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फिर खिला “कमल” तो बुरे होंगे “हाथ” के हालात?

Congress Party: लोकसभा चुनाव के लिए छह चरणों में 486 सीटों के लिए मतदान हो चुका है। भाजपानीत एनडीए गठबंधन 400 से अधिक सीटें जीतने का दावा कर रहा है वहीं कांग्रेस की अगुवाई वाला इंडिया गठबंधन 300 से अधिक सीटों पर बाजी मारने का भरोसा जता रहा है।

हालांकि अभी अंतिम चरण के लिए 1 जून को 57 सीटों पर मतदान होना है, इसे लेकर दोनों तरफ बेचैनी भी है, आशंका भी है, लेकिन दावा-प्रतिदावा करने में बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुभान अल्लाह। दिलचस्प पहलू यह है कि हर बीतते चरण के साथ दोनों पक्ष एक दूसरे की सीटें कम होने का दावा कर रहे हैं। कांग्रेस पार्टी कमल के कुम्हलाने की बात कर रही है, तो भाजपा का कहना है कि हाथ के हालात अभी बदलने वाले नहीं हैं।

Congress Party

आंकड़ों के आईने में देखें तो लोकसभा की 543 सीटों में से पिछली बार समाजवादी पार्टी के खाते में सिर्फ 5 सीटें आई थीं। अबकी बार ताल ठोक कर पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव दावा कर रहे हैं कि गठबंधन उत्तर प्रदेश की 80 में से 79 सीटों पर जीत हासिल करेगा। इसी तरह अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की लोकसभा में सिर्फ एक सीट है लेकिन वह भी मौजूदा चुनाव में अधिकांश सीटों पर जीत की ताल ठोक रहे हैं।

ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के पास अभी 22 सीटें है लेकिन उनका दावा है कि इस बार 32 से 35 सीट जीतेंगे। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल पिछले चुनाव में शून्य पर पहुंच गया था, अब दावा कर रहा है कि बिहार की सभी सीटों पर गठबंधन का कब्जा होगा। कांग्रेस की मात्र 52 सीट हैं लेकिन कांग्रेस के नेताओं का दावा है कि उनके पक्ष में अंडर करंट चल रहा है और कांग्रेस पार्टी मोदी सरकार को जड़ मूल से उखाड़ फेंकेगी।

इन सबके बरअक्स भाजपा का ग्राफ देखें तो पिछली बार भाजपा ने 303 सीटों पर जीत दर्ज की थी। अबकी बार भाजपा ने 370 सीट तथा एनडीए गठबंधन को 400 के पार पहुंचाने का दावा किया है। 303 में अगर 67 सीट जोड़ दें तो 370 बन जाता है। इसी तरह एनडीए गठबंधन के 353 में मात्र 47 सीट जोड़ दें तो 400 का आंकड़ा प्राप्त हो जाता है।

विपक्षी दल के कई नेता यह मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में अगर जनवरी फरवरी में चुनाव हुआ होता तो भाजपा सभी 80 सीट प्राप्त कर सकती थी। क्योंकि तब राम मंदिर का मुद्दा सामने था। मार्च आते-आते यह आंकड़ा 60 और 20 का हो गया। अप्रैल के शुरू में जो संभावना जताई जा रही थी वह महीने के अंत में और घट गई। अब मई के अंत तक दोनों दलों के बीच सीटों का अनुपात 50:30 पर आकर टिक गया है।

अगर ऐसा है तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि विपक्ष के लिए आंधी जैसी स्थिति है लेकिन जमीन पर ऐसा नहीं दिखता है। पूर्वांचल की अधिकतर सीटों पर आमने-सामने का नजदीकी मुकाबला है। पिछले विधानसभा चुनाव में सपा ने 300 सीट जीतने का दावा किया था लेकिन 111 सीटों पर ही उनकी पार्टी सिमट कर रह गई थी।
वहीं दूसरी तरफ उत्तर भारत में इंडिया ब्लॉक का सटीक टिकट वितरण, रैलियों में उमड़ रहे जन समर्थन, सामाजिक समीकरण के अनुसार बड़े वोट बैंक से विपक्ष 300 से अधिक सीटों का भरोसा जता रहा है।

इस बार के चुनाव में ना ना करते हुए भी कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राजद, आप, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, शिवसेना सहित तटीय प्रदेशों के क्षेत्रीय दलों की एकजुटता का जमीन पर असर दिख रहा है। रोजगार, महंगाई, पेपर लीक सरकारी नियुक्तियों में लगातार कटौती, अग्नि वीर जैसी योजनाओं को लेकर विपक्षी दल सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं और सत्ता पक्ष इन मुद्दों पर बगले झांकता हुआ नजर आ रहा है।

तीन लोकसभा क्षेत्र से विपक्षी नेताओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से दूर रखने का कुत्सित प्रयास भी सत्तारूढ गठबंधन की लोकतांत्रिक नियत की कलई खोल रहा है। रही सही कसर चुनावी बांड ने पूरी कर दी, जिससे अब जनता के मन में विपक्ष के प्रति थोड़ा-थोड़ा भरोसा उगने लगा है। इंडिया ब्लॉक के घटक दलों द्वारा बार-बार सामाजिक एवं आर्थिक न्याय की बात करना भी जनता को आकर्षित कर रहा है। यूपी बिहार में जातीय गणना दक्षिण में महिलाओं के लिए मासिक आय योजना से जनता का रुझान इनके पक्ष में बढ़ा है।

भाजपा के कुछ नेताओं का पूर्व में यह कहना कि 400 से अधिक सीटें आती हैं तो संविधान को बदलने की दिशा में काम किया जाएगा अब उन पर भारी पड़ता हुआ दिख रहा है। हालांकि प्रधानमंत्री सहित सभी जिम्मेदार नेता इस पर लगातार सफाई जनता के बीच दे रहे हैं लेकिन विपक्ष बहुत नीचे तक यह बात समझाने में सफल हुआ है कि सरकार बाबा साहब भीमराव अंबेडकर द्वारा बनाए गए संविधान और उसके जरिए मिले आरक्षण रूपी अधिकार को खत्म करने की कोशिश में है।

पिछले दो चुनाव की बात करें तो 2014 में कांग्रेस को 44 सीट मिली थी तो 19 में उसे 52 सीट हासिल हुई। पिछले चुनाव में उसकी 8 सीटें बढ़ी, लेकिन उसके लिए चिंतित होने वाली बात यह थी कि दूसरे स्थान पर रहने वाले कांग्रेस के प्रत्याशियों की संख्या 2019 में 2014 के मुकाबले काफी घट गई। कांग्रेस कई क्षेत्रों में तीसरे या सबसे निचले पायदान तक पहुंच गई। केरल के अलावा किसी भी राज्य में कांग्रेस पार्टी दहाई का आंकड़ा नहीं छू सकी। तो क्या ऐसे आसार दिखते हैं कि मौजूदा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की तीन अंको वाली जीत होने जा रही है?

इसका उत्तर तो 4 जून को मतगणना के बाद ही मिल पाएगा। क्योंकि पार्टी ने गठबंधन बनाने के लिए योजना तो बनाई लेकिन जिस तरह उसे कार्य रूप देना था उसमें वह पीछे रह गई। नीतीश कुमार ने पाला बदल लिया। ममता बनर्जी छोड़कर किनारे खड़ी हो गई। अरविंद केजरीवाल ने मतलबी आधा अधूरा गठजोड़ किया।

भारत में मतदाता बहुत जागरुक है। मतदाताओं की नजर उम्मीदवारों और खासकर बड़े नेताओं की हर गतिविधि पर रहती है। कांग्रेस पार्टी प्रधानमंत्री के बार-बार कपड़े बदलने को लेकर तंज कसती रही है। लेकिन भारत के लोगों को कांग्रेस के नेता राहुल गांधी का टीशर्ट पहनकर पूरे देश में घूमना बहुत अच्छा नहीं लगा। अपने-अपने तरह के कुतर्कों से कांग्रेस के शुभेच्छु इसे ढकने की कोशिश भी करते रहे लेकिन जो खुला सच है वह कैसे छिपेगा?

हालांकि कांग्रेस पार्टी ने अपने प्रचार अभियान को पिछले चुनाव की तुलना में थोड़ा सघन किया है। देश के मौजू सवालों को समस्या के रूप में उभारकर उसके समाधान के लिए "हाथ बदलेगा हालात" जैसा नारा भी गढ़ा है। दक्षिण के अलावा कांग्रेस पार्टी को हरियाणा और राजस्थान में भी पहले से अच्छा रिस्पांस मिला है। उत्तर प्रदेश में सपा, बिहार में राजद, झारखंड में झामुमो महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे शरद पवार के भरोसे उम्मीद बढ़ी है।

लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि इतना होने के बावजूद भी अगर कांग्रेस पार्टी अपनी जीत तीन अंको तक नहीं ले जा पाती तो उसके लिए मुश्किल और बढ़ती जाएगी। कांग्रेस को राष्ट्रीय पार्टी के रूप में बनाए रखने का संकट और गहराएगा। पिछले 10 वर्षों में सत्ता से बाहर रहने के कारण पार्टी के अधिकांश नेता पहले ही साथ छोड़ कर दूसरे दलों में चले गए हैं। अगर पार्टी कुछ खास नहीं करती है तो बचे खुचे भी शायद ही बचें।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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