चार प्रहर के पूजन का विशेष महात्म्य है। यह पूजा प्रदोष काल से आरंभ होकर रात के चारों प्रहर में चलती है। महाशिवरात्रि पर रात्रि जागरण के विशिष्टार्थ को इस पंक्ति से समझा जा सकता है - 'या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥

अर्थात् जब संपूर्ण प्राणी अचेतन होकर नींद में सो जाते हैं तो जिसने उपवासादि द्वारा इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया हो, वह जाग कर अपने कार्यों को पूर्ण करता है। इसका कारण यह है कि साधना सिद्धि के लिए जिस एकांत और शांत वातावरण की आवश्यकता होती है, वह रात्रि से ज्यादा बेहतर और क्या हो सकती है?

शिव एकमात्र हैं जिनकी आराधना किसी भी समय की जा सकती है। जिसमें कोई निषेध नहीं है। अन्य देवों की पूजा-अर्चना दिन में होती है, किन्तु शिवरात्रि घोर तमस की रात्रि होती है। महाशिवरात्रि के अतिरिक्त प्रत्येक माह की कृष्ण चतुर्दशी को मास शिवरात्रि कहा जाता है। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि मनायी जाती है। मान्यता है कि भगवान शिव संहारक शक्ति हैं, जिनका गुण तमोगुण है। रात्रि तमोगुणी संहार काल की प्रतिनिधि है। जो प्रकाश की समाप्ति में व्यापक विस्तार पाती है। जीव जगत में चैतन्यता क्षीण होने लगती है।

महाशिवरात्रि पूजन में- पहले प्रहर में शिव के ईशान स्वरूप का पूजन किया जाता है। इसके लिए दूध का प्रयोग होता है। दूसरे प्रहर में अघोर स्वरूप का पूजन होता है। जिसमें दही का प्रयोग किया जाता है। तीसरे प्रहर में वामदेव रूप का, जिसमें घृत का प्रयोग करने का विधान है। और चौथे प्रहर में सद्योजात स्वरूप का अभिषेक व पूजन किया जाता है जिसमें मधु प्रयोग करना होता है।

महाशिवरात्रि को शिव शक्ति के मिलन की रात्रि कहा जाता है। विवाह का अर्थ परिणय 'परि = चारों ओर, णय= बांधना' होता है। संक्षेप में कहा जाय तो महाशिवरात्रि पार्थिव और ऊर्जा के परिणय की रात्रि है। जिस दौरान सृष्टि में घोर अंधकार रहता है, चंद्रमा की ऊर्जा अत्यंत क्षीण होती है, उस काल में अपने तत्व और ऊर्जा के सीधी रेखा में आने की क्रिया अधिक प्रभावी होती है।

अध्यात्म चिकित्सा हमें चंद्र ऊर्जा से प्राप्त लाभों के बारे में बताती है। यह खगोलीय पिंड बिना उत्तेजित हुए, सूर्य की जीवंत शक्तियों को प्रतिबिंबित करता है। कई सारे उपाय ऐसे हैं जो मन और शरीर के उपचार हेतु, विशेष रूप से अमावस्या और पूर्णिमा के बीच, शारीरिक गर्मी, क्रोध और असंतुलन को शांत करने का एक प्रभावी तरीका बताते हैं। किन्तु कृष्ण चतुर्दशी की विशिष्ट रात्रि, मनः दैहिक के आगे चेतना के संरेखण के लिए उपाय करने का समय होता है। हमारे शरीर रूपी पिण्ड में, सभी तत्व में और इस सृष्टि में ऋत् के नियमों के अनुरूप, समय के पैटर्न मौजूद हैं। यही हमारी कालगणना वैदिक कैलेंडर का आधार है, जो हमें सूचित करती है कि हम खुद को आकाशीय पिंडों के चक्र के साथ कैसे लयबद्ध कर सकते हैं। प्रकृति के चक्रों और सतत लयबद्ध प्रभावों से जीना, हमारे जीवन को मंगलमय बनाता है।

इसे यदि हम खगोलीय गणना के आधार पर समझने का प्रयास करें तो कृष्ण चतुर्दशी काल में चीज़ों को सहेजने की अद्भुत क्षमता है। इस रात्रि में आध्यात्मिक ऊर्जा संरक्षण अन्य किसी काल में नहीं हो सकता है। चंद्रमा पृथ्वी का निकटतम पिण्ड है। इसमें प्रबल चुम्बकीय बल है। हम सब जानते हैं कि यह समुद्री जल को भी अपनी ओर खींच देता है। और जब यह पृथ्वी से कुछ दूर चला जाता है तो पुनः वही जल बहुत भयानक गति से वापस आता है। जिस कारण समुद्र में ज्वार भाटा आता है।

एक शक्तिशाली चुंबक की भांति ही चन्द्रमा के दोनों सिरों पर अधिक चुंबकीय शक्ति होती है। पूर्णिमा को यह गोल होता है। उसके अतिरिक्त यह अर्द्ध गोलाई में घटता-बढ़ता है। द्वितीया और चतुर्दशी इसके बाद सबसे अधिक प्रभावित करने वाले समय हैं। द्वितीया को यह बिल्कुल पतला होता है, इसे भौतिक रूप से हानिकारक बताया गया है। द्वितीया के चन्द्रमा को प्रणाम करने के लिए शरीर में धातु विशेषकर स्वर्ण आभूषण पहनने की प्रथा है। स्वर्ण की चमकदार आभा से चंद्रमा की अतिरिक्त ऊर्जा परावर्तित हो जाती है और परम लाभकारी ऊर्जा शरीर में अवशोषित हो जाती है। परावर्तित करने की क्षमता तो दर्पण में ज्यादा होती है, किन्तु दर्पण विद्युत् या ऊष्मा का कुचालक होता है। इसलिए उससे केवल प्रकाश का परावर्तन ही हो पाता है. किन्तु चन्द्रमा की किरणों की लाभकारी ऊर्जा शरीर को नहीं मिल पाती।

यही कारण है कि चंद्रमा की पूजा वाले पर्व में महिलाओं के लिए शरीर के अष्टांग हृदय से संबंधित आभूषण पहनने की परंपरा बनी है। चन्द्रमा सुधांशु है। इस पर अमृत पाया जाता है, साथ ही इसकी सतह पर अनेक अमोघ औषधियों की उपस्थिति भी है। कहा गया है - "यातीति एकतो अस्त शिखरं पतिरोषधीनाम आविषकृतो अरुण पुरः सरः एकतो अर्कः।

द्वितीया के विपरीत चतुर्दशी की चन्द्र शक्ति आध्यात्मिक ऊर्जा को धारण करने के लिए महत्वपूर्ण है। इसी के मध्य संसार का उत्थान एवं पतन चक्र है। शिव, चंद्रमा को धारण करते हैं जो 'आधा' है। यह संतुलन का प्रतीक है।

महाशिवरात्रि पर रात्रि जागरण का महत्व यहीं से समझा जा सकता है। यह हमारे इष्ट शिव के शक्ति से मिलन की रात्रि है। पदार्थ और ऊर्जा के समन्वय उनके परिणय की रात्रि है। पौराणिक मान्यता में कहा गया है कि महाशिवरात्रि की रात भगवान शिव ने तांडव नृत्य किया था। यह नृत्य सृजन और विनाश दोनों की अभिव्यक्ति है। भौतिक व आध्यात्मिक एकीकरण और विकास के लिए महाशिवरात्रि खगोल विद्या के दृष्टिकोण से परम प्रभावी तिथि है।

भारतीय ज्ञान परम्परा बहुआयामी आधार पर कसी जा सकती है। इस दर्शन में अंततः मानव कल्याण के सिद्धांत समाहित हैं। यह इष्ट की पूजा से अभीष्ट की सिद्धि की प्राप्ति के उपाय व विधियों को सार्वजनिक करता है। अत: महाशिवरात्रि आध्यात्मिक जागरण के जरिए हमारे जीवन में संतुलन बनाने और उन्नति के मार्ग को प्रशस्त करने का उत्सव है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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