Maharana Pratap Jayanti: आधुनिक इतिहास लेखन में महाराणा प्रताप को महत्त्व क्यों नहीं दिया गया?
भारतीय इतिहास में महाराणा प्रताप जैसे शूरवीर योद्धा हुए हैं जिनका विशेष महत्व है। हमारे इतिहास को विदेशी हमलावरों की दृष्टि से देखना बंद करना चाहिए।

Maharana Pratap Jayanti: आजकल भारत में जब भी इतिहास पर चर्चा होती है, तो निगाहें हमेशा मुगलों के कालखंड पर आकर ही क्यों टिक जाती है? यह बात ठीक है कि मुगलों ने उत्तर भारत पर दो शताब्दियों तक शासन किया लेकिन उनके अलावा भी भारत का एक इतिहास है, जिस पर वास्तव में ध्यान देने की जरुरत है। दरअसल, यह इतिहास उन शूरवीरों का है, जिन्होंने अपने शौर्य, बलिदान एवं त्याग से एक नहीं बल्कि कई महानतम मिसालें कायम की। इन्ही में से एक थे, मेवाड़ के महाराणा प्रताप।
राजस्थान और राजपूतों के इतिहास में महाराणा प्रताप का भरपूर जिक्र मिल जायेगा, लेकिन यह इतिहास वहां से निकलकर देश के दूसरे हिस्सों और आम जनमानस में कितना लोकप्रिय हुआ? यह एक बड़ा सवाल है। साथ ही कहीं ऐसा तो नहीं है कि इतिहास के इस हिस्से को जानबूझकर विवादित अथवा अलोकप्रिय बनाने के प्रयास किये गये?
इसकी पड़ताल के लिये हमें उस दौर में जाना होगा जब 1947 में देश आजाद हुआ। ब्रिटिश औपनिवेशिक गुलामी से मिली इस राजनैतिक स्वतंत्रता ने तत्कालीन नीति-निर्माताओं को मौका दिया कि वह अब भारतीय नागरिकों को भी इस गुलामी की मानसिकता से भी उबारे। इसके लिये शिक्षा एक सबसे सरल और सुगम माध्यम था। मगर दुर्भाग्य ऐसा रहा कि देश के तत्कालीन इतिहासकारों ने शैक्षिक पुस्तकों में भारतीय नायकों की अनदेखी और विदेशी हमलावरों की प्रशंसा करनी शुरू कर दी। गौरतलब है कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी इसी मानसिकता से ग्रस्त थे।
उदाहरण के लिए, नेहरू ने अपनी पुस्तक 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' में अकबर का जिक्र लगभग 32 बार किया है और महाराणा प्रताप का मात्र दो बार। हालांकि उन्होंने महाराणा की वीरता का तो जिक्र किया है। मगर अकबर का उल्लेख जरुरत-से-ज्यादा इतनी बार कर दिया है कि पूरी पुस्तक में महाराणा एकदम नगण्य हो जाते हैं। यह पुस्तक 1944 में लिखी गयी और 1946 में प्रकाशित हुई थी।
इसके बाद इसे संयोग कहें अथवा विडम्बना, लेकिन इसी परंपरा को बाद के इतिहासकारों ने अपने लेखन में कायम रखा। चाहे वह एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम हो या विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकें, सभी में इसी मानसिकता के साथ उस दौर के इतिहास को लिखा गया।
अब उन इतिहासकारों में कौन और किस तरह के लोग शामिल थे, यह भी आपको जानना चाहिए। जैसे मुगलों पर ही इतिहास को केन्द्रित करने वाली विसंगति के पैरोकारों में इरफान हबीब का नाम सबसे ऊपर आता है। एकबार उन्हें सरकारी स्कॉलरशिप के माध्यम से विदेश जाना था लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उनकी इस यात्रा पर रोक लगा दी। कारण बताया गया कि कम्युनिस्ट पार्टी से उनके सम्बन्ध हैं। फिर इस मामले में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के तत्कालीन वाइस-चांसलर जाकिर हुसैन ने हस्तक्षेप किया और इरफान हबीब को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मिलने दिल्ली भेजा।
दिल्ली में प्रधानमंत्री ने हबीब से मुलाकात की। इसके बाद प्रधानमंत्री नेहरू ने 12 अगस्त 1955 को इस मुलाकात पर अपने विचार जाकिर हुसैन को एक पत्र लिखकर बताये। उन्होंने कहा, "इरफान हबीब मुझसे सुबह मिलने आये थे और मेरी उनसे बातचीत हुई। आपने मुझे जब उनके बारे में बताया तो लिखा था कि वह एक जवान लड़का है जोकि झुकाव और विचारों से वामपंथी है लेकिन वह कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य नहीं है। मगर मेरी अपनी जानकारी के मुताबिक वह कुछ समय तक और अभी भी कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य है और उसकी गतिविधियों में हिस्सा लेता रहा है। यही नहीं, विश्वविद्यालय में उसपर कोई कार्यवाही भी हुई थी। इरफान ने मुझे यह सब बताया है।"
प्रधानमंत्री ने आगे लिखा कि "अब सवाल पैदा होता है कि उसे सरकारी स्कॉलरशिप दी जानी चाहिए या नहीं? सरकारी स्कॉलरशिप का उद्देश्य उस व्यक्ति को प्रशिक्षित करना है जो भविष्य में विवेक तथा अखंडता से देश की सेवा करे। तो जाहिर है इस व्यक्ति से यह उद्देश्य पूरा नहीं होगा।" हालांकि, अपने इस विश्लेषण के बावजूद भी जाकिर हुसैन के कहने पर प्रधानमंत्री ने शिक्षा मंत्रालय से इरफान हबीब को स्कॉलरशिप दिलवाने की स्वीकृति दे दी।
अब देखिये, एक तरफ प्रधानमंत्री थे जोकि खुद मुगलों के चलते दूसरे नायकों को सम्मान नहीं दे रहे थे। दूसरी ओर ऐसे कथित इतिहासकारों को सरकारी स्कॉलरशिप दी गयी जो इतिहास से ज्यादा कम्युनिस्ट पार्टी की राजनैतिक गतिविधियों में अधिक सक्रिय रहा करते थे और उनपर खुद प्रधानमंत्री भी विश्वास नहीं करते थे। इस पूरे घालमेल का नुकसान भारतीय इतिहास और उसके महान नायकों को हुआ, जिसमें महाराणा प्रताप भी शामिल थे।
अब इसका प्रभाव क्या पड़ता है, उसे समझने की कोशिश करते है। साल 2013 में राज्यसभा सांसद और पत्रकार भरत कुमार राउत ने सदन के समक्ष एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया। उनका कहना था कि "सीबीएसई के पाठ्यक्रम में सातवीं से बारहवीं कक्षा तक इतिहास के दो हजार पन्ने सिखाये जाते हैं। उसमें मराठा इतिहास का डेढ़ पन्ना शामिल है। जबकि महाराणा प्रताप का जिक्र एक लाइन में खत्म हो जाता है।" इस पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने भी संज्ञान लेते हुए अपनी गलती सुधारने की बात कही थी।
यानी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार को यह समझ में आ चुका था कि गलती हुई है। फिर भी कोई बदलाव नहीं हुआ। होता भी कैसे? क्योंकि इस विसंगत इतिहास के कदम तो किताबों से बाहर निकलकर हमारे चारों ओर फैल चुके थे। जिसके उदाहरण देश की राजधानी दिल्ली में हर जगह मिल जायेंगे। जैसे यहां एक 'अकबर रोड' है जो इंडिया गेट से शुरू होकर प्रधानमंत्री आवास के पिछले गेट पर आकर खत्म होती है। ऐसे ही 1970 में केंद्र सरकार ने दिल्ली में 'अकबर होटल' बनाया जोकि बाद में सरकारी कामकाज हेतु 'अकबर भवन' में बदल दिया गया।
आज महाराणा प्रताप के नाम से देश की राजधानी में कोई महत्वपूर्ण सड़क अथवा भवन नहीं है। वास्तव में अब जरुरत है कि महाराणा प्रताप सहित अन्य भारतीय नायकों को भारतीय इतिहास और वैचारिक प्रबोधन सहित अन्य अवयवों में सम्मानजक स्थान दिया जाये। साथ ही उनका किसी मुगल और अन्य विदेशी हमलावरों के साथ नाम जोड़कर उन्हें विवादित करने से भी रोका जाये। इसका असर यह होता है भारतीय नायक सिर्फ युद्ध और उसके आसपास की घटनाओं तक ही सीमित होकर रह गये है। उनके जीवन के मूल्यों एवं आदर्शों की कोई चर्चा नहीं होती। जबकि उनका भारतीय संस्कृति और परम्पराओं में योगदान रहा है और उन्हें अब उस दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए।
इस सन्दर्भ में सरदार पटेल का एक बेहतरीन उदाहरण मिलता है। साल 1948 में जब जयपुर, जोधपुर, जैसलमेर और बीकानेर को मिलाकर राजस्थान का गठन हुआ तो देश के इस लौह-पुरुष ने बिना किस मुगल बादशाह का नाम लेकर कहा था कि राजस्थान को एकजुट करने का महाराणा प्रताप का सपना अब जाकर पूरा हुआ है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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