Maharashtra Politics: शरद पवार ने शतरंजी चाल से शिवसेना को पछाड़ा
तिकड़मी राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी शरद पवार ने कुशल रणनीति के तहत शिव सेना को पहले हिंदुत्ववादी राजनीति से अलग करके कमजोर किया, फिर उसके टुकड़े होने दिए। अब मराठा वोटों के लिए शरद पवार की एनसीपी की राह आसान होगी।

Maharashtra Politics: महाराष्ट्र में ऑपरेशन शरद पवार शुरू हो चुका है| कांग्रेस और शिवसेना को पीछे छोड़कर शरद पवार आगे निकल गए हैं| उद्धव ठाकरे की सरकार गिरने के बाद एनसीपी प्रमुख विपक्षी पार्टी बन गई है| जबकि 2019 के चुनाव नतीजों में एनसीपी तीसरे नंबर की पार्टी थी| अगले विधानसभा चुनाव में शरद पवार का लक्ष्य इन दोनों पार्टियों को पीछे छोड़ कर भाजपा के बाद दूसरे नंबर की पार्टी बनना है| ताकि अगर महा विकास आघाडी की सरकार बने तो मुख्यमंत्री पद पर एनसीपी का दावा हो, और अगर सरकार न बने, तो शिवसेना टूटने के बाद मिला प्रमुख विपक्षी पार्टी का दर्जा हासिल रहे|

महाराष्ट्र में मराठी वोटरों को लेकर शिव सेना और एनसीपी दोनों की दावेदारी रही है, लेकिन 1999 को छोड़कर दोनों पार्टियों का वोट प्रतिशत भी लगभग बराबरी का रहा| 1999 में जब एनसीपी पहली बार चुनाव लड़ी थी, तो उसे 22.6 प्रतिशत वोट और 58 सीटें मिलीं थीं| पिछले विधानसभा चुनाव में शिवसेना को 16.41 प्रतिशत वोट और 56 सीटें मिली थीं, तो एनसीपी को 16.71 प्रतिशत वोटों के साथ 54 सीटें मिली थीं| यानी एनसीपी और शिवसेना में बराबर की टक्कर थी और मराठा वोटों के लिए दोनों पार्टियां प्रतिस्पर्धा में रहती हैं| तो सवाल यह खड़ा हो रहा है कि क्या शरद पवार ने शिवसेना को कमजोर करने के लिए उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनवाने का दांव खेला था|
शरद पवार भले ही प्रधानमंत्री पद के सिर्फ उम्मीदवार ही बने रह गए, कभी वह लक्ष्य हासिल नहीं कर सके, लेकिन वे राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी हैं| कांग्रेस छोड़ने के तीन साल बाद 2002 में उपराष्ट्रपति पद पर भाजपा के उम्मीदवार भैरोसिंह शेखावत को जितवाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी| भैरोशिंह शेखावत के सामने महाराष्ट्र के सुशील कुमार शिंदे उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार थे| पवार ने नजमा हेपतुल्ला के घर पर बैठ कर कई कांग्रेसी सांसदों को शेखावत को वोट देने के लिए राजी किया था|
1999 में एक वोट से वाजपेयी सरकार गिरने के बाद जब उन्होंने विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस छोड़कर एनसीपी बनाई थी, तो किसने सोचा था कि एक दिन देश में कांग्रेस इतनी कमजोर हो जाएगी कि विपक्षी एकता के लिए लोग शरद पवार की तरफ देखेंगे| अगर शरद पवार ने एनसीपी नहीं बनाई होती, तो उन्हें अपनी या अपनी बेटी की लोकसभा सीट बचाना ही मुश्किल हो जाता| आज वह अपने गृह राज्य महाराष्ट्र में कांग्रेस को पीछे छोड़कर आगे निकल चुके हैं|
उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में उसी कांग्रेस से बराबरी के स्तर पर गठबंधन किया, जिसे उन्होंने विदेशी मूल के मुद्दे पर ठुकराया था| दोनों पार्टियों ने 125-125 सीटों पर चुनाव लड़ा था| गठबंधन से एनसीपी को ज्यादा फायदा हुआ| कांग्रेस 42 सीटों से बढ़ कर 44 पर आ गई थी, लेकिन एनसीपी 41 से बढ़कर 54 पर पहुंच गई थी| इसी कारण आज महाराष्ट्र में कांग्रेस नहीं, बल्कि एनसीपी प्रमुख विपक्षी दल है| यानी महा विकास आघाड़ी को शरद पवार ही लीड करेंगे| शरद पवार ने नेतृत्व संभालने का यह लक्ष्य उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनवा कर और शिव सेना का विभाजन करवा कर हासिल किया है|
1999 में जब एनसीपी ने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा था, तो वह भाजपा से आगे निकल गई थी| तब भाजपा 56 सीटों के साथ चौथे नंबर की पार्टी थी, और एनसीपी 58 सीटों के साथ तीसरे नंबर की पार्टी थी| कांग्रेस 75 सीटों के साथ पहले नंबर की पार्टी बनी हुई थी और 69 सीटों के साथ शिवसेना दूसरे नंबर पर थी| बीस साल बाद 2019 के चुनाव बाद बनी विधानसभा में स्थिति एक दम बदल चुकी है।
1999 में पहले नंबर की कांग्रेस 44 विधायकों के साथ अब चौथे नंबर पर है, और चौथे नंबर की भाजपा 105 विधायकों के साथ अब पहले नंबर पर है| चुनावों में तीसरे नंबर पर आई एनसीपी शिवसेना टूटने के बाद अब विधानसभा में दूसरे नंबर की पार्टी है| उद्धव सरकार बनने से सबसे ज्यादा फायदा एनसीपी और शरद पवार को हुआ और सबसे ज्यादा नुकसान शिवसेना और उद्धव ठाकरे को हुआ|
इसलिए जब चुनाव आयोग ने उद्धव ठाकरे से उनकी पार्टी का नाम शिवसेना और चुनाव निशान धनुष बाण छीन कर एकनाथ शिंदे को दे दिया, तो शरद पवार ने उद्धव ठाकरे की तरह चुनाव आयोग की आलोचना नहीं की| बल्कि कहा कि उद्धव ठाकरे को नए नाम और नए निशान के साथ आगे बढ़ना चाहिए| अब आने वाले किसी भी चुनाव में शिवसेना के मराठी वोटों का विभाजन शरद पवार को पुन: बड़े मराठी लीडर के तौर पर स्थापित करेगा|
महाराष्ट्र की ऐसी 55-60 सीटें है, जहां पर 1999 से ही एनसीपी और शिवसेना की आमने सामने टक्कर हुआ करती थी| पहली बार दोनों दल मिलकर चुनाव लड़ेंगे, तो उन 55-60 सीटों पर दोनों दलों की दावेदारी होगी| लेकिन फिलहाल शरद पवार ने इस साल होने वाले दस महानगर पालिकाओं के चुनावों और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की शिवसेना से आगे निकलने की मुहिम शुरू कर दी है| जहां एक तरफ उद्धव ठाकरे की शिवसेना कमजोर पड़ गई है और कांग्रेस आपसी फूट का शिकार है, तो महा विकास आघाड़ी में इन दोनों दलों से आगे निकलने का यह स्वर्णिम मौक़ा है|
मौक़ा देख इस उम्र में भी उन्होंने महाराष्ट्र के दौरे तेज कर दिए हैं| युवा मराठाओं में पार्टी की पैठ बनाने के लिए वह अपने पोते रोहित पवार को आगे ला चुके हैं, और उनके दौरे भी तेज हो गए हैं| पवार का लक्ष्य महाराष्ट्र में सत्ता हासिल करने की बजाए एनसीपी की ताकत बढ़ाने का है, ताकि उनके बाद उनका कुनबा राजनीति में वर्चस्व बनाए रख सके| वह इस दिशा में रणनीति के तहत गोटियाँ फिट कर रहे हैं।
अपनी लोकसभा सीट उन्होंने अपनी बेटी के लिए खाली कर दी थी| अपने भतीजे अजीत पवार को वह बहुत पहले ही आगे ला चुके थे, उन्हें ही उपमुख्यमंत्री बनाया गया था| अपने भाई के पोते रोहित को वह पिछ्ला विधानसभा चुनाव लड़वा कर विधायक बनवा चुके हैं| इसके अलावा अपनी जगह पर इंडियन शूगर मिल एसोसिएशन का अध्यक्ष भी बनवा दिया है| रोहित को मराठा युवाओं को लुभाने का जिम्मा सौंपा गया है, ताकि पार्टी में नया खून जगह पा सके|
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बाल ठाकरे की गलती से सबक सीख कर वह अपने पारिवारिक वारिसों में संतुलन बनाकर चल रहे हैं| बाल ठाकरे के जीवित रहते ही शिवसेना विभाजित हो गई थी, क्योंकि उन्होंने पुत्र मोह में राजनीति में ज्यादा सक्रिय अपने भतीजे राज ठाकरे का दावा खारिज करके उद्धव ठाकरे को पार्टी प्रमुख बना दिया था| अगर लोकसभा चुनावों और अगले विधानसभा चुनाव तक मौजूदा राजनीतिक समीकरण बने रहते हैं, तो इसका फायदा भाजपा और एनसीपी को होगा, जबकि कांग्रेस और शिवसेना के दोनों गुट कमजोर होंगे| वैसे यह ट्रेंड 2019 में ही शुरू हो चुका था|
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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