Mafia in UP: मिट्टी में क्यों नहीं मिल पाते यूपी के माफिया?
उमेश पाल की हत्या के बाद योगी आदित्यनाथ ने यूपी में माफियाओं को मिट्टी में मिलाने की बात कही है। लेकिन क्या कारण है कि चार दशक से यूपी के माफिया में मिट्टी में मिलने की बजाय यूपी की धरती पर 'राज' कर रहे हैं?

Mafia in UP: अपराध रोकने का सबसे कारगर तरीका है लोकनिंदा। भारत की सामाजिक व्यवस्था में नैतिकता और सत्य का ऐसा वास है कि पुलिस प्रणाली लागू होने के लगभग डेढ सौ साल बाद भी लोकनिंदा ही अपराध रोकने का सबसे बड़ा पहरेदार है। भारतीय समाज में कोई भी अनैतिक या आपराधिक होने से इसलिए डरता है क्योंकि उसे लोकनिंदा का भय होता है। लेकिन बीते कुछ दशकों में उत्तर भारत के कुछ राज्यों में हिंसा, अपराध को इस तरह से महिमामंडित किया गया है कि माफिया होना अपमान का नहीं सम्मानजनक शब्दावली का हिस्सा हो गया है।
इसके सबसे बड़े शिकार उत्तर प्रदेश और बिहार हैं। 'स्वतंत्रता का खुमार' उतरने और सन सतहत्तर में 'लोकतंत्र की लड़ाई' जीतने के बाद भी सामाजिक हालात में सुधार न होने के साथ ही अस्सी के दशक में ऐसे बाहुबली पैदा होने लगे जो 'न्याय' और 'अन्याय' के बीच दीवार बनकर खड़े हो गये। गोरखपुर के हरिशंकर तिवारी घोषित तौर पर ऐसे पहले माफिया कहे जा सकते हैं जिनके नाम की चर्चा अपमान की बजाय सम्मान से होने लगी। पूर्वांचल के दूर दराज के गांवों में उनसे जुड़ी कहानियां इस तरह प्रचलित हुईं मानों वो एक अपराधी न होकर कोई देवदूत हों।
कुछ ऐसा ही बिहार में हुआ जब मूलत: बलिया के रहनेवाले कोयला माफिया सूर्यदेव सिंह एक नये हीरो बनकर उभरे। उनके पास पैसा था, उनका अपना साम्राज्य था और चंद्रशेखर जैसा नेता उनके साथ रिश्तों की बात सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करते थे। स्वाभाविक है जिसने सूर्यदेव सिंह को देखा नहीं, उनके द्वारा करवाई जाने वाली आपराधिक हत्याओं को नहीं देखा, उनके लिए सूर्यदेव सिंह इस लोक के व्यक्ति तो लगते नहीं थे।
यूपी में हरिशंकर तिवारी और बिहार में सूर्यदेव सिंह से जो शुरुआत हुई तो वह आज मुख्तार अंसारी, ब्रजेश सिंह, धनंजय सिंह, प्रेम प्रकाश सिंह अर्थात मुन्ना बजरंगी, अभय सिंह, विजय मिश्र, बबलू श्रीवास्तव, अतीक अहमद जैसे लोगों की पूरी पीढ़ी बन गयी। इस लिस्ट में एक नाम राजा भैया का भी चढ़ा लेकिन समय रहते वो राजनीति की दुनिया में चले और अपराध से ज्यादा राजनीतिक कारणों से चर्चा में आने लगे।
पूर्वांचल के इलाके में इन गुण्डों, अपराधियों को घृणा या अपमान की दृष्टि से देखने की बजाय आकर्षण और सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। इन्हें देखने तक के लिए लोगों की लाइन लग जाया करती है। कभी मुख्तार गैंग का शूटर रहा ब्रजेश सिंह जो बाद में उसका विरोधी बन गया, वह जब बनारस की कचहरी में पेशी पर आता तो लोगों की लाइन लगती थी उसे देखने के लिए। कचहरी में उस दिन इतनी गहमागहमी रहती कि ज्यादातर केसों में डेट लग जाती। वकीलों की फौज उस दिन सिर्फ ब्रजेश सिंह को देखने, उसके कारनामों की चर्चा करने में व्यस्त रहती।
कुछ ऐसा ही हाल धनंजय सिंह का है। ये लोग जब अदालतों में पेश होते हैं तो इनके साथ गाड़ियों का लंबा काफिला, भारी पुलिस बल और इनके अपने लोगों का पूरा नेटवर्क आसपास बिखरा रहता है। कुल मिलाकर उनके आसपास ऐसा माहौल बन जाता है जैसा कि फिल्मों में ही देखने को मिलता है। एक ही रंग की दस बीस मंहगी गाड़ियों के काफिले में चलना माफिया या बाहुबली होने की पहली निशानी होती है। अपने आसपास दस बीस हथियारबंद लोगों को रखना और किसी खास ड्रेस कोड में ही हमेशा नजर आना, इन्हें एक 'स्वयंभू राजा' के तौर पर लोगों के दिलों में बिठा देता है।
फिर, इन सबकी रॉबिनहुड वाली छवि होती है। आमतौर पर जिसे सरकारी व्यवस्था में कहीं से 'न्याय' नहीं मिलता उन्हें ऐसे ही किसी माफिया या बाहुबली की शरण में जाने की सलाह दी जाती है। मुख्तार अंसारी के घर को गाजीपुर में 'फाटक' कहा जाता है। मुख्तार अंसारी के आपराधिक चेहरे के उलट यहां सभी जाति धर्म के लोगों की समस्याओं का समाधान किया जाता है। गाजीपुर में कहा भी जाता है कि जिसे किसी दरवाजे पर न्याय नहीं मिलता, उसे फाटक से न्याय मिल जाता है।
जौनपुर के धनंजय सिंह की आसपास के पच्चीस पचास किलोमीटर तक ऐसी धमक है कि लोग 'उनके' नाम पर अपना काम कर लेते हैं। अगर कोई धनंजय सिंह का करीबी बन जाए या एक बार उनके घर चला जाए तो ये बात वो हमेशा लोगों को बताता रहता है कि धनंजय सिंह से उसका कितना करीबी रिश्ता है।
लेकिन इन सामाजिक कारणों तक ही ये बाहुबली सीमित नहीं हैं। इनका अपना आर्थिक साम्राज्य इतना बड़ा होता है कि हर महीनें लाखों रूपये ये लोगों पर खर्च करते हैं। अपनी इसी अहमियत के कारण ये माफिया या बाहुबलि राजनीतिक दलों में भी अपनी घुसपैठ बनाते हैं। राजनीतिक दल भी जानते हैं कि माफियाओं का साथ उन्हें कितनी "मदद" कर सकता है। जिसके पास धनबल, बाहुबल और जनबल तीनों हो, उसे राजनीतिक दल भला अपने साथ क्यों मिलाकर रखना नहीं चाहेंगे?
माफियाओं का सबसे ज्यादा संगसाथ छोटे या क्षेत्रीय दलों को ही पसंद आता है। इसका कारण ये है कि इन क्षेत्रीय दलों की राजनीति स्थानीय स्तर तक सीमित होती है और वो अपने लाभ के आगे राष्ट्रीय 'लोकलाज' की ज्यादा परवाह नहीं करते। फिर माफियाओं को 'माननीय' होने की ललक होती है। वो जानते हैं कि अगर एक बार वो या उनके परिवार से कोई विधायक, सांसद, जिला पंचायत अध्यक्ष बन गया तो उसे चतुर्दिक सुरक्षा प्राप्त हो जाती है। शासन प्रशासन खुलकर उसके साथ हो जाता है और उसे कोर्ट कचहरी के केसों में भी इसका लाभ मिलता है। एक अपराधी के तौर पर मारे जाने से भी उसका बचाव हो जाता है।
योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने तो इन्होंने माफियाओं के खिलाफ अभियान की शुरुआत की। छुटभैया गुण्डों, अपराधियों का या तो एनकाउण्टर कर दिया गया या फिर उन्होंने खुद ही पुलिस प्रशासन के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। लेकिन योगी के इस सफाई अभियान पर भी स्थानीय लोग आरोप लगाते हैं कि जानबूझकर मुस्लिम माफियाओं को ही निशाना बनाया जा रहा है। विजय मिश्र जैसे हिन्दू माफिया पर योगी शासन में कार्रवाई हुई लेकिन योगी के ही शासन में ब्रजेश सिंह जमानत पर जेल से छूट गये तो धनंजय सिंह बेखौफ बाहर घूम रहे हैं। हत्या जैसे संगीन अपराधों में भी ब्रजेश सिंह को 'सरकारी पक्ष की कमजोर पैरवी' का लाभ मिला और अब वो आजाद हैं।
हरिशंकर तिवारी, विजय मिश्र, विकास दूबे जैसे माफियाओं के घरों पर बुलडोजर चलाने तथा धनंजय सिंह, अभय सिंह या फिर ब्रजेश सिंह जैसे माफियाओं के घरों को "खुला छोड़ देने" के कारण योगी पर जातिवादी होने के आरोप भी लगते हैं। ये आरोप वैसे ही हैं जैसे अखिलेश पर मुख्तार अंसारी या फिर अतीक अहमद को संरक्षण देने का है।
आरोप प्रत्यारोप तो राजनीतिक चाल हो सकती है, या फिर जातीय वैमनस्य भी लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश की जमीन पर माफिया एक ऐसी सच्चाई हैं जिन्हें मिट्टी में मिला पाना अब तक असंभव ही रहा है। वो सारे कारण जब तक जमीन पर मौजूद हैं जिनकी चर्चा ऊपर की गयी है, माफिया भी मिट्टी के ऊपर बने रहेंगे। जिन थाना, पुलिस, अदालत की बातों को लेकर सामान्य लोग परेशान होते हैं वो किसी माफिया के लिए उसके श्रृंगार जैसा होता है। जिसके ऊपर जितने अधिक केस उसका अपराध की दुनिया में उतना अधिक रुतबा।
जब पुलिस प्रशासन की कार्रवाई ही किसी माफिया के रूतबे का प्रमाण बन जाये तो भला बताइये उन्हें कोई मिट्टी में मिलायेगा भी तो कैसे? उमेश पाल हत्याकांड को ही देखें तो जिस अरबाज और उस्मान को अब तक शासन ने एनकाउण्टर में मार गिराया है वो सब भाड़े के हत्यारे हैं। न तो उनके जीने से किसी को खास फर्क पड़ता है, न मरने से। जो असली बाहुबली हैं वो पॉवर कॉरीडोर में ऐसी जगह बना चुके हैं जिनको खत्म करना असंभव भले न हो, मुश्किल जरूर है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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