Lithium Deposits: लिथियम भंडार पर खुशी मनाने से पहले पूरी जानकारी जरूरी

कश्मीर में लिथियम भंडार मिलने को इस तरह से प्रचारित किया गया है मानों हम कल से बैटरी उर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने जा रहे हैं। ऐसा बिल्कुल नहीं है। यह सिर्फ प्रारंभिक आकलन है, ठोस निष्कर्ष नहीं।

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Lithium Deposits: भारत में लिथियम भंडार मिलने की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है। भारत में दोबारा लिथियम मिलने की खबर भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने दी है। इस बार जम्मू और कश्मीर में रियासी जिले के सलाल-हैमाना क्षेत्र में लिथियम भंडार पाया गया है। इसके पहले 2021 में, कर्नाटक में लिथियम के छोटे भंडार मिले थे।

खनन मंत्रालय लगातार दुर्लभ धातुओं और ऊर्जा स्रोतों की तलाश करने में जुटा हुआ है। नई तकनीकी को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक दुर्लभ धातुओं की आपूर्ति में सुधार के लिए हर सम्भव उपाय और तरीकों की खोज बढ़ाने के लिए भारत सरकार ने पहले ही कहा है। इसके लिए सरकार न सिर्फ देश बल्कि विदेशों में भी खनिज स्रोतों की तलाश कर रही है। निःसंदेह जम्मू कश्मीर में लिथियम भंडार मिलना भारत के विकास के लिए कितना अहम हो सकता है यह हर कोई समझ रहा है। इस नॉन फेरस यानी अलौह धातु के इस भंडार के बारे में विस्तार से जानना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि आखिर इससे भारत को क्या और कितना लाभ हो सकता है?

इस समय दुनिया भर में ग्लोबल वार्मिंग सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। इस परिवर्तन को धीमा करने के लिए विश्व को हरित समाधान ढूंढने और अपनाने की दिशा में प्रयास करना है। जो हर स्तर पर जारी है। इसी कारण पूरे विश्व में लिथियम जैसी दुर्लभ धातुओं की मांग बढ़ गई है, जो भौतिक और तकनीकी विकास के साइड इफेक्ट्स को तुलनात्मक रूप से कम करने में सक्षम है।

विश्व बैंक का कहना है कि हरित समाधान हेतु महत्वपूर्ण खनिजों की खोज और खनन में 500 प्रतिशत की वृद्धि होगी तो ही हम 2050 तक वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने में समर्थ हो सकेंगे। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि लिथियम खनन की प्रक्रिया भी पर्यावरण के लिए सुरक्षित नहीं है। लिथियम कठोर चट्टानों और भूमिगत खारे जलाशयों से निकाला जाता है। अभी तक इसके बड़े भंडार ऑस्ट्रेलिया, चिली और अर्जेंटीना में हैं जो विश्व के विभिन्न देशों में आपूर्ति करते हैं। चीन ने इसी वर्ष बोलीविया के विशाल लिथियम भंडार को नियोजित करने के लिए एक बिलियन डॉलर की साझेदारी की है। अनुमान है कि यह अभी तक का ज्ञात सबसे बड़ा लगभग 21 मिलियन टन का लिथियम भंडार है।

हालांकि ग्रीन एनर्जी के समाधान के रूप में देखे जाने वाले लिथियम की प्रोसेसिंग भी ईको फ्रेंडली नहीं है। इसकी शोधन प्रक्रिया में बहुत अधिक पानी की आवश्यकता होती है और साथ ही यह प्रक्रिया बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में छोड़ती है। साथ ही यह धातु पृथ्वी पर किसी स्वाभाविक प्रक्रिया से नहीं बनती है। वैज्ञानिकों ने माना है कि यह एक ब्रह्मांडीय तत्व है जो चमकीले तारकीय विस्फोटों से बना है, जिसे नोवा कहा जाता है। नासा द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह बात कही गई है कि बिग बैंग के समय ही जब ब्रह्मांड की संरचना का प्रारंभिक गठन हुआ तभी लिथियम भी अस्तित्व में आया। अधिकांश लिथियम परमाणु प्रतिक्रियाओं में निर्मित होता है जो नोवा विस्फोटों को ऊर्जा प्रदान करता है।

यह निःसंदेह एक क्रांतिकारी खनिज है। लिथियम-आयन बैटरी ने इलेक्ट्रॉनिक संचार, कंप्यूटिंग, डिजिटलीकरण में क्रांति ला दी है, जो अब दुनिया को क्लीन एनर्जी की ओर ले जा रही है।
2019 में रसायन विज्ञान क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार लिथियम-आयन बैटरी पर काम करने के लिए ही संयुक्त रूप से 3 वैज्ञानिकों को दिया गया था। आने वाले दिनों में कार्बन-उत्सर्जन कम करने के लिए लिथियम का यह भंडार हमारे लिए बहुत बड़ी संभावना लेकर आया है। अभी तक हम अपनी जरूरत का लिथियम पूरी तरह से आयात करते रहे हैं। लैपटॉप, स्मार्टफोन से लेकर इलेक्ट्रिक कार की बैटरी तक, अब लिथियम से ही बनने लगे हैं। यह लिथियम-आयन बैटरी ही है जिसने इलेक्ट्रॉनिक संचार में क्रांति ला दी है। यही नहीं इसका उपयोग धातु उद्योग, रसायन उद्योग और दवा उद्योग में भी कुछ मात्रा में होता है।

ऐसे में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने ऐसा अद्भुत कार्य कर दिखाया है जिसकी खूब प्रशंसा की जा रही है। किन्तु इसके आगे अभी बहुत कुछ करना शेष है। ऐसा नहीं है कि जानकारी हो गई है तो शीघ्रता से इसके खनन का कार्य शुरू हो जाएगा। 2021 में कर्नाटक में भी कुछ मात्रा में लिथियम भंडार का पता चला था पर अभी तक हम उसका ज़रा भी उपयोग नहीं कर सके हैं। अभी खोजा गया भंडार फिलहाल 'इंफर्ड रिसोर्स' है, जिसका अर्थ है कि अभी सब कुछ अनुमानित है। सीमित सैंपल और उपलब्ध भूवैज्ञानिक साक्ष्य के आधार पर इसकी मात्रा और ग्रेड का अनुमान लगाया गया है। इसकी गुणवत्ता और ग्रेड को प्रमाणित करना अभी शेष है। इसमें अभी कुछ और समय लगेगा। जब तक यह स्पष्ट नहीं हो जाता कि इसका ग्रेड क्या है, इसके उपयोग को लेकर कोई भी निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

यह भी कहना जल्दीबाजी ही होगा कि इस भंडार के मिलने के बाद लिथियम को लेकर ऑस्ट्रेलिया या अर्जेंटीना देशों पर हमारी निर्भरता खत्म हो जाएगी। जब तक यह तय नहीं हो जाता कि भारत में किस तकनीकी से इसे निकाला जा सकता है और हमारे भंडार की वास्तविक क्षमता कितनी है, तब तक हम इसे अपनी उपलब्धि नहीं कह सकते हैं। किन्तु जैसा अनुमान लगाया जा रहा है यदि सब कुछ उसके अनुरूप हुआ तो संभावना है कि दूसरे देशों से आयातित लिथियम पर हमारी निर्भरता काफी हद तक कम हो जाएगी।

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    चिली, अर्जेंटीना आदि देशों में लिथियम पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। वहां भूमिगत खारे पानी से इसे निकाला जाता है। इस पानी में छह से सात प्रतिशत तक ही लिथियम होता है। मगर भारत में यह कुछ पत्थरों में पाया गया है। इस दुर्लभ धातु को निकालने और इसका शोधन करने के लिए उत्कृष्ट तकनीकी की आवश्यकता है। भूगर्भ वैज्ञानिकों के अनुसार देश में यह बॉक्साइट में पाया गया है। चूंकि भारत में बॉक्साइट के रिजर्व कई जगहों पर हैं, इसलिए जम्मू-कश्मीर की सफलता अन्य तमाम रिजर्व के लिए भी लिथियम प्राप्ति की संभावना पैदा कर रही है। भारत में मिलने वाला लिथियम भंडार हमें कितना आत्मनिर्भर बनाएगा उसके आकलन के लिए थोड़ी और प्रतीक्षा करनी होगी।

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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