Lithium in J&K: भारत में मिला लिथियम का बहुमूल्य खजाना, जानें इसकी खासियत
जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने यह जानकारी दी है कि जम्मू और कश्मीर में बड़ी तादाद में लीथियम धातु का भंडार मिला है। अब भारत को मोबाइल और कारों की बैटरी निर्माण के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा।

Lithium in J&K: भारत में लिथियम का एक बड़ा भंडार मिला है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के मुताबिक जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले में लिथियम का 59 लाख टन का भंडार है। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (GSI) ने 9 फरवरी 2023 को यह जानकारी दी कि ऐसा पहली बार है जब देश में इतनी बड़ी तादाद में लीथियम मेटल का भंडार मिला है।
दरअसल, इंसान के जीवन से लिथियम किसी न किसी रूप में प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। जैसे लैपटॉप-कंप्यूटर, मोबाइल, टॉर्च, सोलर पैनल, वाहनों में लगने वाली बैटरी, टीवी-एसी के रिमोट की बैटरी सब जगह लिथियम का प्रयोग होता हैं। अभी तक लीथियम की मांग को पूरी करने के लिए भारत दूसरे देशों पर निर्भर रहा है लेकिन अनुमान है कि लीथियम भंडार मिलने से देश को आत्मनिर्भर होने में बहुत बड़ी मदद मिलेगी। वहीं आने वाले समय में ऊर्जा के बड़े संसाधन के रूप में भी लिथियम आयन बैटरी का ही प्रयोग होगा। दुनियाभर के कई देश धीरे-धीरे पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स पर अपनी निर्भरता को कम कर लिथियम बैटरी की तरफ रुख कर रहे हैं।
लिथियम आया कहां से है?
लिथियम दुनियाभर में सबसे अधिक मांग वाले खनिजों में से एक है। इसकी खोज पहली बार 1817 में योहान ऑगस्ट आर्फवेडसन द्वारा की गई थी। लिथियम शब्द ग्रीक में लिथोस से आया है, जिसका अर्थ है पत्थर। लिथियम सबसे कम घनत्व वाली धातु होती है जो पानी के साथ तेजी से प्रतिक्रिया करती है। हालांकि, यह प्राकृतिक रूप में जहरीली होती है।
गौरतलब है कि लिथियम अन्य धातुओं की तरह स्वाभाविक रूप से पृथ्वी के गर्भ में नहीं बनता। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह एक ब्रह्मांडीय तत्व है जो चमकीले तारकीय विस्फोटों से बना है जिसे नोवा कहा जाता है। नासा के अनुसार ब्रह्मांड के शुरूआती गठन के समय लिथियम की एक छोटी मात्रा का निर्माण हुआ था। उसमें से अधिकांश लिथियम परमाणु प्रतिक्रियाओं में निर्मित हुआ था और जब सृष्टि में तारकीय विस्फोट हुए होंगे तब यह खनिज तत्व पूरी आकाशगंगा में इधर-उधर फैल गये होंगे।
लिथियम का प्रोडक्शन कहां है सबसे ज्यादा?
लिथियम का उत्पादन पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा ऑस्ट्रेलिया में होता है। एक आंकड़े के मुताबिक साल 2021 में दुनियाभर का 52 प्रतिशत लिथियम ऑस्ट्रेलिया से आता है। जबकि इसके बाद चिली है, जिसकी हिस्सेदारी 24.5 प्रतिशत है। वहीं तीसरे नंबर पर चीन है, जो 13.2 प्रतिशत लिथियम प्रोड्यूस करता है। कुल मिलाकर पूरी दुनिया में यह तीन देश ही हैं जो 90 प्रतिशत लिथियम निकालते हैं। इसलिए अब तक भारत में बैटरी बनाने के लिए ऑस्ट्रेलिया और अर्जेंटिना जैसे देशों से लीथियम का आयात किया जाता रहा है।
2030 तक होगी लिथियम की भारी मांग
ग्लोबल न्यूज वायर के मुताबिक लिथियम बाजार की वैश्विक मांग बढ़ रही है। इंडस्ट्री एसोसिएशन (एलआईए) का अनुमान है कि लिथियम की वैश्विक मांग 2020 में 292 हजार मीट्रिक टन से बढ़कर 2030 तक 2.5 मिलियन मीट्रिक टन हो जाएगी। जबकि, साल 2021 में वैश्विक लिथियम बाजार का आकार 7.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर आंका गया था। लिथियम का यह बाजार 11.75 प्रतिशत चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) पर साल 2028 तक 15.45 बिलियन अमेरिकी डॉलर होने की संभावना है।
लिथियम के दामों पर चर्चा करें तो वह लगातार बदलते रहते हैं। दरअसल, इसकी एक कमोडिटी मार्केट है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में लिथियम की कीमतें तय की जाती है। फिलहाल लिथियम की कीमत प्रति टन 472500 युआन यानि लगभग 57,36,119 रुपये है।
लिथियम क्यों है इतना खास?
दुनियाभर में ग्रीन एनर्जी अपनाने की बात हो रही है। हालांकि, समस्या यह है कि इसके लिए कार्बन उत्सर्जन को कम करना होगा ताकि प्रदूषण को कम किया जा सके। ग्रीन एनर्जी को आगे बढ़ाने में अभी तक लिथियम ही सबसे बड़ा समाधान साबित हो सका है। लिथियम आयन बैटरी की मदद से रिन्यूएबल एनर्जी को स्टोर करने में मदद मिलेगी। इस एनर्जी का बाद में उपयोग किया जा सकता है। इस बैटरी को हजारों बार रिचार्ज कर उपयोग कर सकते हैं। इनकी लाइफ भी बहुत अधिक होती है और लिथियम आयन बैटरी में अन्य मेटल भी होते हैं लेकिन इसमें लिथियम की भूमिका सबसे ज्यादा होती हैं।
ग्रैंड व्यूह रिसर्च के मुताबिक रिचार्जेबल लिथियम-पॉलीमर बैटरी का उपयोग सेल फोन, लैपटॉप, खिलौने, डिजिटल कैमरा, छोटे और बड़े उपकरणों, टैबलेट ई-रीडर और बिजली उपकरणों में किया जाता हैं। इन बैटरियों को कोबाल्ट, ग्रेफाइट और लिथियम जैसी महत्वपूर्ण सामग्रियों से बनाया जाता है और इन्हें सुरक्षा एवं सावधानियों के साथ संभालने की आवश्यकता होती है। विभिन्न विकसित देश ली-आयन बैटरी पर आधारित ऊर्जा भंडारण प्रणालियों की तैनाती में तेजी से निवेश कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर जून 2021 में, यूनाइटेड किंगडम ने अपने नेशनल ग्रिड के हाई-वोल्टेज ट्रांसमिशन सिस्टम से जुड़ा 50 मेगावाट ऊर्जा सिस्टम शुरू की है। यह परियोजना देश की एनर्जी सुपरहब ऑक्सफोर्ड (ईएसओ) योजना का हिस्सा है। परियोजना का नेतृत्व पिवोट पावर द्वारा किया जा रहा है और यूके सरकार द्वारा समर्थित है।
लिथियम पर काम करने पर मिल चुका है नोबेल
लिथियम ही दुनिया का आने वाला भविष्य है। इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि स्टैनली व्हिटिंगम, जॉन गुडएनफ और अकीरा योशिनो को लिथियम-आयन बैटरी पर उनके शोध के लिए रसायन विज्ञान में 2019 के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। व्हिटिंगम ने इसके विकासशील तरीकों पर काम किया, जिससे जीवाश्म ईंधन मुक्त ऊर्जा प्रौद्योगिकियों को जन्म दे सकता है। वहीं जॉन गुडएनफ ने बैटरी में उपयोग किये जाने वाले कैथोड को परिष्कृत (रिफाइन) किया और योशिनो ने 1985 में पहली बार इसे व्यावसायिक रूप से व्यवहार में लाने के लिए लिथियम-आयन बैटरी बनाई।
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