Umesh Pal Murder: उमेश पाल हत्याकांड पर यूं ही नहीं सुलग रही यूपी की सियासी चिंगारी
जिस अतीक अहमद ने 2005 में राजू पाल की हत्या करवाई थी उस समय अतीक सपा में तो राजू पाल बसपा में थे। अब अतीक की पत्नी बसपा से सांसद है तो राजू पाल की पत्नी सपा में है।

Umesh Pal Murder: प्रयागराज में 2005 की 25 जनवरी को तत्कालीन बसपा विधायक राजू पाल की हत्या के मुख्य गवाह और उनके करीबी वकील उमेश पाल की 24 फऱवरी को प्रयागराज के धूमनगंज इलाके में हुई हत्या पर प्रदेश में सियासी चिंगारी यूं ही नहीं सुलग रही है। इसके पीछे पंद्रह वर्षों में हुए राजनीतिक उलटफेर का लंबा इतिहास छिपा हुआ है।
जिन राजू पाल हत्याकांड के मुख्य गवाह व नजदीकी उमेश पाल की हत्या के बाद प्रदेश की राजनीति गरमाई है, वह राजू पाल 2005 में इलाहाबाद की तत्कालीन शहर पश्चिमी सीट से बसपा के विधायक थे। उन्होंने सपा के दबंग नेता आपराधिक छवि वाले अतीक अहमद के भाई अशरफ को अतीक के ही गढ़ शहर पश्चिमी सीट पर पराजित कर दिया था। अतीक उस समय फूलपुर से सपा के सांसद थे। राजू पाल की पत्नी पूजा पाल ने अतीक और अशरफ पर राजनीतिक पराजय से चिढ़कर पति राजू पाल की हत्या करा देने का आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज कराया था। अब पूजा पाल बसपा से सपा में आ चुकी है। वह सपा से विधायक है जबकि अतीक अहमद की पत्नी शाइस्ता परवीन बसपा में आ चुकी हैं।
मतलब पूजा पाल अब उस समाजवादी पार्टी में है जिसके सांसद अतीक अहमद व विधानसभा चुनाव प्रत्याशी अशरफ पर अपने पति की हत्या का आरोप लगाया था। साथ ही 2005 से लेकर कई वर्षों तक आपराधिक छवि के अतीक को पालने-पोसने का आरोप लगाते हुए सदन से लेकर सड़क तक सपा पर हमलावर रही थीं। दूसरी तरफ अतीक की पत्नी शाइस्ता परवीन को राजनीतिक ठिकाना देकर बसपा आज एक तरह से अतीक के परिवार को राजनीतिक संरक्षण देने की भूमिका में है।
हालांकि अतीक जेल में बंद हैं पर सियासी गलियारों में चर्चा है कि राजनीति में दखल बनाए रखने की कोशिश में अतीक के ही इशारे पर उनकी पत्नी बसपा में आई है। सारी पटकथा अतीक की लिखी हुई है। ऐसे में अगर यह कहा जाए कि सपा व बसपा की भूमिकाएं ही उमेश पाल की हत्या के बाद कठघरे में खड़ी हो गई हैं तो गलत नहीं होगा। राजू पाल की हत्या के खिलाफ सपा को घेरने वाली बसपा हत्या के आरोपी के परिवार को संरक्षण देने के आरोपों की जद में है जबकि उस समय अतीक को संरक्षण देने वाली सपा भुक्तभोगी परिवार के साथ खड़ी होने के बावजूद प्रदेश में राजनीति के अपराधीकरण को बढ़ावा देने के आरोपों से खुद को ठीक से बचा नहीं पा रही है।
यह सही है कि अतीक अहमद को सपा के वर्तमान मुखिया अखिलेश यादव ने कभी पसंद नहीं किया। मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने प्रयागराज के एक कार्यक्रम में अतीक को धक्का देकर मंच से उतार दिया था। परंतु राजनीति में अतीत से पिंड छुड़ाना बहुत आसान नहीं होता। यह सर्वविदित तथ्य है कि अतीक अहमद की राजनीतिक जड़ों को मजबूत बनाने में सपा की ही सबसे ज्यादा भूमिका रही है। ऐसे में अतीक के राजनीतिक विरोधी स्व. राजू पाल की पत्नी पूजा पाल को राजनीतिक संरक्षण देने और उनके सपा से विधायक बनने के बावजूद सपा के लिए यह मुद्दा बेचैनी की बड़ी वजह बनता दिख रहा है और सपा के लिए बचाव करना मुश्किल हो रहा है।
ऊपर से जिस तरह इस घटना के तार मुख्तार अंसारी गैंग से जुड़ने के भी संकेत सामने आ रहे हैं, उसके मद्देनजर पिछले दिनों बसपा सांसद अफजाल अंसारी को सपा में आने का शिवपाल का निमंत्रण भी सपा को घेरने के लिए भाजपा को एक नया आधार मुहैया करा रहा है। तभी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मुद्दे के सहारे सपा की जातीय गणित को बिगाड़ने तथा हिंदुत्व के मुद्दे को धार देने की कोशिश कर इनकी बेचैनी बढ़ा दी है।
यही बात बसपा को भी परेशान करती नजर आ रही है। बसपा प्रमुख मायावती ने जिस तरह अतीक को सपा का प्रोडक्ट बताकर तथा उमेश पाल हत्याकांड में अतीक की पत्नी 'शाइस्ता परवीन का हाथ साबित होने पर कार्रवाई करने' और उन्हें 'पार्टी से निकालने' की बात कहकर अपनी सफाई देने की कोशिश की है वही इस मुद्दे पर उनकी बढ़ती बेचैनी साबित कर रहा है। ऊपर से जिस तरह अतीक से लेकर मुख्तार अंसारी के परिवार की राजनीतिक डोर सपा व बसपा से जुड़ी रही है उसके चलते इनके लिए भाजपा के हमलों से बचना बहुत आसान नहीं है।
राजनीतिक विश्लेषकों का भी कहना है कि सपा तथा बसपा के लिए भाजपा के हमलों का सटीक जवाब दे पाना आसान नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं कि जिस तरह पूजा पाल व अतीक के परिजनों के दल बदले और सपा व बसपा ने इन्हें संरक्षण देकर अपनी भूमिका बदली उसने भाजपा को दोनों दलों पर आपराधिक छवि वालों को संरक्षण देते, जाति व तुष्टीकरण की राजनीति करने तथा सियासी स्वार्थ पर राजनीति करने के अलावा सियासी अवसरवादिता के आरोपों के साथ इन्हें घेरने का भी पूरा मौका दे दिया है। भाजपा इसके सहारे प्रयागराज, फूलपुर, मिर्जापुर जैसे कमजोर नजर आने वाले इलाकों में अपने सियासी समीकरणों को मजबूत कर पार्टी की पकड़ व पहुंच मजबूत करने की कोशिश करे तो ताज्जुब नहीं।
पिछले साल 2022 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान भी भाजपा को अपना दल व निषाद पार्टी की मदद लेने के बावजूद इस इलाके की कई महत्वपूर्ण सीटों पर पराजय का सामना करना पड़ा। हिंदुत्व का महत्वपूर्ण प्रतीक स्थल होने के बावजूद प्रयागराज, कौशांबी, मिर्जापुर, सोनभद्र, फतेहपुर, प्रतापगढ़ के बीच सिमटे इस इलाके में निश्चित रूप से भाजपा के रणनीतिकारों के लिए स्थिति चिंताजनक रही है। ऐसा नहीं कि यहां भाजपा कभी जीती नहीं, लेकिन उसे प्रदेश के अन्य स्थानों जैसा एकतरफा समर्थन नहीं प्राप्त हुआ। जैसा पहले इस इलाके में कांग्रेस या फिर सपा अथवा बसपा को मिलता रहा।
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ऐसे में अतीक बनाम उमेश पाल, राजू पाल व पूजा पाल के बहाने भाजपा इस इलाके में हिंदुत्व व पिछड़ी जातियों की गणित के लिहाज से लामबंदी मजबूत करने के नए नुस्खों के साथ भविष्य में सामने आए तो ताज्जुब नहीं। इस पर वर्तमान परिस्थिति में सपा व बसपा के सामने रक्षात्मक रुख अपनाने के अलावा कोई अन्य चारा नहीं दिखता।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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