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बिना किसी नारे के बीत जाएगा चुनाव?

Chunavi Naare: आरोपों-प्रत्यारोपों और व्यक्तिगत आक्षेपों से भरे इस चुनाव में एक कमी जो दिखाई दी है वह है अच्छे नारों और मुहावरों की। नए और प्रभावशाली वाक्यांश हमारे लोकतंत्र के गहने रहे हैं। लेकिन इस बार अच्छे नारों और स्लोगनों के बिना जैसे चुनाव अधूरा लग रहा है।

चुनावी नारे या काव्यांश राजनीतिक माहौल को हमेशा सरस और चुटीले बनाते रहे हैं। जनता की कल्पना को मूर्त रूप देने में भी ये नारे बड़े प्रभावशाली होते हैं। जैसे कभी 'जात पर न पात पर, इंदिरा जी की बात पर, मोहर लगेगी हाथ पर' लोगों ने विश्वास किया था उसी तरह 'अबकी बारी, अटल बिहारी' पर भी लोगों ने यकीन जताया था। 2014 में खुद भाजपा ने 'अबकी बार, मोदी सरकार' पर वोट की फसल काटी थी।

Chunavi Naare

चुनावी नारे पूरे देश में गूंजते रहे हैं और चुनावी अभियानों को मजबूती देते रहे हैं। नारे लोकतंत्र की जान हैं। वे माहौल बनाते हैं, मतदाताओं और राजनीतिक दलों के बीच संबंध बनाते हैं और चुनावी रैलियों में जोश भरते हैं। उनके बिना चुनाव अधूरा लगता है। कभी नारों से दीवारें पटी होती थीं पर अब नये चुनावी नियमों के कारण यह चलन खत्म सा हो गया है।

चुनाव में नारे लोगों को इसलिए भाते हैं, क्योंकि हम भारतीय हमेशा से अपनी भावनाओं को असरदार तरीके से लोगों तक पहुंचाने के लिए लोकोक्तियों और मुहावरों का उपयोग करते रहे हैं। इसीलिए राजनीतिक क्षेत्र के लोग भी नारों और हुंकारों के जरिए परिवर्तन की बात करते रहे हैं।

अभी से नहीं बल्कि आजादी की लड़ाई के समय से ही काव्यांश और नारे ज्यादा असरदार साबित हुए। कुछ नारे तो इतने चर्चित और लोकप्रिय हुए कि उन्हीं से नेताओं की अलग पहचान बन गई। जैसे 'जय हिंद' के घोष से आज भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की छवि जुड़ी हुई है। उसी तरह से वंदे मातरम् गान के लिए बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जाने जाते हैं। लाला लाजपत राय का नाम "साइमन गो बैक" के नारे के साथ अमर हो गया, तो "अंग्रेजों भारत छोड़ों के नारे" के कारण बापू सहज याद आ जाते हैं। 'स्वराज हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है' का नारा बाल गंगाधर तिलक के साथ हमेशा के लिए जुड़ गया।

इस तरह के सैकड़ों उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि भारतीय जनमानस पर नारों पर कितना असर होता है। इसलिए आजाद भारत में जब से चुनावी प्रक्रिया शुरू हुई, तभी से नारों का उपयोग भी शुरू हो गया। भारत में पहला आम चुनाव 1951 में हुआ। अपने पहले चुनाव में प्रधानमंत्री नेहरू ने सांप्रदायिकता के खिलाफ कई नारे उछाले। जैसे - "किसी एक धर्म द्वारा दूसरे धर्म के लोगों को दबाने का सवाल ही उत्पन्न नहीं होता।" बाद में 1962 के चीन के साथ युद्ध में भारत की हार के कारण नेहरू के खिलाफ यह नारा काफी लोकप्रिय हुआ कि "वाह रे नेहरू तेरी मौज, घर में हमला बाहर फौज।"

इस नारे के जरिए विपक्ष ने नेहरू द्वारा भारतीय सेना के कुछ जवानों को देश के बाहर भेजने के फैसले पर सवाल उठाया था। नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने और उनका दिया हुआ नारा 'जय जवान जय किसान' आज भी बड़े शान से लिया जाता है। हालांकि बाद में भारत के प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेई ने जब पोखरन परमाणु विस्फोट किया तो इस "जय जवान जय किसान" के साथ जय विज्ञान भी जोड़ कर इसे अमर बना दिया।

चुनावों के दृष्टिकोण से देखें तो अब तक सबसे असरदार नारा इंदिरा गांधी का "गरीबी हटाओ" का नारा रहा है, जो उन्होंने 1971 के चुनाव के समय दिया था। हालांकि 1971 के चुनाव के बाद से ही इंदिरा गांधी के दुर्दिन भी शुरू हो गए, और उसकी पराकाष्ठा 1975 में आपातकाल के रूप में हुई। बाद में जब पूरा देश इंदिरा गांधी के खिलाफ हो गया तब जयप्रकाश का यह नारा बुलंदियों पर पहुंचा कि "इंदिरा हटाओ देश बचाओ।"

लेकिन आपातकाल के बाद जब इंदिरा गांधी 1980 में चुनाव में गयीं तो उन्होंने नारा दिया "सरकार वह चुनें जो चल सके।" जाहिर है आपातकाल के बाद जनता पार्टी का सरकार बनाने का प्रयोग विफल रहा और ढाई साल में ही दो प्रधानमंत्रियों के आने के बाद भी सरकर पांच साल चल नहीं सकी।

1984 का चुनाव इंदिरा गांधी की शहादत पर लड़ा गया था। परंतु जब 1991 के चुनाव प्रचार में राजीव गांधी उतरे तो उन्होंने नारा दिया-' वोट स्थिरता के लिए, वोट कांग्रेस के लिए'। 1996 के आते आते भाजपा की राजनीतिक पकड़ देश पर होने लगी, तो भाजपा ने नारा दिया - "सबको परखा बारी बारी, अबकी बारी अटल बिहारी।"

उसके तुंरत बाद भाजपा ने एक और चुनावी नारा दिया- 'राम, रोटी और स्थिरता' और इसका असर भी हुआ। भाजपा लगभग केंद्र में 6 साल सरकार चलाने में सफल रही। लेकिन 2002 में जब भाजपा ने अपना चुनाव स्लोगन 'इंडिया शाइनिंग' दिया तो लोगों ने इसे नहीं अपनाया और भाजपा सत्ता से बाहर हो गई।

केवल देश के आम चुनाव में ही नारे या स्लोगन हिट नहीं हुए, बल्कि राज्यों के चुनाव में भी नारों का बड़ा असर रहा। बंगाल में ममता बनर्जी ने मां, माटी और मानुष का नारा दिया और सत्ता में आ बैठी। बिहार में भी एक नारा खूब चला कि "जब तक रहेगा समोसे में आलू तब तक बिहार में रहेगा लालू"। इसी तरह यूपी में समय समय पर नारों ने चुनाव में राजनीतिक दलों की नैय्या पार लगायी है।

देश में सत्ता परिवर्तन की लहर जब 2014 में आई, तो भाजपा ने इसे भुनाने के लिए कई लोकप्रिय नारे दिए। जिनमें सबसे प्रमुख नारा रहा- "अच्छे दिन आनेवाले हैं।" इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी को केंद्र में रखकर जब भाजपा ने एक चुनावी गीत- "मैं देश नहीं बिकने दूंगा' जारी किया तो लोगों ने इसे खूब सराहा। इसी तरह अबकी बार मोदी सरकार के नारे ने लोकमानस बनाने में बड़ी मदद किया था। मोदी के बनारस से चुनाव लड़ने के फैसले के बाद एक और नारा काफी बुलंद हुआ, वह था - "हर हर मोदी, घर घर मोदी।"

2019 के आम चुनाव में जब भाजपा ने चौकीदार शब्द के साथ यह नारा गढ़ा कि 'मैं हूं चौकीदार' यह नारा पाकिस्तान के खिलाफ़ एयर स्ट्राइक के बाद दिया गया। कांग्रेस ने उसके जवाब में नारा दिया- 'चौकीदार चोर है।' कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने राफेल की खरीददारी में भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए यह नारा दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद अपनी सरकार के लिए यह नारा गढ़ा सबका साथ सबका विश्वास। इसके साथ ही भाजपा ने राज्यों के चुनाव में भी एक नारा दिया कांग्रेस मुक्त भारत।

लेकिन 2024 में ना तो बीजेपी ने और ना ही विपक्ष ने कोई बड़े नारे या स्लोगन चुनाव के लिए दिए। इसका सबसे बड़ा कारण शायद यह रहा कि इस बार चुनाव के मुद्दे भी स्थाई नहीं हैं। बीजेपी सत्ता में है इसलिए अपने काम काज को दिखाने के लिए जो एक नारा गढना था, वह नहीं गढ पायी। इसी तरह विपक्ष की ओर से मोदी सरकार के खिलाफ कोई एक भी ऐसा नारा नहीं गढा गया जो उनकी कमियों को जनता तक पहुंचा पाता। इस तरह यह चुनाव बिना किसी नारे के ही बीत जाने वाला है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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