Lingayat Community: भाजपा, कांग्रेस और अधर में लटके लिंगायत

कर्नाटक के बारे में कहा जाता है कि बिना लिंगायतों को शीर्ष पर बिठाये सरकार नहीं बनायी जा सकती। लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि भाजपा ही नहीं कांग्रेस भी शीर्ष पदों पर लिंगायत समुदाय के दावे को स्वीकार नहीं करना चाहती।

karnataka politics bjp and congress over Lingayat Community

Lingayat Community: कर्नाटक में 22 मई को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार सहित 8 मंत्रियों ने शपथ ली थी। इसके बाद 27 मई को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने 24 नए मंत्रियों को कैबिनेट में शामिल किया। इस तरह कर्नाटक में 34 मंत्री शपथ ग्रहण कर चुके हैं और अब राज्य में नया मंत्री नहीं बनाया जा सकता। जो विधायक मंत्री नहीं बने उनका दुखी होना राजनीति में नई बात नहीं है किन्तु कर्नाटक में कांग्रेस एक नई दुविधा में फंस गई है। दरअसल, कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत समुदाय की प्रतिष्ठा और उसके असर के बरक्स कांग्रेस ने इस समुदाय के किसी विधायक को उपमुख्यमंत्री नहीं बनाया है। जबकि लिंगायत समुदाय की ओर से यह मांग रखी गयी थी कि उसके समुदाय को कम से कम उपमुख्यमंत्री पद तो मिलना ही चाहिए।

हालांकि वर्तमान सरकार में लक्ष्मी हेब्बलकर (बेलगावी ग्रामीण, पंचमसाली उप-जाति), शिवानंद पाटिल (बसवाना बागेवाड़ी, पंचमसाली), ईश्वर खंड्रे (भाल्की, बनजीगा उप-जाति), शरण प्रकाश पाटिल (सेदाम, आदि बनजीगा), शरणबसप्पा दर्शनापुर (शाहपुर, रेड्डी लिंगायत) और एस.एस. मल्लिकार्जुन (दावणगेरे उत्तर, सदर लिंगायत) को लिंगायत समुदाय की ओर से मंत्री पद दिया गया है किन्तु इन सभी नेताओं का कद अभी इतना बड़ा नहीं है कि ये लिंगायत समुदाय का प्रतिनिधित्व कर सकें। यही कारण है कि कर्नाटक में लिंगायत समुदाय उपमुख्यमंत्री पद की मांग कर रहा है ताकि किसी बड़े लिंगायत नेता को स्थान मिल सके।

वैसे भी कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत समुदाय का हमेशा से सत्ता के शीर्ष पर कब्जा रहा है। यही कारण है कि भाजपा ने लिंगायत समुदाय से संबंध रखनेवाले येदियुरप्पा को चार बार मुख्यमंत्री बनाया। इस बार भी लिंगायत समुदाय की अपेक्षा कांग्रेस से बड़े पद की थी। गौरतलब है कि 1989 के बाद 2023 वह चुनाव है जब बड़ी संख्या में लिंगायत वोटर कांग्रेस की ओर गया है। इस बार कांग्रेस ने 46 लिंगायत उम्मीदवारों को टिकट दिया था जिनमें से 37 उम्मीदवार जीते हैं। भाजपा ने 69 लिंगायत उम्मीदवारों को टिकट दिए थे जिनमें से मात्र 15 उम्मीदवार जीत सके। इससे पूर्व 2018 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले लिंगायत उम्मीदवारों में से मात्र 13 को ही जीत मिली थी यानि इस बार लिंगायत समुदाय ने भाजपा के बजाए कांग्रेस पर विश्वास किया।

इसलिए लिंगायतों की ओर से इस बात का दबाव बनाया गया कि उनके समुदाय को कम से कम उपमुख्यमंत्री का पद मिलना चाहिए। हालांकि उनका सत्ता में बड़ी भागीदारी का विश्वास टूटता सा दिख रहा है क्योंकि विभिन्न गुटों में विभाजित कांग्रेस ने आपसी कलह को शांत करने के चक्कर में लिंगायतों की मांग की अनदेखी कर दी है।

कांग्रेस, भाजपा और लिंगायत

कर्नाटक की कुल आबादी में लिंगायतों का प्रतिशत 16 है जो एक बहुत बड़े वर्ग को प्रभावित करता है। परंपरागत रूप से लिंगायतों को कांग्रेस का वोट बैंक माना जाता था। पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल कर्नाटक में लिंगायतों के सबसे बड़े नेता थे जिनकी बदौलत 1989 में कांग्रेस ने कर्नाटक में 178 सीटें जीती थीं जिसमें पार्टी का वोट शेयर 43.76 प्रतिशत था। कांग्रेस के 178 विधायकों में 44 लिंगायत समुदाय से थे।

वीरेंद्र पाटिल के चलते लिंगायत कांग्रेस के साथ बने रहे किन्तु 1997 में पाटिल के निधन के बाद लिंगायत वोट कांग्रेस से भाजपा की ओर मुड़ गया और पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा लिंगायतों के सबसे बड़े नेता बन गए। लगभग दो दशक तक लिंगायत भाजपा के साथ बने रहे जिसमें बीएस येदियुरप्पा, पूर्व उपमुख्यमंत्री लक्ष्मण सावदी, पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार का महत्त्वपूर्ण योगदान था। किन्तु भाजपा की अंदरूनी राजनीति के चलते कर्नाटक में स्थानीय नेतृत्व स्थिर ही नहीं हो पाया और 4 बार मुख्यमंत्री बने येदियुरप्पा कभी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए।

2021 में येदियुरप्पा को राज्य की राजनीति से पूरी तरह संन्यास दिलवाकर भाजपा ने अपने राजनीतिक हितों पर कुठाराघात किया था और 2023 में जगदीश शेट्टार तथा लक्ष्मण सावदी को टिकट न देकर रही-सही कसर पूरी कर ली। इससे लिंगायतों में यह संदेश गया कि भाजपा उन्हें अपने घर की खेती समझती है और जब जगदीश शेट्टार और लक्ष्मण सावदी ने भाजपा छोड़कर कांग्रेस का दामन थामा तो मानो लिंगायतों ने भाजपा को भी सबक सिखा दिया।

हालांकि जगदीश शेट्टार विधानसभा चुनाव हार गए किन्तु कांग्रेस उन्हें अब भी विधान परिषद के माध्यम से एमएलसी बनाकर लिंगायतों को सन्देश दे सकती है। हाँ, लक्ष्मण सावदी का मंत्री न बन पाना निश्चित रूप से कांग्रेस को लिंगायतों से एक बार फिर दूर कर सकता है क्योंकि शेट्टार और सावदी के कांग्रेस में आने से पार्टी को 30 से 35 लिंगायत बहुल सीटों पर जीत मिली जो उसके लिए दूर की कौड़ी थी। इसके अलावा कांग्रेस में लिंगायतों के बड़े नेता और चामराजनगर सीट से विधायक पुट्टारंगशेट्टी को उपसभापति बनाए जाने से नाराज हैं। कुल मिलाकर जो लिंगायत भाजपा की अनदेखी से कांग्रेस की ओर मुड़े थे वे यहां भी स्वयं को उपेक्षित पा रहे हैं।

सीबीआई-ईडी के चलते भी कांग्रेस नेताओं को डर

कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणाम के आते ही राज्य के पूर्व डीजीपी प्रवीण सूद को सीबीआई का नया निदेशक नियुक्त कर केंद्र सरकार ने कर्नाटक सहित दक्षिण भारत की राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। प्रवीण सूद चूँकि कर्नाटक में रहे हैं अतः कर्नाटक के नेताओं की नस-नस से वाकिफ हैं। उन्हें दक्षिण भारत की राजनीति और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार की जानकारी भी है।

कर्नाटक के कई नेताओं के ऊपर सीबीआई और ईडी की जांच चल रही है। यहां तक कि उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार पर भी आय से अधिक संपत्ति के मामले चल रहे हैं। इसके अलावा तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और केरल में कई नेताओं-मंत्रियों पर आर्थिक अनियमितताओं के मामले चल रहे हैं जिनमें से कई तो राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हैं। ऐसे में सीबीआई और ईडी की किसी भी कार्रवाई को केंद्र सरकार की बदले की राजनीति का रूप देकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलना तय है।

अभी कर्नाटक में लोकसभा की 28 सीटें हैं जिनमें से 25 पर भाजपा काबिज है। विधानसभा चुनाव में जीत से उत्साहित कांग्रेस ने लोकसभा की 20 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है किन्तु उपरोक्त परिस्थितियों को देखते हुए यह लक्ष्य दूर की कौड़ी हो सकता है। कांग्रेस के भीतर जातीय और वर्गवादी असंतोष के कारण लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस में भगदड़ मच सकती है। इसलिए अगले साल का आम चुनाव ही साबित करेगा कि लिंगायत वोटर किसके साथ रहेगा। इस बीच कांग्रेस और भाजपा दोनों के पास इतना समय तो है ही कि वो लिंगायत समुदाय के प्रति अपनी नीति पर पुनर्विचार कर सकें।

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    अभी तक की जो राजनीति दिख रही है उसमें भाजपा और कांग्रेस लिंगायत समुदाय के वर्चस्व को तोड़ने का प्रयास करते हुए दिखाई दे रही हैं। दोनों पार्टियां लिंगायत उम्मीदवारों को टिकट तो देती हैं लेकिन राजनीति के शीर्ष पर उनका वर्चस्व बना रहे इससे दोनों दल कन्नी काटते नजर आ रहे हैं। यह लिंगायत वोटरों और नेताओं के लिए भी शुभ लक्षण नहीं कहा जा सकता।

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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